BJP Akali Alliance: पंजाब में शिरोमणि अकाली दल 2012 में आखिरी बार सत्ता में पहुंची थी। तब बीजेपी उसके साथ थी। 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल सत्ता से बाहर हुई और कांग्रेस की वापसी हुई। 2017 के बाद से अकाली दल की स्थिति बिगड़ती चली गई। चुनाव दर चुनाव हारी। 2020 के किसान आंदोलन के समय अकाली दल बीजेपी से अलग हो गई, इसके बाद अकाली दल का हाल ये हुआ कि आज उसके पास सिर्फ एक सांसद और तीन विधायक बचे हैं। अब पंजाब में फरवरी 2027 में विधानसभा चुनाव होना है, जिसके लिए अकाली दल, बीजेपी के साथ जाने को बेताब दिख रही है। दिल्ली में अकाली दल के नेता, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात पर मुलाकात कर रहे हैं, उसके बाद भी बीजेपी गठबंधन के लिए तैयार नहीं है। आखिर ऐसा क्यों? जब बीजेपी बार-बार गठबंधन के लिए सरेआम मना कर रही है, तब अकाली दल भाजपा के साथ गठबंधन के लिए क्यों लगातार कोशिश कर रही है?
अकाली की ओर से गठबंधन के कितने प्रयास?
अकाली दल के नेता कभी साफ शब्दों में तभी इशारों-इशारों में गठबंधन की बात करते रहे हैं। इसकी हवा तब उठी, जब दिल्ली में पीएम मोदी के साथ सुखबीर सिंह बादल ने मुलाकात की। कई बिलों पर संसद में साथ देने का ऐलान किया। जिसके बाद अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने गठबंधन पर कहा कि पंजाब में शांति, विकास और प्रगति के लिए लोग शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी को फिर से साथ देखना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस संबंध में कोई भी फैसला दोनों दलों का नेतृत्व ही करेगा।
मजीठिया का यह बयान उनकी बहन और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के उस बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने अकाली दल और भाजपा के बीच फिर से गठबंधन की अटकलों को हवा दी थी। उन्होंने इशारों में कहा था कि ऐसे "समझौते" फिर होने चाहिए, जिनके जरिए दिल्ली से पंजाब तक विकास के काम आगे बढ़े थे। हरसिमरत ने लोंगोवाल में कहा था, "गुरु साहिब आशीर्वाद दें। यह बोलना मेरा काम नहीं है, इसलिए मैं अपनी जुबान रोक रही हूं। आपको खुद पता चल जाएगा। भगवान कृपा करें और लोग हमें ताकत दें। ऐसे समझौते, जिनके माध्यम से दिल्ली से विकास और प्रगति के काम होते थे और एक बार फिर पंजाब में विकास एवं तरक्की की नींव रखी जाए, जिससे पंजाब और पंजाब के लोगों को लाभ मिले।"
पीएम मोदी के साथ सुखबीर सिंह बादल (फाइल फोटो- PTI)
अकाली दल के बीजेपी से गठबंधन, जरूरी या मजबूरी?
जिस तरह से अकाली दल, बीजेपी के पीछे घूम रही है, उससे ये तो साफ है कि सुखबीर सिंह बादल के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन जरूरी भी है और मजबूरी भी है। 2017 से पहले पंजाब में मुख्य रूप से लड़ाई कांग्रेस और अकाली दल+बीजेपी के बीच होती थी। लेकिन 2017 में आम आदमी पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने से स्थिति बदल गई। आप पहले विपक्ष में मजबूत हुई और फिर 2022 में सत्ता में, विपक्ष में कांग्रेस रही। अकाली दल का जनाधार धीरे-धीरे खत्म होते दिखा। केंद्र में सत्तासीन बीजेपी, जरूर पंजाब में अपना जनाधार बनाने में जुटी रही और कुछ हद तक सफल भी रही है। ऐसे में जवाब तो सीधा है, अगर अकाली दल फिर से इसबार के चुनाव में अकेले गई तो उसका स्थिति में शायद ही सुधार हो। राजनीतिक मामलों के जानकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार अकाली-बीजेपी गठबंधन को लेकर कहते हैं, " भाजपा के अकाली के साथ पुराने संबंध रहे हैं, पहले अकाली दल बिग ब्रदर की भूमिका में रहा है, जो आज की तारीख में बीजेपी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। क्योंकि बीजेपी ने भी अकाली दल से अलग होने के बाद जमीन पर काफी मेहनत की है, संगठन का विस्तार किया है। शहरी इलाकों से निकलकर ग्रामीण इलाकों तक भी पहुंची है। इसलिए अकाली ज्यादा आतुर हैं कि गठबंधन हो जाए, सीट शेयरिंग हो जाए।"
बीजेपी गठबंधन के लिए बोल चुकी है सीधे 'ना'
एक और जहां अकाली दल गठबंधन के लिए तैयार खड़ी दिख रही है, वहीं बीजेपी इसके लिए बार-बार मना कर रही है। भाजपा के नेता बार-बार कहा रहे हैं, वो पंजाब की सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। दिल्ली में जिस दिन शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल, पीएम मोदी से मिले थे, उसी दिन हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सोमवार को ऐसी किसी भी संभावना से इनकार कर दिया था। सैनी ने कहा कि उनकी पार्टी का गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है।इसके बाद भाजपा की पंजाब इकाई के प्रभारी सतीश पूनिया ने 31 अगस्त को एक बार फिर स्पष्ट किया कि पार्टी अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में राज्य की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। पूनिया ने संवाददाताओं से कहा, ’’मैं इस बात को फिर दोहरा रहा हूं। हो सकता है कि आपको यह बात उबाऊ लगे, लेकिन भाजपा अपनी ताकत और क्षमता के बल पर 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।’’ एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व का ’’सीधा संदेश’’ है कि भाजपा सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
इससे पहले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी. एल. संतोष ने कहा था कि पार्टी पंजाब की सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी और राज्य में अपनी सरकार बनाएगी।
बीजेपी क्यों कर रही है बार-बार मना?
बीजेपी साल 2020 से राज्य में अकेले चुनावी मैदानों में जाती रही है। उसने कांग्रेस और आप से कई बड़े नेताओं के अपने पाले में किया है, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को खड़ा किया। ऐसे में वो अकाली दल के साथ नहीं जाकर अकेले चुनावी मैदान में उतरे और सत्ता की ओर वापसी करे। इसके साथ ही कहा जा रहा है, कि अभी पंजाब में चुनाव में देरी है, बीजेपी अकाली दल के साथ माइंड गेम खेल रही है, ताकि अकाली दल दवाब में रहे और जब गठबंधन पर बात हो तो वो कम सीटों पर तैयार हो। पहले अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहती थी, अब वो छोटे भाई की भूमिका में रहे।असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार कहते हैं कि इस गठबंधन की बात सीएम उम्मीदवार को लेकर भी अटक सकती है, क्योंकि अभी तक सीएम पद, अकाली के हिस्से रहा है, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं, और बीजेपी इसपर शायद ही समझौता करे।
कुल मिलाकर, अकाली दल के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन सत्ता की लड़ाई में अपनी जमीन बचाने और मजबूत करने का रास्ता दिख रहा है, जबकि बीजेपी फिलहाल अपने दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर कायम है। ऐसे में असली सवाल सिर्फ गठबंधन का नहीं, बल्कि सीट बंटवारे, नेतृत्व और ‘बड़े भाई-छोटे भाई’ की भूमिका का भी है। 2027 के चुनाव तक तस्वीर बदलती है या बीजेपी अपनी ‘अकेले लड़ने’ की रणनीति पर कायम रहती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
