Bnei Menashe Community: भारत में एक समुदाय रहता है, नाम है बेने मेनाशे समुदाय, यह समुदाय अब भारत में बस कुछ सालों का ही मेहमान है। इसे इजराइल वापस अपने देश ले जाने की तैयारी कर रहा है, इसके लिए बकायदा प्रस्ताव भी पास हो चुका है। यह पहली बार नहीं है जब इजराइल मेनाशे समुदाय को वापस येरुशलम ले जाने की तैयारी में है, इससे पहले भी इस समुदाय के कुछ परिवारों को इजराइल में बसाया जा चुका है। इजराइल अपने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इन्हें यहूदी मानता है। इजराइल भारत में सैकड़ों सालों से रह रहे बेनी मेनाशे समुदाय को 'खोए हुए यहूदी' मानते रहा है। इन्हे वापस येरुशलम ले जाने की कोशिश इजराइल सालों से करते रहा है। बेने मेनाशे समुदाय भी अपने पैतृक देश जाने के लिए सालों से कोशिश करते रहे हैं।
कौन है बेनी मेनाशे समुदाय- Who is the Bnei Menashe community?
बेनी मेनाशे भारत के पूर्वोत्तर में रहने वाला एक अनोखा और ऐतिहासिक समुदाय है, जो अपने आपको इस्राइल के प्राचीन ‘गुमशुदा दस कबीलों’ में से मेनाशे कबीले का वंशज मानता है। माना जाता है कि लगभग 720 ईसा पूर्व में असिरियन साम्राज्य द्वारा इस्राइल पर कब्जे के दौरान मेनाशे कबीले के लोग मध्य एशिया और फिर पूर्व की ओर पलायन कर गए। समय के साथ यह समुदाय चीन होते हुए म्यांमार और फिर भारत के मणिपुर व मिजोरम क्षेत्र में आकर बस गया, जहां उनके वंशज सदियों तक स्थानीय समाजों के साथ घुलते-मिलते हुए रहते रहे।
वापस यहूदी धर्म की ओर कैसे मुड़ा बेनी मेनाशे समुदाय- How the Bnei Menashe community turned back to Judaism?
इतिहास में लंबे समय तक बेनी मेनाशे अपनी यहूदी जड़ों की स्पष्ट पहचान नहीं रखते थे, क्योंकि पीढ़ियों के दौरान सांस्कृतिक बदलाव आए और कई लोग ईसाई धर्म के प्रभाव में भी आए। लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में समुदाय के भीतर अपने प्राचीन इतिहास की खोज शुरू हुई। लोकगीतों, रीति-रिवाजो, प्रार्थनाओं और मौखिक परंपराओं में मौजूद संकेतों को आधार बनाकर समुदाय ने अपने यहूदी मूल को दोबारा स्थापित किया।
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कैसे बेनी मेनाशे को इजराइल ने माना खोए हुए यहूदी- How Israel Recognized Bnei Menashe?
इसके बाद रब्बियों और यहूदी संस्थानों की ओर से इन दावों की जांच शुरू हुई। लंबी प्रक्रिया, सांस्कृतिक अध्ययन और धार्मिक प्रशिक्षण के बाद इजराइल ने बेनी मेनाशे को यहूदी मूल समुदाय का दर्जा दिया। अतीत में बेनी मेनाशे के यहूदी होने को लेकर गहन चर्चा हुई, 2005 में सेपहार्डी समुदाय के तत्कालीन मुख्य रब्बी श्लोमो अमर ने उन्हें "इजराइल का वंशज" के रूप में मान्यता दी, जिससे उनके इज़राइल में प्रवास का मार्ग प्रशस्त हुआ। जिसके बाद से इस समुदाय के हज़ारों लोग ‘अलियाह’ यानी अपने पैतृक घर वापस लौटने की प्रक्रिया के तहत इजराइल जा चुके हैं, जहां उन्हें सरकारी समर्थन के साथ बसाया जा रहा है।
भारत में कहां रहता है बेनी मेनाशे समुदाय- Where does the Bnei Menashe community live in India?
बेनी मेनाशे पूर्वोत्तर भारत के यहूदी समुदायों का सामूहिक नाम है, जो मुख्य रूप से मिजोरम और मणिपुर में बसते हैं। आज भी मणिपुर और मिजोरम में इस समुदाय की उपस्थिति बनी हुई है। वे उपासना, खानपान, रीति-रिवाज़ और त्योहारों में यहूदी परंपराओं को अपनाकर जीवन जीते हैं। इनकी पहचान भारत के उन दुर्लभ और ऐतिहासिक समुदायों में होती है, जिन्होंने सैकड़ों वर्ष बाद अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को फिर से खोजा और उन्हें पुनर्जीवित किया।
बेनी मेनाशे समुदाय को क्यों कहा जाता है शिनलुंग - Why is the Bnei Menashe community called Shinlung?
बेनी मेनाशे समुदाय खुद को मनश्शे जनजाति का वंशज मानता है, जो माना जाता है कि 2,700 वर्ष पहले असीरियन साम्राज्य द्वारा इजराइल से निर्वासित दस गुमशुदा कबीलों में से एक थी। इस समूह में चिन, लुशाई, कुकी और मिजौ जैसे जातीय समुदाय शामिल हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से शिनलुंग के नाम से भी जाना जाता है।
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कब तक बेनी मेनाशे समुदाय चला जाएगा इजराइल? When will the Bnei Menashe community leave India?
इजराइल सरकार ने अगले पांच वर्षों में भारत के पूर्वोतर में रहने वाले बचे हुए 5,800 बेनी मेनाशे यहूदियों को अपने देश लाने की योजना को मंजूरी दे दी है। इजराइल की ज्यूइश एजेंसी ने बताया कि सरकार ने बेनी मेनाशे समुदाय के अलियाह (आव्रजन) को पूर्ण करने के उद्देश्य से एक बड़े और महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर सहमति दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और आव्रजन मंत्री ओफिर सोफर द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के तहत 2026 के अंत तक 1,200 लोग और 2030 तक कुल 5,800 लोग भारत से इजराइल में बसाए जाएंगे। इसके साथ ही पूरा समुदाय इजराइल में पहले से मौजूद लगभग 4,000 सदस्यों से मिल सकेगा। नए आने वाले प्रवासियों को नोफ हागालिल सहित देश के उत्तरी शहरों में बसाया जाएगा। यह पहली बार होगा जब ज्यूइश एजेंसी पूर्व-आव्रजन प्रक्रिया का नेतृत्व करेगी। इस योजना पर लगभग 9 करोड़ शेकेल (2.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर) खर्च होने का अनुमान है, जिसमें उड़ानों, धार्मिक शिक्षा, आवास, हिब्रू भाषा प्रशिक्षण और अन्य सहायता शामिल होंगी।
