क्या है बांग्लादेश का अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (ICT-BD)
आज शेख हसीना को बांग्लादेश की उसी अदालत में फांसी की सजा सुनाई गई, जिसे कभी पाकिस्तान परस्तों को सजा देने के लिए शेख हसीना ने ही स्थापित किया था। जिस कोर्ट में कभी बांग्लादेश के दमनकारियों को दंडित किया जाता था, आज वहां उसके निर्माण में अहम योगदान देने वाले परिवार के सदस्य को मौत की सजा सुनाई गई है। शेख हसीना आज बांग्लादेश में नहीं हैं, भारत में शरण ली हुईं हैं, अगर आज बांग्लादेश में होतीं तो शायद उन्हें अबतक फांसी पर लटका दिया गया होता या उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह हत्या कर दी गई थी। अब सवाल ये है कि आम तौर पर किसी भी देश में सुप्रीम कोर्ट सबसे बड़ी अदालत होती है, जहां इस तरह के मामले सुने जाते हैं, लेकिन बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (आईसीटी-बीडी) इस मामले में सबसे ताकतवर है। इसे बांग्लादेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा स्थान हासिल है, यहां से सजा मिली तो बचने का विकल्प सीमित हो जाता है।
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ICT (International Crimes Tribunal Bangladesh) बांग्लादेश की एक विशेष घरेलू अदालत है, जिसे युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए बनाया गया था। इसे अंतरराष्ट्रीय अदालत जैसा नाम दिया गया है, लेकिन यह पूरी तरह बांग्लादेश की अपनी न्यायिक प्रणाली के तहत चलने वाला न्यायाधिकरण है।
ICT का गठन 2009–2010 में शेख हसीना ने ही किया था। शेख हसीना सरकार ने इसकी स्थापना उस उद्देश्य से किया था कि 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए नरसंहार, बलात्कार, यातना और अन्य अत्याचारों में शामिल लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जा सके। इस न्यायाधिकरण की सारी कार्यवाही बांग्लादेश के 1973 के कानून-International Crimes (Tribunals) Act-के तहत संचालित होती है।
ICT में जजों की नियुक्ति सरकार करती है और इसकी अपनी जांच टीम, अभियोजन शाखा और ट्रायल प्रक्रिया होती है। यह साधारण अदालत नहीं, बल्कि गंभीर अपराधों के लिए बनाई गई एक विशेष ट्रिब्यूनल है, जो मानवता के खिलाफ अपराधों, युद्ध अपराधों और सामूहिक हिंसा जैसी घटनाओं की सुनवाई करता है। वर्षों से यह न्यायाधिकरण राजनीति और न्याय दोनों के केंद्र में रहा, जहां इसके फैसलों को लेकर सख्त समर्थन भी दिखा और निष्पक्षता पर तीखी आलोचना भी उठी। इसके बावजूद ICT बांग्लादेश की राजनीति, न्याय व्यवस्था और युद्ध अपराधों पर चल रही ऐतिहासिक बहस में एक बेहद प्रभावशाली संस्था बनी रही है।
हां, बांग्लादेश के ICT के फैसले को चुनौती दी जा सकती है। ICT एक विशेष राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल है और उसके निर्णयों के खिलाफ अपील का प्रावधान केवल देश की सर्वोच्च अदालत - बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के विशेष रूप से अपीलीय डिवीजन में है। दोषी ठहराए गए व्यक्ति या पक्ष अदालत में अपील दायर कर सकते हैं, जहां पूरी सुनवाई होती है और ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा की जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ICT के फैसलों को चुनौती देने का कोई औपचारिक रास्ता नहीं है, क्योंकि यह किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के अधीन नहीं बल्कि बांग्लादेश के कानून के तहत गठित एक घरेलू ट्रिब्यूनल है।
बांग्लादेश के International Crimes Tribunal (ICT) ने 1971 के युद्ध अपराधों से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।
जिस ICT में पाक परस्तों को सजा दी गई थी, उसी कोर्ट में महीनों तक चले मुकदमे के बाद बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को हिंसक दमन का “मास्टरमाइंड और प्रमुख सूत्रधार” बताते हुआ फांसी की सजा सुना दी गई। ये हिंसक दमन तब हुए थे, जब शेख हसीना देश की प्रधानमंत्री थीं, और उनके खिलाफ छात्रों का विरोध प्रदर्शन हुआ था। ढाका में कड़ी सुरक्षा वाले अदालत कक्ष में फैसला पढ़ते हुए न्यायाधिकरण ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के यह साबित कर दिया है कि पिछले साल 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर घातक कार्रवाई के पीछे हसीना का ही हाथ था। हसीना को निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल प्रयोग का आदेश देने, भड़काऊ बयान देने और ढाका तथा आसपास के इलाकों में कई छात्रों की हत्या के लिए अभियान चलाने की अनुमति देने के लिए मौत की सजा सुनाई गई है। वहीं शेख हसीना ने आईसीटी को उनके विरोधियों द्वारा संचालित एक “कंगारू कोर्ट” बताया है।
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