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बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट से कितना अलग है ICT? कभी पाक परस्तों को करती थी दंडित, अब शेख हसीना को ही सुना दी फांसी की सजा

बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (ICT-BD) की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी, जिन लोगों ने पाकिस्तान से मिलकर 1971 में बांग्लादेश में दमन किया था, उसे सजा दी जा सके। ICT की स्थापान शेख हसीना ने ही थी, अब उसी ICT में शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाई गई है।

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क्या है बांग्लादेश का अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (ICT-BD)

आज शेख हसीना को बांग्लादेश की उसी अदालत में फांसी की सजा सुनाई गई, जिसे कभी पाकिस्तान परस्तों को सजा देने के लिए शेख हसीना ने ही स्थापित किया था। जिस कोर्ट में कभी बांग्लादेश के दमनकारियों को दंडित किया जाता था, आज वहां उसके निर्माण में अहम योगदान देने वाले परिवार के सदस्य को मौत की सजा सुनाई गई है। शेख हसीना आज बांग्लादेश में नहीं हैं, भारत में शरण ली हुईं हैं, अगर आज बांग्लादेश में होतीं तो शायद उन्हें अबतक फांसी पर लटका दिया गया होता या उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह हत्या कर दी गई थी। अब सवाल ये है कि आम तौर पर किसी भी देश में सुप्रीम कोर्ट सबसे बड़ी अदालत होती है, जहां इस तरह के मामले सुने जाते हैं, लेकिन बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-बांग्लादेश (आईसीटी-बीडी) इस मामले में सबसे ताकतवर है। इसे बांग्लादेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा स्थान हासिल है, यहां से सजा मिली तो बचने का विकल्प सीमित हो जाता है।

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क्या है बांग्लादेश का ICT- What is International Crimes Tribunal (ICT)?

ICT (International Crimes Tribunal Bangladesh) बांग्लादेश की एक विशेष घरेलू अदालत है, जिसे युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए बनाया गया था। इसे अंतरराष्ट्रीय अदालत जैसा नाम दिया गया है, लेकिन यह पूरी तरह बांग्लादेश की अपनी न्यायिक प्रणाली के तहत चलने वाला न्यायाधिकरण है।

क्या शेख हसीना ने की थी ICT की स्थापना- Did Sheikh Hasina establish ICT?

ICT का गठन 2009–2010 में शेख हसीना ने ही किया था। शेख हसीना सरकार ने इसकी स्थापना उस उद्देश्य से किया था कि 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए नरसंहार, बलात्कार, यातना और अन्य अत्याचारों में शामिल लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जा सके। इस न्यायाधिकरण की सारी कार्यवाही बांग्लादेश के 1973 के कानून-International Crimes (Tribunals) Act-के तहत संचालित होती है।

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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 14 जुलाई, 1996 को ढाका में राष्ट्रीय संसद के उद्घाटन सत्र में भाषण देती हुईं (फोटो- AP)

बांग्लादेश का ICT कैसे करता है काम- How Bangladesh's ICT works?

ICT में जजों की नियुक्ति सरकार करती है और इसकी अपनी जांच टीम, अभियोजन शाखा और ट्रायल प्रक्रिया होती है। यह साधारण अदालत नहीं, बल्कि गंभीर अपराधों के लिए बनाई गई एक विशेष ट्रिब्यूनल है, जो मानवता के खिलाफ अपराधों, युद्ध अपराधों और सामूहिक हिंसा जैसी घटनाओं की सुनवाई करता है। वर्षों से यह न्यायाधिकरण राजनीति और न्याय दोनों के केंद्र में रहा, जहां इसके फैसलों को लेकर सख्त समर्थन भी दिखा और निष्पक्षता पर तीखी आलोचना भी उठी। इसके बावजूद ICT बांग्लादेश की राजनीति, न्याय व्यवस्था और युद्ध अपराधों पर चल रही ऐतिहासिक बहस में एक बेहद प्रभावशाली संस्था बनी रही है।

बांग्लादेश के ICT के फैसलों की चुनौती कहां - Can Bangladesh's ICT decision be challenged?

हां, बांग्लादेश के ICT के फैसले को चुनौती दी जा सकती है। ICT एक विशेष राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल है और उसके निर्णयों के खिलाफ अपील का प्रावधान केवल देश की सर्वोच्च अदालत - बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के विशेष रूप से अपीलीय डिवीजन में है। दोषी ठहराए गए व्यक्ति या पक्ष अदालत में अपील दायर कर सकते हैं, जहां पूरी सुनवाई होती है और ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा की जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ICT के फैसलों को चुनौती देने का कोई औपचारिक रास्ता नहीं है, क्योंकि यह किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के अधीन नहीं बल्कि बांग्लादेश के कानून के तहत गठित एक घरेलू ट्रिब्यूनल है।

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बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने चलाई थी गोलियां (फोटो- AP)

बांग्लादेश के ICT के पांच बड़े फैसले- Five Major ICT Decisions

बांग्लादेश के International Crimes Tribunal (ICT) ने 1971 के युद्ध अपराधों से जुड़े कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं।

  1. अब्दुल कादिर मुल्ला को फांसी- जमात-ए-इस्लामी नेता मुल्ला को 1971 में नरसंहार और अत्याचार के लिए दोषी ठहराया गया। यह ICT का पहला हाई-प्रोफाइल डेथ सेंटेंस था, जिसने देशभर में बड़ी बहस और विरोध-समर्थन दोनों पैदा किए।
  2. सलाउद्दीन क्वादिर चौधरी को फांसी-पूर्व सांसद और प्रभावशाली नेता चौधरी को नरसंहार, हत्या और यातनाओं के लिए दोषी पाया गया। यह फैसला राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माना गया।
  3. अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद को फांसी-जमात-ए-इस्लामी के महासचिव मुजाहिद को बौद्धिकों की हत्या की साजिश और अन्य गंभीर अपराधों का दोषी पाया गया।
  4. गुलाम आजम को 90 साल की सजा-जमात-ए-इस्लामी के पूर्व अमीर गुलाम अज़म को युद्ध अपराधों के लिए लंबी कैद की सजा मिली। यह ‘प्रतीकात्मक सजा’ कहा गया क्योंकि उनकी उम्र अधिक थी।
  5. मोतीउर रहमान निजामी को फांसी-जमात नेता निजामी को हत्याओं, नरसंहार और यातनाओं की योजना व संचालन का दोषी पाया गया। यह ICT का सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली फैसला माना जाता है।

अब शेख हसीना को फांसी की सजा

जिस ICT में पाक परस्तों को सजा दी गई थी, उसी कोर्ट में महीनों तक चले मुकदमे के बाद बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को हिंसक दमन का “मास्टरमाइंड और प्रमुख सूत्रधार” बताते हुआ फांसी की सजा सुना दी गई। ये हिंसक दमन तब हुए थे, जब शेख हसीना देश की प्रधानमंत्री थीं, और उनके खिलाफ छात्रों का विरोध प्रदर्शन हुआ था। ढाका में कड़ी सुरक्षा वाले अदालत कक्ष में फैसला पढ़ते हुए न्यायाधिकरण ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी संदेह के यह साबित कर दिया है कि पिछले साल 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर घातक कार्रवाई के पीछे हसीना का ही हाथ था। हसीना को निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ घातक बल प्रयोग का आदेश देने, भड़काऊ बयान देने और ढाका तथा आसपास के इलाकों में कई छात्रों की हत्या के लिए अभियान चलाने की अनुमति देने के लिए मौत की सजा सुनाई गई है। वहीं शेख हसीना ने आईसीटी को उनके विरोधियों द्वारा संचालित एक “कंगारू कोर्ट” बताया है।

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शिशुपाल कुमार
शिशुपाल कुमार Author

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय ... और देखें

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