Coalgate Scam: भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास में जब भी सबसे चर्चित और बड़े विवादों का जिक्र होगा, तब साल 2012 का 'कोयला घोटाला' जरूर याद किया जाएगा। जिस मामले ने तत्कालीन UPA सरकार की नींव हिला दी थी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की छवि पर सवाल खड़े किए थे, उसमें अब देश की सर्वोच्च अदालत ने अंतिम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह और अन्य अभियुक्तों को इस आपराधिक मामले से पूरी तरह से दोषमुक्त कर दिया है।
दिसंबर 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री के निधन के बाद, कानूनी रूप से यह मामला औपचारिकता से परे जाकर उनके सम्मान और ऐतिहासिक बेदागी को स्थापित करने का माध्यम बना। आइए आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्या था यह पूरा कोयला घोटाला, इसमें मनमोहन सिंह पर क्या आरोप लगे थे और सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा।
कैसे शुरू हुआ 'कोयला घोटाला'?
इस पूरे विवाद की नींव साल 2012 में पड़ी, जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक सीक्रेट ऑडिट रिपोर्ट संसद में पेश की गई। CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 1993 से 2010 के बीच (विशेष रूप से 2004 से 2009 के दौरान) केंद्र सरकार ने देश के बहुमूल्य कोयला ब्लॉकों का आवंटन बिना किसी पारदर्शी बोली या खुली नीलामी के किया। खदानों को पारदर्शी तरीके से नीलाम करने के बजाय एक प्रशासनिक 'स्क्रीनिंग कमेटी' की सिफारिशों के आधार पर निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को सीधे आवंटित कर दिया गया।
CAG की अंतिम रिपोर्ट में दावा किया गया कि बिना नीलामी के खदानें दिए जाने से एसार पावर, हिंडाल्को, टाटा स्टील, टाटा पावर और जिंदल स्टील जैसी निजी कंपनियों को अनुचित फायदा हुआ और सरकारी खजाने को करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान हुआ।
इस रिपोर्ट के आते ही देश भर में राजनीतिक भूचाल आ गया और न्यायपालिका की निगरानी में केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और CBI ने इसकी जांच शुरू कर दी। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से 2010 के बीच किए गए 218 में से 214 कोयला ब्लॉक आवंटनों को गैर-कानूनी और मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया।
डॉ. मनमोहन सिंह का नाम इस मामले में कैसे आया?
इस मामले में डॉ. मनमोहन सिंह का नाम सीधे तौर पर जुड़ने की मुख्य वजह यह थी कि 2004 से 2009 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का प्रभार भी उन्हीं के पास था।
तालाबीरा-II ब्लॉक आवंटन मामला (2005): मुख्य विवाद ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक को उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला की कंपनी M/s Hindalco Industries को दिए जाने से जुड़ा था। आरोप लगा कि एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी (PSU) के दावों को नजरअंदाज कर निजी कंपनी को फायदा पहुंचाया गया।
CBI ट्रायल कोर्ट का कड़ा रुख (2015): हालांकि CBI ने अपनी शुरुआती जांच के बाद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर मनमोहन सिंह को क्लीन चिट दी थी, लेकिन मार्च 2015 में विशेष CBI न्यायाधीश भरत पराशर ने क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने अपनी ओर से संज्ञान लेते हुए डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला और हिंडाल्को के अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), धारा 409 (विश्वासघात) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) के तहत आरोपी मानते हुए समन जारी कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस समन के आदेश पर रोक लगा दी थी, लेकिन मामला कानूनी रूप से लंबित रहा।
3 जनवरी 2013 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मनमोहन सिंह (चित्र साभार: DD News)
"हिस्ट्री विल बी काइंडर टू मी"
डॉ. मनमोहन सिंह ने हमेशा इस मामले में किसी भी आपराधिक भूमिका या नीयत से इनकार किया। उन्होंने स्पष्ट किया था कि कोयला ब्लॉकों की पारदर्शी नीलामी की प्रक्रिया की वकालत सबसे पहले उन्होंने ही की थी, लेकिन अंतर-मंत्रालयी सहमतियों और राज्य सरकारों के विरोध के कारण प्रक्रिया में समय लगा। तालाबीरा-II ब्लॉक आवंटन का फैसला पूरी तरह से प्रशासनिक और राज्य सरकार (ओडिशा) की सिफारिशों पर आधारित था, न कि किसी निजी फायदे के लिए।
अपनी ऐतिहासिक अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस (3 जनवरी 2014) में एक सवाल के जवाब में उन्होंने अंग्रेजी में कहा था "मुझे विश्वास है कि जब भी इस समय का इतिहास लिखा जाएगा, हम बेदाग बाहर आएंगे... इतिहास मेरे प्रति आज के मीडिया के मुकाबले ज्यादा उदार होगा।"
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दी बड़ी राहत (फाइल फोटो | PTI)
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में क्या कहा?
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अब इस मामले को पूरी तरह समाप्त करते हुए CBI की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और 2015 में जारी निचली अदालत के समन को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब जांच एजेंसी (CBI) ने दो बार गहन जांच के बाद यह पाया कि पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कोई सबूत या सामग्री नहीं है, तो विशेष CBI न्यायाधीश के पास क्लोजर रिपोर्ट खारिज करने का कोई वैध आधार नहीं था। ट्रायल कोर्ट ने जांच एजेंसियों की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने के स्थापित कानूनी सिद्धांतों को लागू करने में भारी चूक की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि अपीलकर्ता के निधन के कारण तकनीकी रूप से यह याचिका समाप्त की जा सकती थी, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री पर लगी प्रतिकूल टिप्पणियों की सत्यता जांचना और उन्हें न्याय देना अदालत का कर्तव्य था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही देश के सबसे बड़े राजनीतिक और वित्तीय विवादों में से एक 'कोयला घोटाला' में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर लगे आरोपों का अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।
