NEET Paper Leak Protest: नीट पेपर लीक आंदोलन के दौरान जिन छात्रों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए थे, उनको अब सरकार वापस ले रही है, ऐसा ही समझौता आंदोलन खत्म करने को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी और सरकार के बीच हुआ था। दिल्ली से लेकर बिहार तक और असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक में सरकार घोषणा कर चुकी है कि छात्रों पर दर्ज केस वापस होंगे, दिल्ली में तो इसके लिए कार्यवाही भी शुरू हो गई। अब सवाल ये है कि आखिर ये दर्ज मुकदमे वापस कैसे होते हैं? मुकदमा पुलिस दर्ज करती है, सबूत जुटाती है, आरोपी बनाती है, फिर सरकार कैसे मुकदमा वापस लेती है? क्या सरकार घोषणा कर देती है और मुकदमे वापस हो जाते हैं, रद्द हो जाते हैं? आइए समझते हैं, भारत का कानून मुकदमे वापस लेने पर क्या कहता है, क्या हैं इसके कानूनी पहलू?
दर्ज मुकदमे कैसे वापस लेती है सरकार?
किसी भी व्यक्ति या संस्था पर दर्ज आपराधिक मामला वापस लेने का कानूनी अधिकार राज्य सरकार के पास होता है, जिसे वह सरकारी वकील के माध्यम से इस्तेमाल करती है। इसके पीछे की वजह यह है कि हर अपराध को केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे समाज या राज्य के खिलाफ माना जाता है। इसलिए जैसे अपराधी को सजा दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है, वैसे ही जनहित को ध्यान में रखते हुए मुकदमा वापस लेने का हक भी सरकार को दिया गया है। राज्य सरकार जनहित, सामाजिक सद्भाव या राजनीतिक आंदोलनों के दौरान दर्ज मुकदमों की समीक्षा करती है और उन्हें वापस लेने की सिफारिश करती है। सरकार सीधे कोर्ट में मुकदमा वापस नहीं ले सकती। इसके लिए सरकार लोक अभियोजक को निर्देश देती है। सरकारी वकील को अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है। कोर्ट यह जांच करती है कि मुकदमा वापस लेने का कारण वैध है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट बिट्टू कुमार सिंह (B.K.Singh-Standing Counsel, DCIL) इस मामले को लेकर बताते हैं, "अगर सरकार किसी मुकदमे को वापस लेना चाहती है, तो वो अंडरटेकिंग देती है कोर्ट में कि FIR वापस लेनी है। उसके बाद FIR वापस होता है, लेकिन FIR खत्म नहीं होती है, वो जिंदा रहती है, तो उसके लिए क्या किया जाता है, उसके लिए IPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट जाते हैं, वहां FIR को रद्द कराते हैं। जब FIR रद्द हो जाती है, तब ये माना जाता है कि अब आपके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं बनता है।"
FIR वापस लेने की प्रक्रिया (AI Photo)
कानूनी प्रक्रिया और इसके नियम
सरकार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 360 (पुरानी सीआरपीसी की धारा 321) के तहत सरकारी वकील कोर्ट का फैसला आने से पहले किसी भी समय मुकदमा वापस लेने की अर्जी लगा सकता है। यह फैसला एक या सभी आरोपियों और उनके किसी एक या सभी अपराधों पर लागू हो सकता है। अगर सरकारी वकील चार्जशीट दाखिल होने से पहले केस वापस लेता है, तो आरोपी को 'डिस्चार्ज' कर दिया जाता है। अगर चार्जशीट दाखिल होने के बाद मुकदमा वापस लिया जाता है, तो आरोपी कोर्ट द्वारा 'बरी' हो जाता है।
सरकार किन मामलों में मुकदमे वापस ले सकती है?
सरकार आमतौर पर उन परिस्थितियों में मुकदमे वापस लेती है जब मामला राजनीतिक या छात्र आंदोलनों से जुड़ा हो और विरोध प्रदर्शनों के दौरान छोटे-मोटे अपराध दर्ज किए गए हों। इसके अलावा, दो समुदायों या समूहों के बीच शांति और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भी केस वापस लिए जाते हैं। कई बार जनहित को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया जाता है, जब सरकार को लगता है कि मुकदमा चलाने से समाज को फायदा होने के बजाय नुकसान हो सकता है, या फिर जब जांच के दौरान यह पाया जाता है कि आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों की कमी है और सबूत अपर्याप्त हैं। सरकार की शक्तियों पर बात करते हुए एडवोकेट वीके सिंह कहते हैं, " सरकार के पास पावर है कि कभी भी एक नोटिफिकेशन निकालकर या कोई अध्यादेश लाकर मास लेवल पर एफआईआर को वापस ले सकती है।"
सरकार के पास क्या अधिकार?
कोर्ट किन बातों का ध्यान रखता है?
सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, कोर्ट मुकदमा वापसी की मंजूरी देने से पहले यह जांचती है कि फैसला पूरी तरह से न्याय के हित में हो और इसे किसी राजनीतिक दबाव या अनुचित लाभ के लिए न लिया गया हो। हत्या, बलात्कार, डकैती या भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराधों के मामलों में कोर्ट आमतौर पर मुकदमा वापस लेने की अनुमति नहीं देता और सख्ती बरतता है। इसके अलावा, कोर्ट आवेदन पर सुनवाई करते समय पीड़ित व्यक्ति या शिकायतकर्ता का पक्ष भी सुन सकता है ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।
क्या सरकार के फैसले के खिलाफ अपील हो सकती है?
हां, कानून में इसका भी प्रावधान है। अगर उस मुकदमे के पीड़ित को ये लगता है कि सरकार ने गलत फैसला लिया है केस वापस लेने का तो वो इस फैसले के खिलाफ जा सकता है। जब सरकारी वकील मुकदमा वापस लेने के लिए कोर्ट में आवेदन देता है, तब कोर्ट फैसला सुनाने से पहले पीड़ित व्यक्ति को नोटिस जारी करता है या उसे सुनने का मौका देता है। पीड़ित व्यक्ति कोर्ट में एक आपत्ति याचिका दाखिल कर सकता है। वह कोर्ट के सामने सबूत और कारण रख सकता है कि मुकदमा वापस क्यों नहीं लिया जाना चाहिए। अगर निचली अदालत पीड़ित के विरोध के बावजूद सरकार को मुकदमा वापस लेने की अनुमति दे देता है, तो पीड़ित इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दाखिल कर सकता है।
