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मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट क्या है? तुर्किए के जुड़ते ही क्यों होने लगी ‘मुस्लिम NATO’ की चर्चा, समझें नया डिफेंस गठजोड़

Mecca Defence Pact: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुआ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा सहयोग को मजबूत करने की कोशिश है। समझौते के तहत एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। आइए जानते हैं कि वैश्विक तौर पर खासकर भारत के लिहाज से यह समझौता का कितना महत्व है।

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पढ़ें सऊदी-पाकिस्तान-तुर्किए का मक्का डिफेंस पैक्ट कितना ताकतवर?। AI IMAGE
Authored by: Piyush Kumar
Updated Aug 8, 2026, 12:02 IST
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KEY HIGHLIGHTS
  • मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए शामिल
  • एक सदस्य देश पर हमला हुआ तो तीनों पर हमला माना जाएगा
  • तुर्किए की सैन्य ताकत और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता से बढ़ा समझौते का रणनीतिक महत्व
  • Mecca Defence Pact: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच मक्का में तीन देशों के बीच एक रक्षा समझौता हुआ है। सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने मक्का के अल-सफा पैलेस में एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ नाम दिया गया है।

    समझौते की सबसे अहम शर्त है, तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर भी हमला माना जाएगा। यही वजह है कि इसकी तुलना नाटो (NATO) के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है और इसे कई विश्लेषणों में ‘मुस्लिम नाटो’ या ‘सुन्नी नाटो’ तक कहा जा रहा है।

    हालांकि, इसे नाटो पार्ट-2 मान लेना जल्दबाजी होगी। नाटो के पास संयुक्त सैन्य कमान, स्थायी संस्थागत ढांचा और सामूहिक रक्षा की मजबूत व्यवस्था है, जबकि मक्का समझौता अभी तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का एक नया ढांचा है। लेकिन सवाल तो कई हैं। आखिर सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान को एक साथ आने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का असर है? अमेरिका के लिए इसका क्या मतलब है? और भारत के लिए यह नया समीकरण कितना महत्वपूर्ण है? आइए सिलसिलेवार ढंग से पूरा मामला समझते हैं।

    सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट। AP

    सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुआ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट। AP

    मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट क्या है?

    मक्का के अल-सफा पैलेस में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में यह समझौता हुआ। तीनों देशों ने कहा कि यह समझौता उनके ऐतिहासिक रिश्तों, इस्लामी एकजुटता, साझा रणनीतिक हितों और वर्षों से चले आ रहे रक्षा सहयोग पर आधारित है। नेताओं ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में अहम पहल बताया।

    समझौते का मूल सिद्धांत बेहद सीधा है, एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमले का मतलब है तीनों देशों पर हमला। यानी किसी एक देश की सुरक्षा को बाकी दोनों देशों की सुरक्षा से जोड़ दिया गया है। इसके अलावा समझौते के तहत रक्षा सहयोग के अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है।

    मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से जुड़ी अहम जानकारी। AI IMAGE

    मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट से जुड़ी अहम जानकारी। AI IMAGE

    नाटो से तुलना क्यों हो रही है?

    नाटो के चर्चित अनुच्छेद 5 में भी सामूहिक रक्षा का सिद्धांत है। इसके तहत किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला गठबंधन के सभी सदस्यों के खिलाफ हमला माना जाता है। मक्का समझौते में भी इसी तरह का सिद्धांत दिखाई देता है। यही वजह है कि इसे ‘मुस्लिम नाटो’ कहा जा रहा है। लेकिन दोनों के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।

    नाटो एक दशकों पुराना सैन्य गठबंधन है, जिसके पास संयुक्त कमान, सैन्य ढांचा, नियमित अभ्यास और व्यापक संस्थागत व्यवस्था है। मक्का समझौते में फिलहाल ऐसी कोई NATO जैसी स्थायी संयुक्त कमान सामने नहीं आई है। इसलिए ‘मुस्लिम नाटो’ इस समझौते की आधिकारिक पहचान नहीं, बल्कि इसकी सामूहिक रक्षा व्यवस्था को समझाने वाली एक उपमा है।

    नाटो सदस्यों की फाइल फोटो। AP

    नाटो सदस्यों की फाइल फोटो। AP

    समझौता अभी क्यों हुआ?

    इस सवाल का जवाब पश्चिम एशिया के मौजूदा सुरक्षा संकट में छिपा है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष, गाजा और लेबनान में जारी तनाव, खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्र में ड्रोन-मिसाइल हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया का सुरक्षा समीकरण बदल दिया है। सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देश यह महसूस कर रहे हैं कि सिर्फ बाहरी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें अपनी क्षेत्रीय रक्षा क्षमता और रणनीतिक साझेदारियों को भी मजबूत करना होगा। यही वजह है कि मक्का समझौते को पश्चिम एशिया में एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

    सऊदी अरब के लिए क्या फायदा?

    सऊदी अरब इस समझौते का सबसे बड़ा लाभार्थी क्यों हो सकता है, इसे समझने के लिए पिछले कुछ समय की सुरक्षा स्थिति देखनी होगी। ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों से जुड़े संघर्षों के बीच सऊदी अरब की महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाएं और तेल प्रतिष्ठान पहले भी ड्रोन और मिसाइल हमलों के निशाने पर रहे हैं। ऐसे माहौल में रियाद अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना चाहता है। इसके लिए वह किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय कई शक्तिशाली रक्षा साझेदारों के साथ संबंध बढ़ा रहा है।

    इस समझौते में उसे एक तरफ पाकिस्तान की सैन्य और परमाणु क्षमता मिलती है, तो दूसरी तरफ तुर्किए की आधुनिक सैन्य तकनीक और नाटो अनुभव। यानी सऊदी अरब के लिए यह समझौता केवल रक्षा सहयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक विकल्प बढ़ाने का जरिया भी है।

    सऊदी अरब क्राउन प्रिंस बिन सलमान की फाइल फोटो। AP

    सऊदी अरब क्राउन प्रिंस बिन सलमान की फाइल फोटो। AP

    तुर्किए ने क्यों किया समझौता?

    तुर्किए की भूमिका इस पूरे समझौते को और महत्वपूर्ण बनाती है। गाजा युद्ध और पश्चिम एशिया के दूसरे संघर्षों को लेकर तुर्किए और इजरायल के रिश्तों में तनाव लगातार बढ़ा है। ईरान और लेबनान में जारी संघर्षों ने भी अंकारा के सामने सुरक्षा से जुड़े नए सवाल खड़े किए हैं।

    अंकारा स्थित एक थिंक टैंक के रणनीतिकार निहात अली ओज़कान ने ब्लूमबर्ग से कहा कि अमेरिका जिस तरह क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, उससे क्षेत्रीय समीकरण बदल रहे हैं। उनके मुताबिक, क्षेत्रीय संघर्षों के बदलते स्वरूप के बीच देश अब ऐसे नए सुरक्षा तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे यह तय किया जा सके कि संकट के समय कौन उनके साथ खड़ा होगा और कौन नहीं। यानी तुर्किए के लिए यह समझौता क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने और अपनी सुरक्षा साझेदारियों को मजबूत करने का माध्यम भी हो सकता है।

    पाकिस्तान के लिए क्या है फायदा?

    पाकिस्तान के लिए यह समझौता कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसे सऊदी अरब और तुर्किए के साथ एक औपचारिक सामूहिक रक्षा ढांचे में जगह मिली है। पाकिस्तान के पास बड़ी सैन्य ताकत और परमाणु क्षमता है, जबकि तुर्किए के पास मजबूत रक्षा उद्योग और नाटो का लंबा अनुभव है।

    पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ रक्षा संबंध बनाए हुए है। दोनों देशों के बीच सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा सहयोग और सुरक्षा संबंध काफी पुराने हैं। इसके अलावा सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार भी है। अनुमान के मुताबिक, लाखों पाकिस्तानी नागरिक सऊदी अरब में रहकर काम करते हैं और वहां से आने वाली रेमिटेंस पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यह समझौता पाकिस्तान को सुरक्षा, कूटनीति और रणनीतिक प्रभाव, तीनों स्तरों पर फायदा दे सकता है।

    हालांकि, यह कहना कि इस समझौते के जरिए पाकिस्तान को भारत पर सीधे दबाव बनाने की कोई नई सैन्य गारंटी मिल गई है, अभी जल्दबाजी होगी। समझौते में भारत को निशाना बनाने वाला कोई प्रावधान सामने नहीं आया है।

    मक्का के अल-सफा पैलेस में एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

    मक्का के अल-सफा पैलेस में एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

    पाकिस्तान-सऊदी अरब का पहले से है रक्षा समझौता

    मक्का समझौते की एक खास बात यह भी है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा सहयोग का मजबूत ढांचा मौजूद है। दोनों देशों ने पहले भी एक रणनीतिक रक्षा समझौता किया था, जिसमें यह सिद्धांत शामिल था कि एक देश पर हमला दोनों देशों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा। पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ सैन्य संबंध रखता आया है। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों की मौजूदगी और दोनों देशों के बीच प्रशिक्षण सहयोग भी इसी रिश्ते का हिस्सा रहे हैं।

    हालांकि, मौजूदा क्षेत्रीय संघर्षों के दौरान पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अलग-अलग सवाल उठते रहे हैं। यही वजह है कि नए समझौते की असली परीक्षा तब होगी, जब तीनों देशों में से किसी एक के सामने वास्तविक सुरक्षा संकट आएगा।

    तुर्किए की एंट्री क्यों है सबसे अहम?

    इस पूरे समझौते में तुर्किए की एंट्री को सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है। तुर्किए, नाटो का सदस्य है और अमेरिका के बाद NATO में उसकी सैन्य क्षमता सबसे बड़ी मानी जाती है। पिछले कुछ वर्षों में उसने अपने रक्षा उद्योग को भी तेजी से विकसित किया है। खासकर ड्रोन, मिसाइल, नौसैनिक प्रणालियों और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में तुर्किए ने अपनी क्षमता बढ़ाई है।

    इसलिए जब तुर्किए सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ एक सामूहिक रक्षा समझौते में आता है, तो यह सिर्फ तीन देशों के बीच राजनीतिक साझेदारी नहीं रह जाती। इससे पश्चिम एशिया में सैन्य और रणनीतिक शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

    क्या यह ईरान के खिलाफ गठजोड़ है?

    आधिकारिक तौर पर तीनों देशों ने इस समझौते को ईरान के खिलाफ सैन्य गठजोड़ नहीं बताया है। सऊदी अधिकारियों ने इसे किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गुट के रूप में पेश किए जाने को भी खारिज किया है। लेकिन रणनीतिक स्तर पर ईरान का मुद्दा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    सऊदी अरब और ईरान लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। हाल के सैन्य तनाव ने इस प्रतिस्पर्धा को और संवेदनशील बना दिया है। यही वजह है कि विश्लेषकों का एक वर्ग इस समझौते को ईरान की क्षेत्रीय शक्ति का संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देख रहा है। हालांकि, इसे ईरान के खिलाफ युद्ध की तैयारी कहना अभी उचित नहीं होगा।

    इजरायल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

    मक्का समझौते में तुर्किए और पाकिस्तान का एक साथ आना इजरायल के लिए भी महत्वपूर्ण है। तुर्किए और इजरायल के रिश्ते गाजा युद्ध के बाद बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच गाजा, सीरिया और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर गंभीर मतभेद हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देता और फिलिस्तीन के मुद्दे पर उसका रुख लंबे समय से स्पष्ट रहा है।

    अब जब तुर्किए और पाकिस्तान एक सामूहिक रक्षा व्यवस्था में सऊदी अरब के साथ हैं, तो यह इजरायल के लिए पश्चिम एशिया के बदलते सुरक्षा समीकरण का एक नया पहलू है। हालांकि, यहां भी तथ्य यही है कि मक्का समझौते में इजरायल के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई का प्रावधान घोषित नहीं किया गया है।

    क्या पाकिस्तान की परमाणु ताकत सऊदी-तुर्किए को ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ देगी?

    यह इस समझौते के बाद उठने वाला सबसे संवेदनशील सवाल है। पाकिस्तान परमाणु हथियार रखने वाला देश है। इसलिए यह चर्चा स्वाभाविक है कि अगर सऊदी अरब या तुर्किए पर हमला होता है तो क्या पाकिस्तान की परमाणु क्षमता अप्रत्यक्ष सुरक्षा प्रदान करेगी? फिलहाल इसका जवाब नहीं है।

    मक्का समझौते में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान सामने नहीं आया है जो पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को सऊदी अरब या तुर्किए के लिए औपचारिक ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ बनाता हो। इसलिए इसे परमाणु सुरक्षा गारंटी कहना अभी अटकल होगी।

    फिर भी रणनीतिक रूप से पाकिस्तान की परमाणु शक्ति इस गठजोड़ का महत्व जरूर बढ़ाती है। किसी भी संभावित हमलावर को यह ध्यान रखना होगा कि जिस देश पर हमला किया जा रहा है, वह एक परमाणु शक्ति के साथ औपचारिक सामूहिक रक्षा समझौते में है।

    अमेरिका के लिए क्या है मैसेज?

    मक्का समझौते को अमेरिकी प्रभाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा साझेदार रहा है। लेकिन क्षेत्र में लगातार बढ़ते संघर्षों के बीच खाड़ी देशों में अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक साझेदारियां बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब अमेरिका से दूरी बना रहा है।

    बल्कि इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि रियाद अपनी सुरक्षा व्यवस्था में अधिक रणनीतिक विकल्प चाहता है। अगर भविष्य में इस तरह के क्षेत्रीय रक्षा सहयोग का विस्तार होता है, तो पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ अमेरिका-केंद्रित न रहकर अधिक क्षेत्रीय हो सकती है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और सऊदी क्राउन प्रिंस की फाइल फोटो। AP

    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और सऊदी क्राउन प्रिंस की फाइल फोटो। AP

    समझौते पर क्या है ईरान की सोच?

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य इब्राहिम रेजाई ने इस समझौते की आलोचना की है। उन्होंने इसे कागजी समझौता बताते हुए कहा कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ ऐसी डील सऊदी अरब को वास्तविक सुरक्षा नहीं दे सकती।

    ईरान की चिंता को मौजूदा क्षेत्रीय तनाव के संदर्भ में समझा जा सकता है। एक तरफ सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा है, दूसरी तरफ ईरान और इजरायल के बीच सीधा सैन्य तनाव चल रहा है। ऐसे में सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान का एक सामूहिक रक्षा ढांचे में आना निश्चित तौर पर तेहरान की रणनीतिक गणनाओं को प्रभावित करेगा।

    भारत पर पड़ेगा कोई असर?

    भारत के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि समझौते में शामिल तीनों देश नई दिल्ली के लिए अलग-अलग कारणों से अहम हैं। सऊदी अरब, भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा, व्यापार और निवेश साझेदार है। तुर्किए के साथ भारत के आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, हालांकि कई क्षेत्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद भी रहे हैं। वहीं, पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध लंबे समय से बेहद संवेदनशील हैं।

    इसलिए तीनों देशों का एक साझा रक्षा ढांचे में आना नई दिल्ली के लिए एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाक्रम है। हालांकि, फिलहाल इसे भारत-विरोधी सैन्य गठजोड़ कहना सही नहीं होगा। समझौते में भारत को लक्ष्य बनाने वाली कोई बात सामने नहीं आई है।

    पीएम मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस की फाइल फोटो। AP

    पीएम मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस की फाइल फोटो। AP

    क्या यह आगे बड़ा सैन्य संगठन बन सकता है?

    मक्का समझौता फिलहाल तीन देशों तक सीमित है। लेकिन अगर भविष्य में दूसरे मुस्लिम बहुल या क्षेत्रीय देश इससे जुड़ते हैं, तो यह पश्चिम एशिया में एक बड़े सुरक्षा नेटवर्क का आधार बन सकता है। मिस्र, कतर, यूएई जैसे देशों की संभावित भूमिका की चर्चा हो सकती है, लेकिन फिलहाल उनके शामिल होने को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

    सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि अलग-अलग देशों की विदेश नीति और सुरक्षा प्राथमिकताएं काफी अलग हैं। किसी देश के ईरान के साथ संबंध अलग हैं, किसी के इजरायल के साथ, तो किसी के अमेरिका के साथ। इसलिए NATO जैसी एकीकृत सैन्य व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं होगा।

    मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता है। इसकी सबसे बड़ी ताकत है- एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाना। लेकिन NATO जैसी संयुक्त कमान, स्थायी सैन्य ढांचा और स्पष्ट सामूहिक सैन्य प्रतिक्रिया की व्यवस्था अभी सामने नहीं आई है। इसलिए इसे फिलहाल ‘मुस्लिम नाटो’ कहना एक राजनीतिक और विश्लेषणात्मक उपमा ज्यादा है, वास्तविक नाटो जैसा संगठन नहीं है।

    End of Article