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क्या है क्लोरोपिक्रिन? जिसकी जरा सी मात्रा से मौत की नींद सो जाते हैं सैकड़ों लोग, क्या रूस ने यूक्रेन में किया इसी का इस्तेमाल

Russia Using Chemical Weapons in Ukraine War: अमेरिकी विदेश विभाग (America) की ओर से कहा गया है कि रूस ने रासायनिक हथियार संधि (Chemical Weapons Convention) का उल्लंघन करते हुए यूक्रेनी फौज के खिलाफ रासायनिक हथियार (Chemical Weapon) चोकिंग एजेंट क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin) का इस्तेमाल किया है। अमेरिका का आरोप है कि यूक्रेन (Ukraine War) में ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए रूस (Russia) इन हथियारों का उपयोग कर रहा है, जिससे जमीनी लड़ाई में बढ़त हासिल की जा सके।

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रूस-यूक्रेन युद्ध

Photo : AP

Russia Using Chemical Weapons in Ukraine War: रूस-यूक्रेन युद्ध को शुरू हुए करीब दो साल बीत चुके हैं, लेकिन यह जंग अब तक जारी है। इस लड़ाई में दोनों पक्षों को भारी नुकसान भी हुआ है, लेकिन कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस बीच रूस पर एक बार फिर गंभीर आरोप लगे हैं। अमेरिका की ओर से कहा गया है कि रूस यूक्रेनी सैनिकों के खिलाफ केमिकल वेपन का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब रूस को लेकर इस तरह का खुलासा हुआ है।

अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से कहा गया है कि रूस ने रासायनिक हथियार संधि (Chemical Weapons Convention) का उल्लंघन करते हुए यूक्रेनी फौज के खिलाफ रासायनिक हथियार चोकिंग एजेंट क्लोरोपिक्रिन का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा रूस ने यूक्रेन में राइट कंट्रोल एजेंट्स का भी इस्तेमाल किया है। अमेरिका की ओर से कहा गया है कि यूक्रेन में ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए रूस इन हथियारों का उपयोग कर रहा है, जिससे जमीनी लड़ाई में बढ़त हासिल की जा सके। आइए जानते हैं ये केमिकल वेपन क्या होते हैं? इनमें क्लोरोपिक्रन कितना खतरनाक है? इसका इस्तेमाल कब किया गया था? अमेरिका ने रूस पर क्या कार्रवाई की है...

Russia Ukraine War

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केमिकल वेपन क्या होते हैं?

रासायनिक हथियार या केमिकल वेपन का इस्तेमाल किसी भी गैस या तरल के रूप में किया जा सकता है। ये हथियार इतने शक्तिशाली होते हैं कि पलभर में किसी भी जगह को तबाह कर सकते हैं, इसके अलावा जंग खत्म होने के बाद भी पर्यावरण में इन हथियारों का असर बना रहता है। खास बात यह है कि इन हथियारों से निकलने वाली गैस या फिर तरल के फैलने की गति काफी तेज होती है, जिससे आंख से आंसू आना, नाक बहना, दम घुटना या फिर अन्य तरीके की समस्याएं आ सकती हैं। जब किसी भी जगह पर केमिकल अटैक होता है तो तो इन गैस या तरल को जानबूझकर पर्यावरण में छोड़ दिया जाता है। मूल रूस से केमिकल वेपन में विषैली गैसों ऑक्सिम, लेविसिट, सल्फर मस्टर्ड, नाइट्रोजन मस्टर्ड, क्लोराइड, हाइड्रोजन, साइनाइड का इस्तेमाल किया जाता है।

क्लोरोपिक्रिन कितना खतरनाक है?

अमेरिका ने रूस पर यूक्रेन में क्लोरोपिक्रिन के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। इस क्लोरोपिक्रिन को रासायनिक हथियार निषेध संगठन (OPCW) द्वारा चोकिंग एजेंट के रूप में प्रतिबंधित किया गया था। जानकारी के मुताबिक, क्लोरोपिक्रिन एक ऐसा रायायनिक यौगिक है, जिसका इस्तेमाल जानलेवा कीटनाशक और नेमाटाइडाइड के रूप में किया जाता है और यह गैस व लिक्विड दोनों रूप से इस्तेमाल हो सकता है। एक्सपर्ट का कहना है कि यह केमिकल इतना खतरनाक है कि इसकी एक छोटी सी बूंद भी कई लोगों की जान ले सकती है, वहीं अगर कहीं गैस के रूप में इसका इस्तेमाल हुआ तो किसी का भी दम घुट सकता है। इसके साथ ही गैस का असर काफी देर तक हवा में रह सकता है।

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कब हुआ था क्लोरोपिक्रिन का इस्तेमाल?

अमेरिका का आरोप है कि क्लोरोपिक्रिन का इस्तेमाल करके रूस मैदानी जंग में यूक्रेन पर बढ़त बनाना चाहता है। रूस ऐसे जगहों पर इस केमिकल वेपन का इस्तेमाल कर रहा है, जो ऊंचाई वाले क्षेत्र हैं। अमेरिका का कहना हे कि रूस ने एक बार नहीं, कई बार अलग-अलग जगहों पर इस हथियार का इस्तेमाल किया है। जानकारी के मुताबिक, क्लोरोपिक्रिन का इस्तेमाल प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की सेना ने मित्र राष्ट्रों के खिलाफ किया था, जिससे भारी तबाही मची थी।

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अमेरिका ने क्या की कार्रवाई?

अमेरिकी सरकार ने केमिकल वेपन के इस्तेमाल पर रूस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए कई कंपनियों पर बैन लगा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से कहा गया है कि चीन, बेल्जियम और स्लोवाकिया जैसे तीसरे देशों की लगभग 200 कंपनियां और 80 व्यक्ति प्रभावित हैं, जो कथित तौर पर अपने हथियार कार्यक्रम के लिए सामग्री की खरीद में रूस का समर्थन करते हैं। विभाग के अनुसार, प्रतिबंधों का उद्देश्य रूस द्वारा रासायनिक और जैविक (बायोलॉजिकल) हथियारों का उत्पादन करना भी है।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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