- शीत युद्ध के दौर में नवस्वतंत्र देशों ने अमेरिका और सोवियत संघ से दूरी रखते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर दिया।
- पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को नैतिक और राजनीतिक आधार दिया
- सोवियत संघ के पतन के बाद आंदोलन कमजोर पड़ा, लेकिन अमेरिका-रूस तनाव के बीच इसकी प्रासंगिकता फिर चर्चा में है।
द्वितीय विश्वयुद्ध जब खत्म हुआ तो धुरी राष्ट्र (जर्मनी, इटली और जापान) की शक्ति तो क्षीण हो गई, लेकिन इसके साथ ही दुनिया का शक्ति संतुलन भी एकदम से बदल गया। यूरोप की शक्तियां खत्म हो गईं। इसके बाद मित्र राष्ट्र से दो नई ताकतों का उदय हुआ। एक ओर अमेरिका का उदय हुआ, दूसरी ओर सोवियत संघ का उदय हुआ। इस दौर में दुनिया दो खेमों में बंटने लगी थी। यह वही समय था, जब भारत समेत कई देश आजाद हुए थे, इंग्लैंड कमजोर पड़ चुका था। नए देशों पर यह दवाब था कि वो या तो अमेरिका की साइड जाएं या फिर सोवियत संघ की ओर। भारत और मिस्त्र जैसे कई ऐसे देश थे, जो किसी भी गुट में नहीं जाना चाहते थे, कारण एक ही था- गुटबाजी से बचना, दुश्मन बनाने की जगह देश को संभालना। इसी का परिणाम गुटनिरपेक्ष आंदोलन के रूप में सामने आया। समय बीता सोवियत संघ खत्म हो गया, अमेरिका सर्वविदित महाशक्ति बना, लेकिन आज फिर से दुनिया दो खेमों में बंटी दिख रही है। आज रूस और अमेरिका आमने-सामने हैं, अमेरिका और चीन आमने सामने है। UN अपनी काम करने की ताकत को खोता जा रहा है, कई देश जंग में उलझे हुए हैं। ऐसे में आज एक बार फिर से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की याद आने लगी है। सवाल ये है कि शीत युद्ध के दौर में जिस गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने दोनों गुटों के बीच संतुलन बनाए रखा था, दुनिया में शांति कायम रखने में सफलता हासिल की थी, आज वो कहां है, क्या हुआ उस आंदोलन को, कहां खो गया वो आंदोलन?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत की भूमिका
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत तीन देशों के नेताओं ने की। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पिता के रूप में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो, मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्देल नासिर को जाना जाता है। इनका साथ दिया था- इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो और घाना के क्वामे एन्क्रूमा ने। भारत ने इस आंदोलन की सोच को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि नवस्वतंत्र देशों को अपनी संप्रभुता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए। उस समय यह आंदोलन केवल तटस्थ रहने की नीति नहीं था, बल्कि उपनिवेशवाद, नस्लवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ एक नैतिक और राजनीतिक आवाज भी था। तब पंडित नेहरू का कहना था- “हम प्रस्ताव करते हैं कि जहां तक हो सके, एक-दूसरे के खिलाफ ग्रुप्स की पावर पॉलिटिक्स से दूर रहें, जिनकी वजह से पहले वर्ल्ड वॉर हुए हैं और जिनसे फिर से और भी बड़े पैमाने पर तबाही आ सकती है।”
NAM Opening Summit Belgrade
विकासशील देशों की आवाज बन गया गुटनिरपेक्ष आंदोलन
भारत ने लगातार यह प्रयास किया कि गुटनिरपेक्ष देश वैश्विक शांति, निरस्त्रीकरण और आर्थिक सहयोग के मुद्दों पर एकजुट रहें। समय के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन केवल “किसी गुट से दूर रहने” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विकासशील देशों की आवाज बन गया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भी गुटनिरपेक्ष देशों के हितों को उठाया और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा दिया। भारत ने न केवल विचार स्तर पर बल्कि कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत किया। 1961 में बेलग्रेड में हुए पहले सम्मेलन में भारत की सक्रिय भागीदारी रही। तब पंडित नेहरू ने 1961 में पहले NAM सम्मेलन में कहा था- “यहां इकट्ठा हुए देशों की ताकत मिलिट्री ताकत या इकोनॉमिक ताकत नहीं है, फिर भी यह ताकत है। इसे मोरल फोर्स कहिए।”
NAM Ministerial 2025.
शीतयुद्ध के बाद बदलने लगी परिस्थितियां
1960 और 1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपनी शक्ति के चरम पर था। इसमें एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश शामिल हो गए थे। संयुक्त राष्ट्र में भी इन देशों की संख्या अधिक होने के कारण उनका सामूहिक प्रभाव दिखाई देता था। आंदोलन ने वैश्विक निरस्त्रीकरण, आर्थिक असमानता को कम करने और “नया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था” स्थापित करने जैसे मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया। उस दौर में यह विकासशील देशों की सामूहिक आवाज बन चुका था, लेकिन समय के साथ इसकी ताकत कमजोर पड़ने लगी। सबसे बड़ा कारण था शीत युद्ध का अंत। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई। जब दो गुटों का स्पष्ट टकराव ही नहीं रहा, तो “गुटनिरपेक्ष” रहने का मूल संदर्भ कमजोर हो गया। इसके अलावा, सदस्य देशों के बीच वैचारिक और राजनीतिक मतभेद भी बढ़ने लगे। कई देश व्यावहारिक कारणों से किसी न किसी महाशक्ति के करीब चले गए। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना शुरू किया, जिससे सामूहिक एकजुटता कमजोर पड़ी।
Jawahar lal Nehru with Gamal Abdel Nasser and Josip Broz Tito
वर्तमान स्थिति में कहां है गुटनिरपेक्ष आंदोलन?
21वीं सदी की शुरूआत में अंतरराष्ट्रीय राजनीति बहुध्रुवीय होती गई। जहां केवल दो महाशक्तियों का वर्चस्व नहीं रहा, बल्कि कई क्षेत्रीय शक्तियां उभरीं। ऐसे में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रही, लेकिन अगर वर्तमान समय की बात करें तो आज अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से दुनिया दो खेमों में दिख रही है। एक ओर अमेरिका और दूसरी ओर रूस, जिसके पास सोवियत संघ की विरासत रही। आज जब अमेरिका और रूस के बीच दुनिया फिर से फंसी दिख रही है, खासकर विकासशील देशों को तो एक बार फिर से इस गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जरूरत महसूस हो रही है। कहने को तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन आज भी मौजूद है। 120 देश इसके सदस्य है, युगांडा के पास इस समय चेयरमैनशिप है, लेकिन यह भी सच है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन जिंदा रहते हुए खामोश दिख रहा है, उसकी पहचान धूमिल होती दिख रही है। हालांकि भारत जैसे देश आज भी अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देते हैं, जो गुटनिरपेक्ष आंदोलन की ही विकसित अभिव्यक्ति है। इस प्रकार, गुटनिरपेक्ष आंदोलन भले ही शीत युद्ध काल की तरह प्रभावशाली न हो, लेकिन उसकी विचारधारा और ऐतिहासिक भूमिका आज भी वैश्विक राजनीति में संदर्भित की जाती है।
