US-Iran Conflict History: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर को मार गिराने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पिछले काफी महीने से चले आ रहे अमेरिका-इजरायल और ईरान तनाव से पूरी दुनिया की आर्थिक गति रुक सी गई है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों के आने-जाने पर रोक ने भारत समेत पूरी दुनिया के लिए संकट ला दिया है।
अमेरिका और ईरान, (US Iran Relation Explainer) जो कभी मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में एक-दूसरे के बेहद करीबी सहयोगी हुआ करते थे, आज एक-दूसरे के सबसे बड़े कट्टर विरोधी हैं। आज भले ही अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के कट्टर विरोधी हों, लेकिन 1950 के दशक से लेकर 1979 की ईरानी क्रांति तक दोनों देशों के बीच बेहद करीबी संबंध थे। उस समय ईरान पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था, जिन्हें अमेरिका का मजबूत समर्थन प्राप्त था।
अमेरिका ने ईरान को आर्थिक सहायता, आधुनिक हथियार और तकनीकी सहयोग दिया। बदले में ईरान अमेरिका का महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी बना रहा और पश्चिम एशिया में अमेरिकी हितों की रक्षा करता था। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान दोनों देशों ने सोवियत संघ के प्रभाव को रोकने के लिए भी साथ मिलकर काम किया।
हालांकि, 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। शाह को सत्ता छोड़नी पड़ी और आयतोल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में नई सरकार बनी। इसके बाद अमेरिका विरोधी नीतियां अपनाई गईं और दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़ते चले गए।
ईरान में अमेरिका को 'ग्रेट सैटन' (महान शैतान) कहा जाता है, जबकि अमेरिका ईरान को वैश्विक और क्षेत्रीय अस्थिरता का मुख्य स्रोत मानता है। आखिर इन दोनों देशों के रिश्तों में इतनी कड़वाहट कैसे और क्यों आई? आइए इसे आज हम मुख्य रूप से समझने की कोशिश करते हैं।
1953 का तख्तापलट (आक्रोश की पहली चिंगारी)
1979 की क्रांति से बहुत पहले ही दोनों देशों के बीच तनाव के बीज बोए जा चुके थे।तेल का राष्ट्रीयकरण: 1951 में ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक ने देश के तेल उद्योग को राष्ट्रीयकृत कर दिया, जो पहले ब्रिटेन के नियंत्रण में हुआ करता था।
ऑपरेशन अजाक्स (1953): मोहम्मद मोसादेग के इस फैसले से नाराज होकर अमेरिका (CIA) और ब्रिटेन (MI6) ने मिलकर एक गुप्त अभियान चलाया। उन्होंने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया और शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी। यह तख्तापलट तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण करने, बढ़ती आर्थिक अस्थिरता और साम्यवाद (Communism) के खतरे के कारण हुआ था।
शाह की तानाशाही: शाह (मोहम्मद रजा पहलवी) अमेरिका के करीबी हमदर्द बन गए। उन्होंने अपनी गुप्त पुलिस (SAVAK) की मदद से जनता की आवाज और विरोध को बेरहमी से दबाया। इस तख्तापलट ने ईरानी जनता के दिलों में अमेरिका के प्रति गहरा आक्रोश भर दिया।
(Photo: ANI)
1979 की ईरानी क्रांति: दुश्मनी की आधिकारिक शुरुआत
इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना: आर्थिक असमानता, पश्चिमी संस्कृति के थोपे जाने और अमेरिकी प्रभाव के खिलाफ 1978-79 में ईरान में भारी विद्रोह हुआ। जनवरी 1979 में शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा। फरवरी 1979 में धार्मिक नेता आयतोल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी की वतन वापसी हुई और ईरान एक इस्लामिक रिपब्लिक बन गया।
दूतावास संकट: 4 नवंबर 1979 को ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। ईरान की मांग थी कि अमेरिका शाह को मुकदमा चलाने के लिए वापस सौंपे। इस घटना के बाद अमेरिका ने ईरान से सारे राजनयिक संबंध तोड़ दिए, उसकी संपत्तियां फ्रीज कर दीं और कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
परमाणु विवाद (Nuclear Dispute)
2000 के दशक में जब यह खुलासा हुआ कि ईरान गुप्त रूप से यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) कर रहा है, तो दोनों देशों के बीच तनाव का एक नया मोर्चा खुल गया।
परमाणु समझौता (JCPOA - 2015): सालों के तनाव के बाद ओबामा प्रशासन के समय ईरान, अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय संघ के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर राजी हुआ और बदले में उस पर से आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए।
ट्रंप का फैसला (2018): राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को दोषपूर्ण बताते हुए अमेरिका को इससे बाहर कर लिया और 'मैक्सिमम प्रेशर' (अधिकतम दबाव) नीति के तहत ईरान पर फिर से बेहद सख्त प्रतिबंध लगा दिए। जवाब में ईरान ने भी दोबारा यूरेनियम संवर्धन की गति बढ़ा दी।
सैन्य टकराव और प्रॉक्सी वॉर
पिछले कुछ वर्षों में अगर देखें तो दोनों देशों के बीच की यह दुश्मनी सीधे सैन्य टकराव में बदल चुकी है।
कासेम सुलेमानी की हत्या (2020): जनवरी 2020 में अमेरिका ने एक ड्रोन हमले में ईरान के सबसे ताकतवर मिलिट्री कमांडर जनरल कासेम सुलेमानी को मार गिराया। जवाब में ईरान ने इराकी अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं।
प्रॉक्सी वॉर: ईरान मध्य पूर्व में अपने समर्थक समूहों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया) के जरिए अमेरिकी हितों और उसके सहयोगियों पर हमले करता रहा है।
हालिया प्रत्यक्ष टकराव (2025-2026): हाल के समय में इजराइल और ईरान के बीच हुए प्रत्यक्ष सैन्य टकराव (12-डे वॉर) और ईरान की परमाणु साइट्स को निशाना बनाकर किए गए हमलों ने स्थिति को और गंभीर कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर भी इसका सीधा असर पड़ा है।
