साउथ अफ्रीका में लड़के से मर्द बनने का एक ऐसा रिवाज है, जिसके कारण अब नौजवान जान गंवा रहे हैं, कई घर ऐसे हैं, जहां के लड़के मर्द बनने दीक्षा केंद्रों में गए, लेकिन वापस नहीं लौटे, उनकी मौत की खबर ही आई। दरअसल अफ्रीकी देशों में सालों पुरानी खतना करने की परंपरा है, जिसमें बड़े लड़कों का खतना किया जाता है, सालों से बालिग होते लड़कों को पारंपरिक पहनावे के साथ खतना केंद्रों, जिसे दीक्षा केंद्र भी कहते हैं, वहीं भेजा जाता है, जहां उनका खतना होता है। अब यह परंपरा एक खतरनाक मोड़ पर दिख रही है, जहां कई लड़के अपनी जान गंवा चुके हैं। एसोसिएटेड प्रेस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार इस सीजन में कम से कम 48 लड़के अपनी जान गंवा चुके हैं। कई मामले तो सामने ही नहीं आ पाते हैं, क्योंकि यह परंपरा गोपनीय मानी जाती है। कई मामलों में देखा गया है कि मौत की खबर तो आ जाती है, लेकिन कारणों के बारे में बताया ही नहीं जाता है, जिससे परिवार और प्रशासन के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि मौत की असली वजह क्या थी?
अफ्रीका की संस्कृति में अहम स्थान
अफ्रीका की संस्कृति में इस पारंपरिक खतने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यह सिर्फ एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका गहरा सांस्कृतिक महत्व है, सालों से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसका पालन करना उनका कर्तव्य है। आमतौर पर खोसा समुदाय में यह परंपरा है, हालांकि कई अन्य अफ्रीकी समुदाय भी इस पारंपरिक खतने को अपनाए हुए हैं। यह प्रक्रिया साल भर नहीं चलती है, इसकी शुरुआत एक विशेष मौसम में होती है, जब किशोर लड़कों को उनके परिवार से दूर अलग स्थानों पर भेज दिया जाता है। ये स्थान अक्सर जंगल या पहाड़ी इलाकों में बने अस्थायी शिविर होते हैं। यहां उन्हें पारंपरिक तरीके से खतना किया जाता है और फिर कई हफ्तों तक एकांत में रखा जाता है। इस दौरान वे सफेद मिट्टी (क्ले) से शरीर ढकते हैं और विशेष नियमों का पालन करते हैं। इस समय उन्हें सिर्फ शारीरिक सहनशीलता ही नहीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण पाठ भी सिखाए जाते हैं-जैसे अनुशासन, जिम्मेदारी, परिवार और समाज के प्रति सम्मान। बड़े बुजुर्ग या पारंपरिक गुरु उन्हें संस्कृति, रीति-रिवाज और पुरुष होने की जिम्मेदारियों के बारे में बताते हैं।
एक पारंपरिक दीक्षा स्कूल से लौटने के बाद का दृश्य ( फोटो- AP)
मिल जाता है 'पुरुष' होने का दर्जा
दीक्षा पूरी होने के बाद एक विशेष समारोह होता है, जिसमें ये युवक नए कपड़े पहनकर गांव लौटते हैं। इस मौके पर गाना, नृत्य और पारंपरिक अनुष्ठान होते हैं। इसके बाद उन्हें समाज में “पुरुष” का दर्जा मिल जाता है, जिससे उन्हें विवाह, निर्णय लेने और सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार मिलत जाता है।
खतना या मौत का बुलावा?
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ पूर्वी केप प्रांत में ही 1995 से 2004 के बीच खतना के कारण 243 मौतें हुई थीं। इस रिपोर्ट से यह तो साफ है कि अफ्रीका में ये मौतें कोई नई बात नहीं है। साल दर साल ऐसी मौतें होती रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में, यह परंपरा अप्रशिक्षित और फर्जी पारंपरिक सर्जनों द्वारा दागदार हो गई है, जो पैसा कमाने की कोशिश करते हैं लेकिन जिनकी तकनीक में विशेषज्ञता और स्वच्छता की कमी होती है। अधिकारियों के अनुसार लड़के अक्सर संक्रमण, गैंग्रीन या सेप्सिस से मर जाते हैं। खतना अप्रशिक्षित नकली सर्जन करते हैं। लड़के कतार में खड़े होते हैं और सर्जन एक ही चाकू का उपयोग करके, बिना औजार को धोए या कीटाणुरहित किए, कतार में आगे बढ़ते हुए खतना करते जाते हैं।
अवैध दीक्षा केंद्र जाने से नहीं हिचकते युवा
भले ही अवैध दीक्षा केंद्रों में युवाओं की मौत हो रही है, खतने गलत तरीके से हो रहे हैं, लेकिन यह ऐसा जोखिम है, जिसे उठाने के लिए लाखों दक्षिण अफ्रीकी तैयार हैं। अगला सीजन जून में शुरू होगा। यह साल में दो बार होता है। AP ने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ज्वेलिनी मखिजे के संसद में दिए गए एक बयान का भी जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने कहा था- “जरा इस आंकड़े की कल्पना कीजिए, पांच साल की अवधि में 476 युवाओं की मौत हो गई, जबकि दीक्षा-संस्कार में जाने से पहले वे पूरी तरह स्वस्थ थे। ये मौतें बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं हैं और ऐसा कभी नहीं होना चाहिए था।” दिसंबर में दीक्षा के दौरान हुई हालिया मौतों की घोषणा करते हुए, दक्षिण अफ्रीका के पारंपरिक मामलों के मंत्री वेलेनकोसिनी हलाबिसा ने कहा कि प्रतिभागियों को अक्सर दी जाने वाली कुछ अप्रमाणित सलाहों में से एक यह है कि वे जल्दी ठीक होने के लिए पानी न पिएं।
दक्षिण अफ्रीका में दीक्षा प्राप्त करके लौट रहे युवा (फोटो- AP)
महंगी फीस से अवैध खतना केंद्रों को मिल रहा बढ़ावा
दक्षिण अफ्रीका में बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के कारण कई परिवारों के लिए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दीक्षा स्कूलों की फीस वहन करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अवैध दीक्षा स्कूल तेजी से पनप रहे हैं और लोगों के लिए आसान विकल्प बनते जा रहे हैं। “मर्द बनने” की इच्छा में कई किशोर कानूनी उम्र 16 वर्ष से पहले ही इन अवैध शिविरों में शामिल हो जाते हैं, जबकि कानून इसके लिए न्यूनतम आयु निर्धारित करता है। गौतेंग प्रांत से जुड़े अधिकारी म्लुलेकी न्गोमाने के अनुसार, गैर-पंजीकृत दीक्षा स्कूलों की निगरानी करना सरकार के लिए बेहद कठिन है, क्योंकि इनके बारे में तब तक जानकारी नहीं मिलती, जब तक कोई गंभीर घटना सामने न आ जाए। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2022 में ईस्टर्न केप के ओआर टैम्बो नगर क्षेत्र में किए गए एक सर्वे में वैध स्कूलों से अधिक अवैध स्कूल पाए गए- जहां 66 पंजीकृत स्कूलों के मुकाबले 68 गैरकानूनी स्कूल संचालित हो रहे थे। विभिन्न सरकारी और स्वतंत्र जांचों में यह भी सामने आया है कि इन अवैध शिविरों में प्रतिभागियों के साथ दुर्व्यवहार, आपसी हिंसा, शराब का सेवन जैसी गतिविधियां होती हैं। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में लड़कों को जबरन अगवा कर इन दीक्षा प्रक्रियाओं में शामिल करने की घटनाएं भी सामने आई हैं, जो इस परंपरा की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं।
