US-Iran War: राजनीति और कूटनीति की दुनिया में कुछ ही महीनों के भीतर किसी देश के रुख में इतना बड़ा बदलाव कम ही देखने को मिलता है। शनिवार को ईरान के खिलाफ किए गए अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जोखिम सहने की क्षमता के एक नए और अधिक आक्रामक रूप को दुनिया के सामने पेश किया है। जो ट्रंप कुछ महीने पहले तक ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को मारने की इजरायली योजना को यह कहकर ठुकरा चुके थे कि इससे क्षेत्र अस्थिर हो जाएगा, उन्होंने अब उसी योजना को न केवल मंजूरी दी बल्कि खामेनेई की मौत का ऐलान कर सभी गार्डरेल्स को भी तोड़ दिया। आखिर इस बीच ऐसा क्या बदला कि ट्रंप ने अपना इरादा बदल लिया? आइए समझते हैं।
1. वार्ता की विफलता और 'टालमटोल' की राजनीति
ट्रंप प्रशासन ने महीनों तक ईरान के साथ कूटनीतिक रास्ते पर चलने की कोशिश की। AP की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने ईरान को नागरिक उद्देश्यों के लिए एक शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का विकल्प दिया था, जिसमें हमेशा के लिए मुफ्त परमाणु ईंधन का प्रस्ताव भी शामिल था। हालांकि, ईरानी नेतृत्व ने इन प्रस्तावों के जवाब में टालमटोल ही किया। ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर ने आखिरी समय तक बातचीत के जरिए हल निकालने की कोशिश की, लेकिन ईरान की तरफ से कोई ठोस प्रतिक्रिया न मिलना ट्रंप के धैर्य के बांध को तोड़ने वाला अंतिम पत्थर साबित हुआ।
2. सुरक्षा चिंताओं का बढ़ता दबाव, बैलिस्टिक मिसाइल खतरा
ट्रंप ने शनिवार को अपने हमले के पीछे एक बड़ा तर्क यह दिया कि ईरान ऐसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) बना रहा है, जो सीधे अमेरिकी धरती को निशाना बना सकती हैं। भले ही अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों ने कहा था कि ईरान इस तकनीक से अभी कुछ साल दूर है, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे 'इमीडिएट थ्रेट' के रूप में लिया। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि ईरान का मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा करने से इनकार करना अमेरिका के लिए अब असहनीय हो चुका था।
protest against the US Israeli strikes in Tehran
3. सफल अनुभवों से बढ़ा आत्मविश्वास
ट्रंप के इस कड़े फैसले के पीछे उनके पिछले ऑपरेशनों की सफलता का भी हाथ था। इस साल की शुरुआत में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ने के सफल ऑपरेशन ने ट्रंप को यह यकीन दिलाया कि अमेरिकी सैन्य शक्ति सीधे तौर पर किसी भी शासन के मुखिया को निशाना बना सकती है। इसके अलावा, 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या और पिछले जून में ईरान के परमाणु केंद्रों पर किए गए हमलों का ईरान की तरफ से कोई बड़ा हमला न होना भी ट्रंप के इस विश्वास का आधार बना कि वे बिना किसी बड़े परिणाम के ईरान पर सीधा अटैक कर सकते हैं। वे जोखिम लेने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुके थे।
4. ईरान की 'दृढ़ता' और आर्थिक पतन का आकलन
दशकों के प्रतिबंधों और पिछले साल के युद्ध के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था जर्जर हो चुकी थी और सेना भी कमजोर थी। इसके बावजूद ईरानी नेतृत्व ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया। ट्रंप को यह उम्मीद थी कि बड़े पैमाने पर लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों की तैनाती के दबाव में खामेनेई झुक जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब दबाव काम नहीं आया, तो ट्रंप ने 'सब कुछ या कुछ नहीं' की नीति अपनाते हुए सीधे नेतृत्व को खत्म करने का फैसला किया।
rally near white house
5. इजरायल का प्रभाव और रणनीतिक तालमेल
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप को इस 'बैटल प्लान' के लिए लगातार प्रेरित किया। पिछले जून में जहां ट्रंप ने खामेनेई को चेतावनी देकर छोड़ दिया था, इस बार उन्होंने इजरायली खुफिया जानकारी और 'हाईली सोफिस्टिकेटेड ट्रैकिंग सिस्टम' का उपयोग कर ईरान के सर्वोच्च नेता, रक्षा मंत्री और रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर का सफाया करने के ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी।
अनिश्चित है भविष्य
ट्रंप के इस कदम ने ईरान के शासन को कमजोर कर दिया है। रविवार की सुबह ईरानी मीडिया ने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मौत की पुष्टि कर दी है। हालांकि, इसके परिणाम दूरगामी और अनिश्चित हो सकते हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने आश्वासन दिया है कि अमेरिका किसी लंबे युद्ध में नहीं फंसेगा, लेकिन ईरान की संभावित प्रतिक्रिया और क्षेत्र में होने वाला बदलाव अभी भी एक बड़ी पहेली बना हुआ है।
