जब 15 अगस्त की सुबह ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो देश की निगाहें सिर्फ प्रधानमंत्री के भाषण पर नहीं टिकतीं। नजर उस हर बारीकी पर भी होती है, जो उस दिन भारत की कहानी कहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के पहनावे ने पिछले एक दशक से इसी कहानी को एक अलग रंग दिया है। कभी राजस्थान का साफा, कभी गुजरात की बांधनी, कभी केसरिया तो कभी तिरंगे के रंगों की झलक-उनकी पगड़ी और परिधान हर साल देश की किसी न किसी लोक परंपरा, हस्तकला और सांस्कृतिक विरासत को लाल किले तक लेकर आते हैं।
पीएम मोदी की ‘पगड़ी कूटनीति’
80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी यह परंपरा जारी रही। प्रधानमंत्री मोदी पारंपरिक अंदाज में नजर आए, लेकिन उनके पहनावे में तिरंगे के रंगों की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया। सफेद कुर्ते और चॉकलेट ब्राउन वास्कट के साथ राजस्थानी अंदाज का लाल साफा और जेब में केसरिया, सफेद और हरे रंग का पॉकेट स्क्वायर-यह पूरा लुक भारत की सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय भावना का मेल दिखाई दिया।
तो आखिर पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री के साफों में कौन-कौन से रंग और संस्कृतियां नजर आईं? 2014 के जोधपुरी साफे से शुरू हुई यह परंपरा कैसे हर साल एक नए क्षेत्र, नई कला और नई पहचान को लाल किले तक लेकर आई? आइए, तस्वीरों और रंगों के जरिए समझते हैं प्रधानमंत्री मोदी की इस खास ‘पगड़ी कूटनीति’ की कहानी।
लाल किले पर फिर दिखा PM मोदी का अनोखा अंदाज (फोटो- BJP)
80वें स्वतंत्रता दिवस का लुक: राजस्थानी साफा और तिरंगे का स्पर्श
इस वर्ष प्रधानमंत्री मोदी अपनी पारंपरिक और रौबदार शैली में नजर आए। उन्होंने सफेद कुर्ते और चॉकलेट भूरे रंग के वास्कट (Nehru Jacket) के साथ राजस्थानी और गुजराती संस्कृति की प्रतीक पारंपरिक 'लाल साफा' (पगड़ी) धारण किया था।
उनकी इस वेशभूषा का सबसे आकर्षक हिस्सा उनकी जेब में लगा तीन पॉकेट स्क्वायर था, जो केसरिया, सफेद और हरे रंग के संयोजन के साथ भारत के राष्ट्रीय ध्वज का संदेश दे रहा था। यह साफा न केवल देश की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित कर रहा था, बल्कि भारत की प्राचीन बुनकर कला का सम्मान भी था।
सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक: 'पगड़ी कूटनीति'
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी का साफा चुनना महज एक फैशन स्टेटमेंट नहीं है; यह भारत के अलग-अलग राज्यों और उनकी समृद्ध परंपराओं को सीधे लाल किले से जोड़ने का एक अनूठा तरीका है। आइए डालते हैं पिछले कुछ वर्षों की उनकी यादगार पगड़ियों पर एक नजर:
2025: राजस्थानी लहरिया साफा- 79वां स्वतंत्रता दिवस
चटख रंगों वाला राजस्थानी लहरिया साफा, जिसमें नारंगी, पीले और हरे रंग की लहराती छटाएं शामिल थीं। यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का सीधा प्रतीक बना।2025: राजस्थानी लहरिया साफा (फोटो- PTI)
2024: सफेद कुर्ता-पायजामा 78वां स्वतंत्रता दिवस
प्रधानमंत्री मोदी ने सफेद कुर्ता-पायजामा और नीली जैकेट के साथ नारंगी और हरे रंग का साफा धारण किया था।
2023: बांधनी प्रिंट और काले रंग की जैकेट-77वां स्वतंत्रता दिवस
पीले, हरे और लाल रंगों वाली प्रामाणिक बांधनी प्रिंट की पगड़ी, जिसे पीएम मोदी ने काले रंग की ‘वी-नेक जैकेट’ के साथ पेयर किया था।2022: लाल बूटेदार केसरिया साफा- 76वां स्वतंत्रता दिवस
आजादी के अमृत महोत्सव के वर्ष में उन्होंने लाल बूटेदार केसरिया पगड़ी के साथ नीली जैकेट और पारंपरिक स्टोल पहना।
2021: क्रीम और केसरिया रंग- 75वां स्वतंत्रता दिवस
आधे आस्तीन के कुर्ते के साथ क्रीम और केसरिया रंग का लंबा साफा, जो सरलता और लालित्य का अनूठा मिश्रण था।
2020: गमछा और सादगी (कोविड काल)- 74वां स्वतंत्रता दिवस
वैश्विक महामारी के बीच उन्होंने सुरक्षा और जागरूकता का संदेश देते हुए भगवा किनारी वाला सफेद गमछा अपने चेहरे पर बांधा था।
2014: जोधपुरी साफे से शुरुआत- 68वां स्वतंत्रता दिवस
प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में उन्होंने चटख लाल रंग का जोधपुरी बांधनी साफा पहना था, जिसने एक नई परंपरा की नींव रखी।
2014: जोधपुरी साफे से शुरुआत (फोटो- PTI)
2015 से 2018: रंगों का अनूठा सफर
प्रधानमंत्री मोदी के शुरुआती वर्षों के साफे भी उतने ही रंगीन और विविधता से भरे रहे हैं:
- 2018: पूरी तरह केसरिया रंग का साफा, जो बेहद प्रभावशाली और ऊर्जावान छाप छोड़ गया।
- 2017: चटख लाल और पीले रंग का मिला-जुला राजस्थानी साफा।
- 2016: गुलाबी और पीले रंग का कॉम्बिनेशन, जो बेहद सौम्य नजर आया।
- 2015: पीले रंग पर बहुरंगी आड़ी-तिरछी धारियों वाला साफा।
लाल किले की प्राचीर से 'वोकल फॉर लोकल' का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी की हर स्वतंत्रता दिवस की पगड़ी भारत के किसी न किसी कोने-विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, उत्तर भारत और पूर्वोत्तर-की हस्तकला से जुड़ी होती है। जब देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से इन पारंपरिक साफ़ों को पहनते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश के स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और स्वदेशी वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देता है।
यही वजह है कि हर साल 15 अगस्त की सुबह पूरे देश में भाषण के साथ-साथ इस बात की भी उत्सुकता रहती है कि-"आज प्रधानमंत्री किस रंग और किस राज्य की संस्कृति के रंग में रंगे नजर आएंगे?"
