PM Modi Foreign Policy: साल 2026 के पहले सात महीने भारत की विदेश नीति और व्यापार के लिए बेहद अहम साबित हुए हैं। एक तरफ जहां भारत ने यूरोपीय संघ (EU), ब्रिटेन (UK) और न्यूजीलैंड जैसे बड़े आर्थिक साझेदारों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को अंतिम रूप दिया, वहीं दूसरी ओर इंडोनेशिया को ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइल का सौदा कर रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी नई ऊंचाई हासिल की। पीएम मोदी की 14 देशों की यात्रा, 3 बड़े FTA, 52 हजार करोड़ रुपये की घरेलू रक्षा खरीद और 37 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार व रणनीतिक सौदों के साथ सरकार यह दावा कर रही है कि उसकी विदेश नीति अब सिर्फ समझौतों की नहीं, बल्कि नतीजे देने वाली कूटनीति बन चुकी है। ऐसे में सवाल है कि क्या 2026 भारत के लिए वैश्विक प्रभाव बढ़ाने वाला निर्णायक साल साबित हो रहा है? आइए आंकड़ों और समझौतों के जरिए समझते हैं।
तीन FTA और भारत की बल्ले-बल्ले
पीएम मोदी की इन यात्राओं की सबसे बड़ी उपलब्धि व्यापार क्षेत्र में दिखाई देती है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगभग दो दशक से चल रही वार्ताओं के बाद जनवरी 2026 में FTA के व्यापक ढांचे पर सहमति बनी। यह समझौता दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक बाजारों में से एक को जोड़ता है। इस डील को 'मदर ऑफ ऑल डील' (Mother of All Deals) कहा जा रहा है। सरकार का अनुमान है कि इससे 2030 तक भारतीय निर्यात में 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। कपड़ा, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण, कृषि और आईटी सेवाएं इससे सबसे अधिक लाभान्वित होने वाले क्षेत्र माने जा रहे हैं।
इसी तरह भारत-यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) जुलाई 2026 से प्रभावी हो गया है। इससे भारतीय वस्त्र, फुटवियर और इंजीनियरिंग उत्पादों को ब्रिटिश बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी।
अप्रैल 2026 में भारत और न्यूजीलैंड के बीच भी FTA पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के तहत भारतीय निर्यात को न्यूजीलैंड में शून्य शुल्क पहुंच मिलेगी, जबकि न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर तक निवेश को प्रोत्साहित करने का वादा किया है। यह समझौता 118 सेवा क्षेत्रों को भी कवर करता है और 5,000 कुशल भारतीय कामगारों के लिए नया वीजा मार्ग खोलता है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर (फोटो- PIB)
रक्षा निर्यात में भारत की बड़ी छलांग
भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि रक्षा निर्यातक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जुलाई 2026 में इंडोनेशिया के साथ हुआ 630 मिलियन डॉलर का रक्षा समझौता है। इस समझौते के तहत भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल निर्यात करेगा। फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस खरीदने वाला दूसरा देश बन गया है, जबकि अस्त्र मिसाइल का यह पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक होगा। यह सौदा भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' को मजबूत करने के साथ-साथ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को भी बढ़ाता है।
एक नजर में 2026 की बड़ी उपलब्धियां
| क्षेत्र | प्रमुख उपलब्धि |
| FTA | EU, UK और न्यूजीलैंड के साथ 3 बड़े समझौते |
| निर्यात | 2030 तक 50 अरब डॉलर अतिरिक्त निर्यात की संभावना |
| रक्षा निर्यात | इंडोनेशिया को 630 मिलियन डॉलर का मिसाइल सौदा |
| घरेलू रक्षा खरीद | 52,000 करोड़ रुपये की मंजूरी |
| रक्षा निर्यात रिकॉर्ड | FY26 में 38,424 करोड़ रुपये |
| कुल आर्थिक परिणाम | 37 अरब डॉलर से अधिक |
घरेलू रक्षा उत्पादन को भी मिला बढ़ावा
जहां एक ओर भारत हथियारों का निर्यात बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती दी जा रही है। जुलाई 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने 52,000 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद को मंजूरी दी। इसमें कामिकाज़े ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और अत्याधुनिक सैन्य तकनीकें शामिल हैं। इससे पहले अप्रैल और मई 2026 में भी भारतीय कंपनियों को रक्षा क्षेत्र में हजारों करोड़ रुपये के अनुबंध दिए गए थे। यह आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा निर्यात
भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये पहुंच गया है। तुलना करें तो 2004 में यह आंकड़ा केवल 162 करोड़ रुपये था। सरकार ने वर्ष 2029 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। ब्रह्मोस और अस्त्र जैसे स्वदेशी हथियार इस लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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यूरोप, पश्चिम एशिया और इंडो-पैसिफिक में क्या मिला?
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान कई देशों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक समझौते हुए। यूएई के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और शिप रिपेयर क्षेत्र में साझेदारी बढ़ी। फ्रांस के साथ राफेल-मरीन, स्कॉर्पीन पनडुब्बी और जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना पर प्रगति हुई। नीदरलैंड के साथ सेमीकंडक्टर और ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन को मजबूत करने की दिशा में काम हुआ, जबकि इजराइल, मलेशिया, स्वीडन, नॉर्वे और इटली के साथ रक्षा, डिजिटल तकनीक, जलवायु और विनिर्माण क्षेत्रों में नए समझौते हुए।
आखिर इन समझौतों का भारत को क्या फायदा?
इन सभी समझौतों का सबसे बड़ा फायदा भारतीय उद्योगों और निर्यातकों को मिलेगा। एफटीए के जरिए भारतीय उत्पादों को बड़े वैश्विक बाजारों में आसान पहुंच मिलेगी। रक्षा निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होगी और घरेलू रक्षा उद्योग को नए अवसर मिलेंगे। इसके अलावा विदेशी निवेश, नई तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका मजबूत होगी। इससे रोजगार सृजन और विनिर्माण क्षेत्र को भी फायदा मिलने की उम्मीद है।
