IDBI Bank Selling : 1957 का मूंदड़ा घोटाला (Mundhra Scam) एक बार फिर चर्चा में है। यह वही मामला था, जिसमें LIC के करीब ₹1.26 करोड़ के निवेश पर सवाल उठे थे और तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले को उजागर करने वाले शख्स फिरोज गांधी थे, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामाद और इंदिरा गांधी के पति थे। उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार को संसद में घेरा था।
अभी क्यों चर्चा में आया यह मामला?
फिलहाल यह मामला IDBI Bank की हिस्सेदारी बेचने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बीच शुरू हुई राजनीतिक बहस की वजह से चर्चा में है। इस बहस के चलते ही सीतारमण ने आजादी के बाद देश के शुरुआती बड़े वित्तीय घोटालों में से एक का जिक्र किया।
राहुल गांधाी ने क्या कहा?
इस बिक्री का विरोध करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के औद्योगिक विकास के लिए IDBI जैसे बैंक स्थापित किए गए, जबकि मौजूदा सरकार बैंकों को बेच रही है। उन्होंने IDBI Bank के कर्मचारियों के प्रति समर्थन भी जताया।
सीतारमण ने क्या जवाब दिया?
इसके जवाब में 30 अक्टूबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के शासनकाल में बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर कथित राजनीतिक दबाव के कई उदाहरण गिनाए। इसी क्रम में उन्होंने 1957 के मूंदड़ा घोटाले का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि कारोबारी हरिदास मूंदड़ा को कांग्रेस नेताओं के प्रभाव के चलते LIC से पैसा मिला था।
क्या है IDBI बिक्री का मामला?
IDBI Bank की हिस्सेदारी बेचने का मामला केंद्र सरकार की रणनीतिक विनिवेश योजना से जुड़ा है। केंद्र सरकार और LIC मिलकर बैंक में अपनी 60.72% हिस्सेदारी बेच रहे हैं। इसमें केंद्र सरकार की 30.48% और LIC की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है। 14 अक्टूबर, 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) ने कनाडा की Fairfax Financial Holdings से जुड़ी कंपनी Canada Inc को सफल रणनीतिक खरीदार के रूप में मंजूरी दी। इस सौदे का मूल्य ₹52,878.08 करोड़ तय हुआ है।
मूंदड़ा घोटाला था क्या?
मूंदड़ा घोटाले को देश के वित्तीय बाजार का पहला घोटाला कहा जाता है। इस पूरे मामले के केंद्र में कोलकाता का कारोबारी और शेयर बाजार का ऑपरेटर हरिदास मूंदड़ा था। उसने अलग-अलग कंपनियों का अधिग्रहण करके अपना बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया। हालांकि, इस विस्तार के लिए उसने सरकारी कंपनियों से भारी कर्ज भी लिया था। 1957 तक उसकी कई कंपनियां वित्तीय संकट से जूझने लगीं। इसी दौरान LIC ने मूंदड़ा से जुड़ी 6 कंपनियों के शेयर खरीदने का फैसला किया। यह सौदा करीब ₹1,26,86,100 यानी लगभग ₹1.27 करोड़ का था।
1. ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन
2. जेसप एंड कंपनी3. रिचर्डसन एंड क्रूडास
4. स्मिथ स्टैनिस्ट्रीट एंड कंपनी
5. ओस्लर इलेक्ट्रिक लैम्प मैन्युफैक्चरिंग कंपनी
6. एंजेलो ब्रदर्स
कैसे निवेश बन गया घोटाला?
विवाद सिर्फ इस बात को लेकर नहीं था कि LIC ने मूंदड़ा की कंपनियों में पैसा लगाया। असली सवाल निवेश के तरीके को लेकर था। सामान्य तौर पर LIC को अच्छी वित्तीय स्थिति वाली कंपनियों में निवेश करना था और इसके लिए उसकी इन्वेस्टमेंट कमेटी की सलाह अहम थी।
लेकिन इस सौदे में शेयर बाजार के सामान्य कारोबार के बजाय मूंदड़ा के साथ सीधे कीमत तय करके तेजी से शेयर खरीदे गए। LIC की इन्वेस्टमेंट कमेटी से भी सलाह नहीं ली गई। इसके अलावा जिन कंपनियों के शेयर खरीदे गए, उनकी बाजार कीमतों में गिरावट आ रही थी।
फिरोज गांधी ने खोला मोर्चा
मूंदड़ा मामले को देशव्यापी चर्चा में लाने का श्रेय कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी को जाता है। वह रायबरेली से सांसद थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामाद थे। वह इंदिरा गांधी के पति भी थे। नवंबर 1957 में संसद में इस निवेश को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए थे। वित्त मंत्रालय ने स्वीकार किया कि LIC ने करीब ₹1.26 करोड़ का निवेश ऐसी कंपनियों में किया है, जिनमें मूंदड़ा की हिस्सेदारी थी।
क्या थी फिरोज गांधी की आपत्ति?
सरकार के जवाब से फिरोज गांधी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने मामले की पड़ताल की और 16 दिसंबर, 1957 को लोकसभा में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। फिरोज गांधी ने सवाल किया कि देश की एक बड़ी सार्वजनिक वित्तीय संस्था LIC आखिर एक ऐसे कारोबारी के साथ संदिग्ध सौदे का हिस्सा कैसे बन गई, जिसकी कंपनियां वित्तीय संकट में थीं?
सरकार को झुकना पड़ा
फिरोज गांधी की दलील थी कि LIC पॉलिसीधारकों के पैसे का इस्तेमाल कर रही है। इसलिए उसके निवेश पर संसद की निगरानी और जवाबदेही जरूरी है। यह मामला इसलिए भी खास था क्योंकि फिरोज गांधी अपनी ही पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे थे। उस समय कांग्रेस की सरकार बेहद मजबूत स्थिति में थी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। फिरोज गांधी के सवालों के बाद नेहरू सरकार पर दबाव बढ़ा। प्रधानमंत्री ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए न्यायिक जांच कराने का फैसला किया।
कारोबारी हरिदास मूंदड़ा ने रचा पूरा घोटाला
चागला आयोग की जांच में हुए बड़े खुलासे
सरकार ने 7 जनवरी, 1958 को बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एमसी चागला की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया। इस आयोग को LIC द्वारा मूंदड़ा से जुड़ी कंपनियों में किए गए निवेश की जांच करनी थी। इसकी सुनवाई सार्वजनिक रूप से हुई। जांच में आयोग ने पाया कि LIC का निवेश सामान्य कारोबारी नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुरूप नहीं था।
बाजार से सरकार तक उलझे तार
आयोग ने यह भी पाया कि तत्कालीन वित्त मंत्रालय में प्रिंसिपल फाइनेंस सेक्रेटरी एचएम पटेल ने LIC के चेयरमैन केआर कामथ को शेयर खरीदने के निर्देश दिए थे। हालांकि, इस बात पर विवाद था कि पटेल ने यह फैसला अपने स्तर पर लिया था या तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी की मंजूरी से। पटेल का कहना था कि वित्त मंत्री को इसकी जानकारी थी और उनकी सहमति थी। वहीं कृष्णमाचारी का पक्ष था कि उन्होंने सिर्फ सचिव को प्रस्ताव की जांच करने के लिए कहा था। चागला आयोग ने माना कि मंत्री सिर्फ यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि सौदे को लागू करने का काम अधीनस्थ अधिकारियों ने किया था। यानी विवाद के तार अब LIC से होते हुए वित्त मंत्रालय और संसद तक पहुंच चुके थे।
टीटी कृष्णमाचारी को देना पड़ा इस्तीफा
चागला आयोग की रिपोर्ट ने नेहरू सरकार की मुश्किलें बढ़ा दीं। रिपोर्ट 11 फरवरी, 1958 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास पहुंची। इसके अगले दिन यानी 12 फरवरी 1958 को नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। नेहरू ने अपने पत्र में स्वीकार किया कि LIC के निवेश से जुड़े इस मामले में कई ऐसे काम हुए, जो सामान्य नियमों और परंपराओं के अनुरूप नहीं थे। वित्त मंत्री के अलावा इस विवाद का असर दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों पर भी पड़ा। वित्त मंत्रालय के एचएम पटेल और LIC के चेयरमैन केआर कामथ ने भी अपने पद छोड़ दिए।
चंदे का एंगल भी आया सामने
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। बाद में जस्टिस विवियन बोस की अध्यक्षता में एक और जांच हुई। इस बोर्ड को अधिकारियों की भूमिका और पूरे मामले के अन्य पहलुओं की जांच करनी थी। इस जांच में किसी व्यक्ति के इस सौदे से व्यक्तिगत रूप से लाभ कमाने का सबूत नहीं मिला, लेकिन यह जरूर माना गया कि कई प्रक्रियागत अनियमितताएं हुई थीं। जांच में यह भी सामने आया कि 1957 के दौरान हरिदास मूंदड़ा ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस को ₹1 लाख और ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) को ₹1.5 लाख का चंदा दिया था। यह चुनावी साल था। हालांकि, इस चंदे का खुलासा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि LIC का निवेश किसी राजनीतिक लेनदेन के तहत हुआ था।
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