Times Now Navbharat Explainer: भारत की खेती-किसानी और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लग गया है। जून की शुरुआत में देश के कुछ हिस्सों में समय से पहले दस्तक देने के बाद, मानसून पिछले दो हफ्तों से एक ही जगह पर ठिठका हुआ है। इस सुस्ती ने देश के बड़े हिस्से को झुलसाने वाली गर्मी के भरोसे छोड़ दिया है और सीजन की शुरुआती बारिश के घाटे (Rainfall Deficit) को बढ़ाकर 35 फीसदी तक पहुंचा दिया है। मुंबई से लेकर मध्य भारत के किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं, लेकिन बादल हैं कि आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे। आखिर मानसून का यह पावरफुल इंजन बीच रास्ते में क्यों रुक गया? आइए आसान भाषा में समझते हैं।
क्यों रुक गया मानसून?
पिछले कुछ दिनों से मानसून की रफ्तार काफी सुस्त पड़ गई है। बारिश की दर में भी ठीक ठाक गिरावट देखी जा रही है। एक सप्ताह का हाल देखें तो मौसम विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर,ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, तमिल नाडु और केरलम में सामान्य से कम बारिश हुई है। इन राज्यों में हफ्ते भर में 20 फीसदी से 99 फीसदी तक बारिश की कमी दर्ज की गई है। इसके मोटे तौर पर तीन कारण दिखाई दे रहे हैं।
1. सूखी हवाओं की दीवार (Dry Air Intrusion)
गर्मी में लू के थपेड़ों से राहत के लिए देशभर के लोगों को मानसून का इंतजार था 3 दिनों की देरी से 4 जून को ये देश के प्रायद्वीप हिस्से में दाखिल भी हो गया लेकिन अभी इसकी गरारी फंसी हुई है, जिसका कारण हैं गर्म हवाएं। मानसून के साथ गर्म हवाओं का कहर कम नहीं हुआ। जून के पहले पखवाड़े में पश्चिमी और मध्य भारत में लगातार सूखी और गर्म हवाएं घुसती रहीं। इन्होंने नमी वाले बादलों को बनने ही नहीं दिया और एक अदृश्य दीवार की तरह मानसून को रोक दिया।
2. सोमाली जेट का सुस्त पड़ना (Somali Jet)
सोमाली जेट मानसून का 'कन्वेयर बेल्ट' या 'सप्लाई चेन' है। जैसे किसी फैक्ट्री में सामान पहुंचाने के लिए तेजी से चलने वाला बेल्ट होता है, वैसे ही यह तेज गति वाली हवा अफ्रीका के तट से अरब सागर होते हुए भारत की तरफ बादलों और नमी का भारी स्टॉक लाती है। इस साल यह बेल्ट बेहद धीमी गति से चल रही है। जब क्षमता से कम रफ्तार पर इंजन चलेगा, तो महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों तक नमी पहुंचना बंद हो जाएगी।
3. क्रॉस-इक्विटोरियल फ्लो (Cross-Equatorial Flow)
इसे आप एक 'पंप' से समझ सकते हैं, जो भूमध्य रेखा (Equator) के पार दक्षिणी गोलार्ध से ठंडी और भारी नमी वाली हवा को खींचकर भारतीय मुख्य भूमि की तरफ धकेलता है। हाल के दिनों में यह पंप भी कमजोर साबित हुआ है, जिससे बादलों को आगे बढ़ने के लिए जरूरी 'धक्का' नहीं मिल पा रहा है।
IMD Weekly Rainfall Information
'सुपर अल नीनो' का साया और जून का इतिहास
इस साल की सुस्ती ने वैज्ञानिकों को इसलिए ज्यादा डराया है क्योंकि वैश्विक स्तर पर इसे 'सुपर अल नीनो' (Super El Niño) का साल घोषित किया जा रहा है। जब प्रशांत महासागर की सतह सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाती है, तो वह दुनिया भर के मौसम चक्र को बिगाड़ देती है। भारत के संदर्भ में, अल नीनो मानसून की हवाओं को कमजोर करने और सूखा लाने के लिए जाना जाता है। अमेरिकी एजेंसी NOAA ने चेतावनी दी है कि इस सर्दी तक इसके 'बेहद मजबूत' होने की आशंका 63% है। हालांकि, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का कहना है कि जून के महीने में अल नीनो का सीधा असर हमेशा नहीं दिखता। इतिहास गवाह है कि साल 2015 में इतिहास का सबसे मजबूत अल नीनो था, लेकिन उस साल जून में सामान्य से 14% ज्यादा बारिश हुई थी। साल 2002 और 2004 भीषण सूखे पर खत्म हुए, लेकिन इनका जून का महीना बिल्कुल सामान्य रहा था। सूखा जुलाई के बाद आया था।
लेकिन इसमें एक पेंच भी है। साल 2009 और 2014 ऐसे साल थे जब जून में ही 40% से ज्यादा बारिश की कमी हुई थी। इस साल जून में 35% का कमी उसी डरावने पैटर्न की याद दिला रहा है।
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मानसून और पछुआ हवाओं की जंग
मानसून के अटकने के पीछे उत्तर भारत की तरफ से आ रही पछुआ हवाएं (Westerly Winds) भी जिम्मेदार हैं। एक तरफ से सर्दियों के विदा हुए 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' (पश्चिमी विक्षोभ) की हवाएं आ रही हैं, तो दूसरी तरफ से मानसून आगे बढ़ रहा है। जब मानसून मजबूत होता है, तो वह इन हवाओं से 'हाथ मिलाकर' उत्तर भारत में भारी बारिश कराता है। लेकिन जब मानसून खुद कमजोर हो, तो ये पछुआ हवाएं उसे वापस धकेल देती हैं, जैसा अभी हो रहा है।
खेती, महंगाई और थाली पर क्या होगा असर?
मानसून की इस सुस्ती का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आपकी थाली पर पड़ सकता है, और यही फिलहाल सबसे बड़ी चिंता है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आपात बैठक कर राज्यों को कम बारिश वाले जिलों की पहचान करने और 'क्रॉप कन्टिनजेंसी प्लान' (आपातकालीन फसल योजना) तैयार रखने को कहा है। किसानों को धान जैसी ज्यादा पानी वाली फसलों के बजाय कपास और दालों की बुआई करने की सलाह दी जा रही है। इसके अलावा रिजर्व बैंक (RBI) भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। अगर जून के आखिरी हफ्ते तक बारिश सामान्य नहीं हुई, तो खरीफ फसलों का उत्पादन घटेगा, जिससे खाद्य महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।
यही नहीं अल नीनो के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव है। चीन ने डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है, और गैस की बढ़ती कीमतों से घरेलू यूरिया का उत्पादन भी महंगा हो रहा है।
कब फिर से दौड़ेगा मानसून?
तमाम चिंताओं के बीच राहत की खबर यह है कि मानसून का यह गतिरोध अब टूटने वाला है। मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि 20 जून 2026 के आसपास सूखी हवाओं की दीवार कमजोर होगी और सोमाली जेट फिर से रफ्तार पकड़ेगा। अरब सागर से नमी का आगमन तेजी से बढ़ेगा, जिससे इस सप्ताह के आखिर से महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश में बारिश का दौर दोबारा शुरू हो सकता है। हालांकि, मुंबई और कोंकण बेल्ट में भारी बारिश के लिए 24-25 जून तक का इंतजार करना पड़ सकता है।
