पश्चिम एशिया में जारी जंग अब एक नया मोड़ लेती दिख रही है, जहां मिसाइल और ड्रोन नहीं बल्कि पानी हथियार बनता हुआ दिख रहा है। इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी इस जंग में पहले ही कई खाड़ी देश लपेटे में आ चुके हैं। UAE से लेकर बहरीन तक और ईरान से लेकर लेबनान तक पर हमले हो रहे हैं। अभी तक ये हमले सैन्य बेस, तेल की रिफाइनरी, हथियार भंडार और अमेरिकी दूतावास तक सीमित थी। अमेरिका और इजराइल मिसाइलों और लड़ाकू विमानों से हमला बोल रहे हैं, जबकि ईरान मिसाइलों और ड्रोन से। लेकिन अब ये हमला पानी पर शिफ्ट होते दिख रहे हैं।
पानी के डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला
ईरान ने रविवार को दावा किया कि अमेरिका उसके पानी प्लांट को निशाना बनाकर हमला कर रहा है। अभी तक इस हमले में पानी के प्लांट्स को निशाना नहीं बनाया गया था। खाड़ी देशों में पीने के पानी की बहुत किल्लत है और ज्यादातर देश समुद्री पानी को पीने के पानी में बदलते हैं, जिसके लिए बड़े-बड़े प्लांट्स लगाए गए हैं। ईरान की ओर से इस दावे ने उस जंग की ओर इशारा कर दिया, जिसे लेकर पहले से ही आशंका जताई जा रही थी। ईरान के इस दावे के बाद बहरीन के पानी प्लांट पर भी हमले की खबर आ गई है। मतलब ईरान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है, जो बहुत ही घातक सिद्ध हो सकती है। आज से पहले भी फुजैरा और कुवैत के प्लांट प्रभावित हो चुके है, लेकिन तब यह हमला सीधे नहीं किया गया था, बल्कि इसे कॉलेटरल डैमेज कहा गया था।
जंग के दौरान पानी के प्लांट पर हमले का दावा
ईरान का पानी का सिस्टम
ईरान का पानी का सिस्टम कई स्रोतों और पारंपरिक-आधुनिक तकनीकों के मिश्रण पर आधारित है। ईरान में पानी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भूमिगत जल से आता है। हजारों कुएं और बोरवेल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद हैं। ईरान की पारंपरिक कनात प्रणाली हजारों साल पुरानी है। इसमें पहाड़ों के नीचे बने भूमिगत सुरंगों के जरिए पानी को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाया जाता है। ईरान ने नदियों पर कई बांध और जलाशय बनाए हैं, जिनसे शहरों और खेतों के लिए पानी जमा किया जाता है। खाड़ी क्षेत्र के पास स्थित शहरों में समुद्र के पानी को साफ करके पीने योग्य बनाने वाले डिसैलिनेशन प्लांट भी लगाए गए हैं।
खाड़ी देशों का पानी का सिस्टम
ईरान में जहां पीने के पानी का कुछ हिस्सा प्राकृतिक तरीके से मिल जाता है, वहीं खाड़ी देशों में इसकी काफी कमी है। यहां समुद्री पानी को ही मीठा करके पीने योग्य पानी बनाया जाता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बहुत कम हैं और बारिश भी बेहद कम होती है। इसलिए ये देश अपनी पानी की जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्र के पानी को शुद्ध करके पूरा करते हैं। इन देशों के तटीय इलाकों में बड़े-बड़े डिसैलिनेशन प्लांट लगे हैं, जो फारस की खाड़ी या ओमान सागर के खारे पानी को प्रोसेस करके पीने योग्य बनाते हैं। इसके बाद पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए यह पानी शहरों और उद्योगों तक पहुंचाया जाता है। कई खाड़ी देशों में पीने के पानी का 60 से 90 प्रतिशत तक हिस्सा इसी प्रक्रिया से आता है। जिसमें कुवैत (90%), ओमान (86%), और सऊदी अरब (70%) प्रमुख हैं।
खारा पानी कैसे बनता है मीठा (AI Photo)
जब तबाह हुआ था कुवैत का सिस्टम
1991 की खाड़ी युद्ध के दौरान ईराक ने कुवैत में पानी का प्लांट खराब कर दिया था। दरअसल जब सद्दाम हुसैन की सेना हारने लगी थी, तब उसने डिसैलिनेशन इनटेक में कच्चा तेल डाल दिया था, जिससे कुवैत में पीने के पानी का संकट पैदा हो गया था। जिसे सही करने में कुवैत को सालों लगे थे।
अगर पश्चिम देश में तबाह हुआ पानी का सिस्टम तब क्या होगा?
अगर पश्चिम एशिया (खाड़ी क्षेत्र) में पानी का सिस्टम तबाह हो जाता है, तो इसका असर बेहद गंभीर हो सकता है। पानी की सप्लाई रुकने से सबसे पहले पीने के पानी, अस्पतालों, उद्योगों और बिजली उत्पादन पर असर पड़ेगा। कई खाड़ी देशों में बिजली घर भी समुद्री पानी पर आधारित कूलिंग सिस्टम से चलते हैं, इसलिए पानी की कमी से ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा कृषि, खाद्य आपूर्ति और दैनिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े पैमाने पर डिसैलिनेशन प्लांट नष्ट हो जाएं, तो लाखों लोगों को पानी के संकट का सामना करना पड़ सकता है और मानवीय संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए पश्चिम एशिया में पानी का सिस्टम सिर्फ बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा माना जाता है।
