अमेरिका-इजराइल और ईरान संघर्ष के बीच एक शब्द बार-बार सुनने को मिल रहा है- इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी कि IRGC, आखिर ये आईआरजीसी है क्या, जिसे अमेरिका से लेकर यूरोप तक आतंकी मानता है। आज की तारीख में अमेरिका और इजराइल को सबसे गहरे जख्म इसी IRGC ने दिए हैं। दरअसल IRGC ईरान की वो ताकत है, जिसे सेना से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता है। कहने को तो अर्द्धसैनिक बल है, लेकिन ताकत के मामले में यह ईरान में नंबर वन है। ईरान की सत्ता की सर्वोच्च शक्ति, सत्ता के समानांतर सिस्टम और रिपोर्टिंग सिर्फ सुप्रीम लीडर को। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं है।
IRGC की स्थापना कब और क्यों हुई थी?
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की स्थापना 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के तुरंत बाद की गई थी। इस संगठन का गठन 5 मई 1979 को ईरान के पहले सर्वोच्च नेता रूहोल्लाह खुमैनी (Ruhollah Khomeini) के आदेश पर किया गया था। शुरुआत में IRGC किसी नियमित सेना की तरह संगठित नहीं था। इसमें क्रांति के दौरान सक्रिय रहे विभिन्न इस्लामिक मिलिशिया और स्वयंसेवी लड़ाके शामिल थे। प्रारंभिक वर्षों में इसके पास आधुनिक हथियार, सैन्य ढांचा या व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं था। इसका काम मुख्य रूप से क्रांति विरोधियों पर नजर रखना और आंतरिक सुरक्षा संभालना था।
ईरान में इस्लामी सरकार की मांग करते हुए लोग (फोटो- Islamic Revolution Document Center)
IRGC की स्थापना के उद्देश्य
- इस्लामिक क्रांति की रक्षा के लिए- 1979 की क्रांति के बाद नई सरकार को डर था कि पुराने शासन के समर्थक या विदेशी ताकतें सत्ता को पलटने की कोशिश कर सकती हैं। इसलिए क्रांति की रक्षा के लिए अलग सैन्य बल बनाया गया।
- पारंपरिक सेना पर अविश्वास- क्रांति से पहले ईरान की सेना शाह के नियंत्रण में थी। नई इस्लामिक सरकार को सेना की वफादारी पर पूरी तरह भरोसा नहीं था, इसलिए एक अलग वैचारिक सेना बनाई गई।
- इस्लामिक व्यवस्था की सुरक्षा- IRGC का मुख्य उद्देश्य सिर्फ देश की रक्षा करना नहीं, बल्कि ईरान की इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्था और उसके नेताओं की सुरक्षा करना भी था।
- आंतरिक और बाहरी दुश्मनों से मुकाबला- यह संगठन देश के अंदर विरोधी समूहों और बाहर से आने वाले खतरों से निपटने के लिए बनाया गया।
कब और कैसे बढ़ी IRGC की शक्ति
1980 में शुरू हुए ईरान-ईराक वॉर ने IRGC को तेजी से मजबूत कर दिया। युद्ध के दौरान इसमें लाखों स्वयंसेवकों की भर्ती हुई, अलग कमांड स्ट्रक्चर बना और इसे आधुनिक हथियारों व प्रशिक्षण तक पहुंच मिली। इसी दौर में यह एक संगठित सैन्य शक्ति बन गया। IRGC को धीरे-धीरे अपनी अलग जमीनी सेना, नौसेना, एयर फोर्स और मिसाइल कमांड मिल गया। यह ईरान की नियमित सेना से अलग काम करता है और सीधे सर्वोच्च नेता के आदेश का पालन करता है। इसी कारण इसकी राजनीतिक और सैन्य शक्ति दोनों बढ़ती गई। समय के साथ IRGC ने निर्माण, ऊर्जा, तेल-गैस, टेलीकॉम और बुनियादी ढांचे जैसी कई आर्थिक परियोजनाओं में हिस्सा लेना शुरू किया। सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और कंपनियों के जरिए यह आर्थिक रूप से भी बेहद ताकतवर हो गया। ईरान की संसद, सरकार और प्रशासन में भी कई ऐसे नेता रहे हैं जिनका संबंध IRGC से रहा है। इससे यह संगठन केवल सैन्य ही नहीं बल्कि राजनीतिक प्रभाव का भी बड़ा केंद्र बन गया।
1979 में एक क्रांतिकारी फायरिंग स्क्वाड (फोटो- w:Jahangir Razmi)
आज के समय में IRGC
समय के साथ IRGC एक साधारण सैन्य बल से आगे बढ़कर ईरान की सबसे शक्तिशाली संस्थाओं में से एक बन चुका है। आज IRGC केवल एक सैन्य संगठन नहीं है, बल्कि सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का संगम बन चुका है। इसी वजह से इसे ईरान की सत्ता संरचना में सबसे प्रभावशाली संस्थाओं में गिना जाता है। कई विश्लेषकों के अनुसार आज ईरान की सरकार और उसकी रणनीतिक नीतियां काफी हद तक इसी संगठन पर निर्भर हैं। ईरान की पारंपरिक सेना के साथ-साथ IRGC देश की सुरक्षा का प्रमुख स्तंभ है। मिसाइल कार्यक्रम, ड्रोन क्षमता और कई संवेदनशील सैन्य परियोजनाएं इसी के नियंत्रण में हैं। बाहरी खतरे या युद्ध जैसी स्थिति में सरकार सबसे पहले इसी संगठन पर भरोसा करती है। देश के भीतर विरोध प्रदर्शन या अस्थिरता की स्थिति में भी IRGC अहम भूमिका निभाता है। कई बार आंतरिक सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार इसी पर निर्भर रहती है।
ईरान के बाहर भी IRGC है ताकतवर
मध्य पूर्व में ईरान के प्रभाव को बढ़ाने में IRGC की बड़ी भूमिका है। इसकी विशेष इकाई कुद्स फोर्स क्षेत्र के कई सहयोगी समूहों और नेटवर्क के साथ काम करती है। IRGC की विशेष इकाई “कुद्स फोर्स” ने इजराइल और अमेरिका के खिलाफ ईरान के कथित “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। इसने सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर असद, लेबनान के संगठन हिज्बुल्लाह और यमन के हूती विद्रोही जैसे समूहों को समर्थन दिया, उन्हें खड़ा किया। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि इसी फोर्स ने इराक में अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ घातक बम बनाने और इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही, उस पर विदेशों में विरोधियों को निशाना बनाने के लिए आपराधिक गिरोहों का सहारा लेने के आरोप भी लगे हैं। गार्ड की अपनी खुफिया शाखा भी है। उस पर दोहरी नागरिकता रखने वाले या पश्चिमी देशों से जुड़े लोगों को जासूसी के आरोप में बंद सुनवाई में गिरफ्तार करने का आरोप है। पश्चिमी देशों का कहना है कि ऐसे कैदियों का इस्तेमाल परमाणु वार्ताओं में दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (फोटो- AP)
कई देश कर चुके हैं आतंकवादी सूची में शामिल
IRGC इतना खतरनाक है कि ईरान के दुश्मन देश के साथ-साथ कई और ऐसे देश हैं, जो इन्हें आतंकवादी संगठन मानते हैं। सबसे पहले अमेरिका ने अप्रैल 2019 में IRGC को औपचारिक रूप से विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया। यह पहली बार था जब अमेरिका ने किसी दूसरे देश की आधिकारिक सैन्य संस्था को आतंकवादी संगठन की सूची में डाला। अमेरिका के बाद कनाडा ने भी IRGC के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। कनाडा ने इसे आतंकवाद से जुड़ी संस्था मानते हुए इसके कई अधिकारियों और उससे जुड़े नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए हैं। इसी तरह सऊदी अरब और बहरीन जैसे खाड़ी देशों ने भी IRGC को आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ते हुए प्रतिबंधित संगठनों की सूची में रखा है। यूरोप में भी इस संगठन को लेकर कड़ा रुख देखने को मिला है। यूरोपीय संसद ने हाल ही में इसे आतंकवादी संगठन के रूप में दर्जा दिया है।
सेना से भी ज्यादा ताकतवर IRGC
आज आईआरजीसी सही मायने में ईरानी सेना से भी ज्यादा ताकतवर दिख रही है। IRGC के पास ही ईरान के मिसाइल भंडार भी हैं और उन्हें लॉन्च करने की क्षमता भी। सुप्रीम लीडर की मौत के बाद यह सरकार से इतर भी काम कर रही है, ऐसी आशंका है। हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने संकेत दिया कि कुछ सैन्य इकाइयां स्वतंत्र रूप से काम कर रही हो सकती हैं। ओमान और कतर जैसे देशों पर हमलों के बाद उन्होंने कहा कि सेना को लक्ष्यों के चयन में सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। मौजूदा हालात में यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय संघर्ष के बीच ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड की भूमिका और भी निर्णायक बनती जा रही है।
