ISI प्रायोजित एजेंडे के चलते वैश्विक स्तर पर बलूच विद्रोहियों की गलत तस्वीर दुनिया के सामने रखी गयी। यही वजह रही कि बलोचों की जायज और वाजिब मांगों को दहशतगर्दी और अलगाववाद की नैरेटिव में लपेट दिया गया। तारीखों के पन्ने पलटे तो हम ये पाते है कि ये काफी पेचीदा मसला है, इसकी नींव में जातीय अस्मिता, क्षेत्रीय अक्षुण्णता और हाशिए पर धकेले दिए जाने का गुस्सा है। इस्लामाबाद के सत्ता सदन ने कई मर्तबा इस विद्रोह की तपिश झेली है। पड़ोसी मुल्क की ग्राउंड फोर्सेस और एयरफोर्स ने कई मौकों पर बड़ी ही बेरहमी से बलूचों का नरसंहार किया। अमन पसंद बलूच कई दशकों से हाथों में हथियार लिए मुखर है, अपनी जमीनी सामरिक कवायदों के साथ। शहबाज शरीफ के लिए बलूचिस्तान का मसला क्षेत्रीय मुद्दे से ज्यादा सियासी नासूर बना हुआ है। इस नासूर से रिसते मवाद ने पाकिस्तान की बुनियाद को हिला रखा है। हाल ही में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने ऑपरेशन “हेरोफ” छेड़कर कई बड़े हमलों को अंजाम दिया। बीते मार्च महीने के दूसरे हफ्ते के दौरान बलूच विद्रोहियों ने ट्रेन अगवाकर पाक सेना और सरकार को बैकफुट पर ला दिया। हालिया घटनाक्रम में BLA ने सुराब शहर को अपने कब्जे में ले लिया। सामरिक तौर पर ये शहर काफी अहम है, क्योंकि ये शहर क्वेटा को कराची से जोड़ने वाली अहम कड़ी है।
बलूचिस्तान पर पाक का नापाक कब्जा
साल 1947 जहां एक ओर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने एकाध अपवादों को छोड़कर (हैदराबाद और जूनागढ़) कई रजवाड़ों और रियासतों का भारतीय संघ में शांतिपूर्ण विलय करवाया, वहीं दूसरी ओर मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना के तुगलकिया फरमान पर कलात रियासत को जबरन पाकिस्तान में मिला लिया गया। दिलचस्प है कि कलात रियासत प्रमुख ने उस दौरान दावा किया था कि उन्होनें ब्रिटिश सरकार के साथ संधि की और रियासत को क्षेत्रीय रूप से संप्रभु माना। बावजूद इसके जिन्ना के सैन्य दबाव और रणनीतिक घेराव के चलते रियासत के मुखिया से जबरन विलय के कथित दस्तावेजों पर लिखित रजामंदी ले ली गयी। जैसे ही ये खबर बलूचों में फैली तो विद्रोह के शोले भड़क उठे। कलात रियासत के शहजादे अब्दुल करीम ने सबसे पहले पाकिस्तान के खिलाफ बगावत की, उसके बाद नवाब नौरोज खान इस फेहरिस्त में आगे आए। इस मुहिम में नवाब अकबर खान बुगती का नाम आज भी आम बलूच के दिलों में जिंदा है। मार्च 1948 में उठी लपटों ने बलूचिस्तान को अब तक जलाये रखा है। दशकों से चला आ रहा ये विद्रोह पाकिस्तान के लिए गले में फंसी हड्डी की तरह बना हुआ है। बलूचों का मानना है कि पाकिस्तानी सरकार उनकी जिंदगी और जमीन से खिलवाड़ कर रही है। 1948 से लेकर आज बलूच बहुल इलाके मकरान, रक्सन, कलात, क्वेटा, नसीराबाद, सिब्बी, लोरालाई और जोब पूर्वी पाकिस्तान इलाकों के मुकाबले काफी पिछड़े हुए है। इस्लामाबाद ने कथित संघर्ष विराम की आड़ में कई बड़े बलूच नेताओं को हलाक कर दिया। उन पर बेबुनियादी मुकदमे चलाये गए और फांसी पर लटकाया गया। रावलपिंड़ी के आतताइयों ने बलूचों पर F-16 से हवाई हमला हमले तक किए।
पड़ोसी मुल्क में है, विकास का भारी क्षेत्रीय असंतुलन
70 के दशक के उतरार्ध और पूर्वार्ध दोनों में बलोचों का विद्रोह अपने चरम पर रहा। जैसे ही ये सामने आया कि बलूचिस्तान में कुदरती नियामतों की भरमार है तो इस्लामाबाद ने वहां से नेचुरल गैस और दूसरे मिनरल्स की खुदाई शुरू की। माइनिंग से जुल्फिकार अली भुट्टो सरकार ने अंधाधुंध पैसा कमाये, लेकिन उन्होनें एक फूटी कौड़ी भी बलूचों पर खर्चाना गंवारा नहीं समझा। स्थानीय संसाधनों से होने वाले फायदों से बलूच आवाम को लगातार दूर रखा गया। बलूचिस्तान से होने वाली कमाई के चलते सिंध और पंजाब जैसे सूबे मालामाल हो गए। विकास क्रम में पूर्वी पाकिस्तान (सिंध और पंजाब प्रांत) के मुकाबले पश्चिम पाकिस्तान (बलूचिस्तान) पिछड़ता चला गया। मुफलिस्सी, भुखमरी, बेरोजगारी, शोषण और असंतुलित विकास ने बलूच के गुस्से को और भड़का दिया। यानि कि जातीय अस्मिता और क्षेत्रीय अक्षुण्णता के नाम पर शुरू हुए विद्रोह में अंसतोष के कई और नए बिंदु जुड़ गए।
जुल्फिकार अली भुट्टो ने करवाया था बलूचों का कत्लेआम
साल 1973 में सियासी चाल चलते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो ने बलूचिस्तान सरकार की बर्खास्तगी कर दी। आरोप ये मढ़ा गया कि वो विदेशी ताकतों के साथ गठजोड़ कर रही है, जिससे कि पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है। सरकार गिरते ही रावलपिंडी में बैठे मौकापरस्त जनरलों ने बलूचों पर कहर बरपा दिया। पाकिस्तानी सेना के हमले में 10,000 से ज्यादा बलूच विद्रोहियों और आम आवाम का खून बहा। इस कत्लोगारत में भुट्टो का साथ ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने दिया। करीब चार साल तक बलोचों को खून के घाट उतारा जाता रहा। इस भीषण नरसंहार ने आक्रोश की वो आंधी पैदा की, जिसके झोकों से आज भी शहबाज शरीफ सरकार खौफ खा रही है।
परवेज मुशर्रफ ने करवायी, नवाब अकबर बुगती की हत्या
दूसरी सहस्राताब्दी के आगमन के साथ ही विद्रोह के कमान कई हिस्सों में बंट गयी। उस दौरान कई बलूच कबालयी सरदारों ने इस मुहिम का परचम थामा। ठीक 6 साल बाद परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान बड़े बलूच चेहरे नवाब अकबर बुगती की हत्या करवा दी गयी। पढ़े लिखे बलूच नौजवान इसके खिलाफ खड़े हुए, दुनिया के कई हिस्सों में इस हत्या को लेकर लामबंदी देखी गयी। पाक सेना के हाथों हुई नवाब बुगती के हत्या ने विद्रोही आंदोलन की नयी धार दी। बलोचों के नयी पीढ़ी हथियार और कलम हाथों में लिए सियासी तौर पर एकजुट होने लगी। यूनाइटेड बलूच आर्मी और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट की नींव भी उसी दौरान पड़ी। खास बात ये है कि बलूचों का एक बड़ा धड़ा आज भी अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के नुस्खे आजमा रहा है, वो बात अलग है कि इन कोशिश का असर इस्लामाबाद पर नहीं पड़ रहा है। इस आंदोलन को कुचलने के लिए रावलपिंडी ने बलूचों को अगवा किया, जिनमें से ज्यादातर मरे या गुमशुदा पाए गए। गुमशुदा बलोचों की तलाश में पूरे पाकिस्तान में शांतिपूर्ण मार्च निकाले गए। बलूच महिलाओं ने कई अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को गुमशुदा बलूचों की फेहरिस्त सौंपी। इन शांतिपूर्ण कवायदों के एवज़ में बलूच आंदोलनाकारियों को पाक सेना की गोलियां ही मिली।
सामरिक रूप से निखरे बलूच विद्रोही
पाकिस्तानी सरकार की दिनोंदिन बढ़ती ज्यादतियों के चलते बलूचों के हथियारबंद ऑपरेशन में लगातार निखार आता चला गया। बीते मार्च महीने के दौरान बीएलए-जयांद खेमे के विद्रोहियों ने जाफर एक्सप्रेस को बंधक बनाकर ये साबित कर दिया। उस दौरान बीएलए को पीछे धकेलने के लिए स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (SSG) को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ गया था। 450+ यात्रियों को बंधक बनाकर और 50+ पाक सैनिकों की हत्या करके बलोच विद्रोहियों ने अपनी गजब की बेहतरीन जंगी कुव्वत का मुजाहिरा दुनिया के सामने किया। बेशक ये उनका महिमा मंडन नहीं है, ये उनकी बेबसी, हताशा और निराशा को दिखाता है। बलूचों की ये सामरिक रणनीति गलत थीं, उनकी इस हरकत ने दुनिया भर के आंतकी संगठनों के सामने खतरनाक मिसाल पेश की। बड़े पैमाने पर वैश्विक तौर पर इसकी मजम्मत की गयी।
बलूचिस्तान में है, पाक सेना की भारी तैनाती
ब्रिटिश हुकूमत के नक्शे कदम पर पाकिस्तान बलूचिस्तान को अपनी औपनिवेशिक बस्ती मानता है। बलूच विद्रोह इसी कैद से मुक्ति की मुहिम है। पाकिस्तानी हुक्मरान इलाके के कुदरती खजाने को लूट रहे है, इसके एवज़ में लोगों का दमन बदस्तूर किया जा रहा है। बलोचों के पक्ष में अब आजाद आवाजें पश्चिम के कई मुल्कों में गूंजने लगी हैं। निर्वासन से अभिशप्त प्रवासी बलूच अपने-अपने देशों में बगावती सुर बुलंद करते रहे है। इसी का असर है कि कई अन्तर्राष्ट्रीय इदारों पर आंदोलन को लेकर सकारात्मक दबाव बना है। इसी बात को भांपते हुए पाकिस्तानी नीति नियंताओं ने बलूचिस्तान में भारी सैन्य बंदोबस्ती की हुई है। ग्वादर, मस्तंग, पेशनी, केच और ओरमारा जैसे इलाकों में फौजी दखल के चलते बड़ी बलूच आबादी को घर बदर होना पड़ा है। प्रांत में चुनी हुई सरकारों की गैरमौजूदगी और जम्हूरी मरकज के नदारद होने के चलते बलोचों पर हो रहे जुल्मों सितम की खबरें इलाके से ना के बराबर ही सामने आ पाती है।
फिक्रमंद है, भारत सरकार
नई दिल्ली ने कोई मौकों पर और विभिन्न मंचों से बलूचिस्तान के मुद्दे को समर्थन दिया। इस सिलसिले में अहम है साल 2016 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिया गया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण। पीएम मोदी ने अपने वक्तव्य में बलोचों पर हो रहे पाकिस्तानी सेना के जुल्मो सितम की बानगी दुनिया के सामने रखी। उन्होंने बलूचिस्तान में अपहरण, संसाधनों की लूट, कत्लोगारत और मानवाधिकार के उल्लंघन पर भी प्रकाश डाला। पीएम मोदी की बातों से अभिभूत होकर बलोच एक्टिविस्ट करीमा बलोच ने उन्हें राखी भेजी और खत लिखकर बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनसे समर्थन मांगा। ISI का ये रास नहीं आया तो उसने अपने एजेंटों से कनाडा में निर्वासित जीवन जी रही पीएम मोदी की मुंहबोली बहन करीमा बलोच को मरवा दिया। मोदी सरकार से मिलती आत्मीयता को देखते हुए मीर यार बलूच और तारा चंद बलूच ने नई दिल्ली से बलूचिस्तान को आजाद मुल्क का ओहदा देने की मांग की। जब भारतीय सैन्य बल "ऑपरेशन सिंदूर" के दौरान पाकिस्तान की गुरूर को तोड़ रहे थे तो मीर यार बलूच ने वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को खत लिखकर हौंसलाअफजाई की थी। तस्वीर का दूसरा रूख ये है कि पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मामले में दखल के जवाब में भारत की जवाबी रणनीति बलूचिस्तान ही है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और ग्वादर बंदरगाह नई दिल्ली के हित में नहीं है। ऐसे में भारत की चिंता और बलूचिस्तान की बेचैनी एक जैसी ही है।
बलूच संसाधनों पर ड्रैगन की लालची निगाहें
प्रांत में चीनी विस्तारवादी जहरीली महत्वाकांक्षाओं ने पेचीदियों को काफी बढ़ा दिया है। बीजिंग की परियोजना चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) आम बलोची को जरा भी नहीं भा रही है। ग्वादर बंदरगाह समेत CPEC के बड़े हिस्से की निगेहबानी में लगी पाक सेना लगातार बलोचों को परेशान कर रही है। इस काम के लिए हुए जबरन भूमि अधिग्रहण ने स्थानीय बलूचों के गुस्से में पलीता लगाने का काम किया। साफ है कि बलूच इस कथित तरक्की का हिस्सा बनना चाहते है, लेकिन उनकी क्षेत्रीय-स्थानीय हिस्सेदारी अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। इसी बात से खार खाए विद्रोहियों ने सिलेसिलेवार ढंग से CPEC से जुड़े कई मरकजों को निशाना बनाया। बलूच नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि उनकी भागीदारी के बगैर CPEC जैसी परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकेगी। गौरतलब है कि विद्रोही गुट ने परियोजना में खलल डालने के लिए इससे जुड़े कई चीनी नागरिकों की हत्या तक कर डाली।
मामले पर बातचीत से परहेज करता इस्लामाबाद
बलूच आंदोलन तारीखी जुल्म और मौजूदा बेबसी का पर्याय है। उनकी इंसाफ की लड़ाई पाकिस्तानी सितमगर के खिलाफ है। हथियार छोड़कर अगर बलोच विद्रोही बातचीत, सियासी दखल, शांतिपूर्ण विरोध और सिविल नाफरमानी का सहारा लेते है तो भी पाक सेना उनको निशाने पर ले लेती है। मुद्दे पर इस्लामाबाद के हुक्मरान बातचीत करने के बजाए आर्मी को मोबालाइज करना ज्यादा आसान समझते हैं। वैश्विक बिरादरी को बलोचों के साथ लामबंद होकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए, भले ही वो सांकेतिक रूप से हो। अगर पाकिस्तान बलूचों की समस्या का शांतिपूर्ण हल निकालने में नाकाम रहा तो उसका खोखला जम्हूरी तिलिस्म टूट जायेगा। साफ है कि ये विद्रोह नहीं मुक्ति संग्राम है। अगर हालात काबू से बाहर हुए तो जल्द ही 1971 के तर्ज पर बलूचिस्तान में मुक्तिवाहिनी 2.O देखने को मिल सकती है।
इस लेख के लेखक राम अजोर जो स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
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