अमेरिका जितना अपने खतरनाक हथियारों के लिए जाना जाता है, उतना ही डिफेंस के लिए भी जाना जाता है-और होना भी चाहिए, आखिर वह एक सुपरपावर देश है। वर्तमान समय में अमेरिका, ईरान के साथ जंग लड़ रहा है। ईरान अमेरिका तक तो पहुंच नहीं पा रहा है, लेकिन वह समुद्र में मौजूद अमेरिकी बेड़े और मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी बेसों को निशाना बना रहा है। निशाना भी हल्का-फुल्का नहीं, बल्कि ताबड़तोड़ मिसाइलों और ड्रोनों की बारिश कर रहा है। अमेरिका इन ज्यादातर हमलों को नाकाम कर दे रहा है; उसके एयर डिफेंस इन्हें काफी हद तक रोकने में सफल रहे हैं। यह तब है, जब ईरान अमेरिका के ग्राउंड एयर डिफेंस और रडार को काफी हद तक तबाह कर चुका है। अब सवाल यह है कि जब जमीन पर मौजूद एयर डिफेंस सही से काम नहीं कर रहे हैं, तब अमेरिका को कौन बचा रहा है? कौन मिसाइल लॉन्च होते ही अमेरिकी सेना को अलर्ट कर दे रहा है? इसका जवाब धरती से ऊपर, अंतरिक्ष में छिपा है।
आसमान पर चौबीसों घंटे नजर रखने वाली बहुस्तरीय व्यवस्था
समाचार एजेंसी एपी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने एक ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणाली तैयार की है, जो दिन-रात आसमान की निगरानी करती रहती है। इस व्यवस्था में अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह, जमीन पर तैनात रडार, समुद्र में युद्धपोत और हवा में उड़ान भरने वाले विमान शामिल होते हैं। इन सभी से मिलने वाली जानकारी के आधार पर अमेरिकी अंतरिक्ष कमान के प्रशिक्षित अधिकारी तुरंत फैसले लेते हैं। इस पूरे तंत्र पर कई विशेषज्ञों ने अध्ययन किया है, जिनमें मिसिसिपी विश्वविद्यालय के एयरोस्पेस और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के प्रोफेसर आरोन ब्रायनिल्डसन भी शामिल हैं।
बैलिस्टिक मिसाइल पूर्व चेतावनी प्रणाली ट्रैकिंग मॉनिटर्स (फोटो- US Air Force)
अंतरिक्ष से मिलती है सबसे तेज चेतावनी
मिसाइल का पता लगाने का सबसे तेज तरीका अंतरिक्ष से निगरानी करना माना जाता है। अमेरिका के आधुनिक उपग्रह पृथ्वी के ऊपर से लगातार नजर रखते हैं। ये अत्याधुनिक उपग्रह मिसाइल छोड़े जाने पर निकलने वाली तेज गर्मी को तुरंत पहचान सकते हैं। जैसे ही कोई मिसाइल दागी जाती है, उसकी गर्मी अंतरिक्ष से दिखाई देती है और उपग्रह अपने सेंसर के जरिए कुछ ही सेकंड में चेतावनी भेज देते हैं। यह शुरुआती चेतावनी बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे जमीन या समुद्र पर मौजूद सेना को तैयारी का समय मिल जाता है।
जमीन तक कैसे पहुंचती है सूचना?
उपग्रह से मिला संकेत बाद में जमीन पर मौजूद संयुक्त सामरिक केंद्र तक पहुंचता है। वहां से यह जानकारी पूरे रक्षा नेटवर्क में तेजी से साझा की जाती है, ताकि हर स्तर पर सतर्कता बढ़ाई जा सके और समय रहते जवाबी कार्रवाई की जा सके। उपग्रह केवल शुरुआत में मदद करते हैं, लेकिन मिसाइल की पूरी उड़ान पर नजर रखने की जिम्मेदारी जमीन पर तैनात रडार निभाते हैं। ये रडार रेडियो तरंगें भेजते हैं, जो किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं। इससे यह पता चलता है कि मिसाइल कहां है और किस दिशा में जा रही है। अमेरिका छोटे और लंबे दोनों दूरी के रडार का उपयोग करता है, जो हजारों किलोमीटर दूर तक निगरानी कर सकते हैं।
लॉन्च होते ही मिसाइल का मिल जाता है अलर्ट (फोटो- USAF)
रडार पर हमले से बढ़ी चुनौती
हाल के समय में ईरानी बलों ने जॉर्डन और कतर में तैनात कुछ महत्वपूर्ण रडार प्रणालियों को निशाना बनाया है। ये प्रणालियां बहुत महंगी होती हैं और इन्हें तुरंत बदल पाना आसान नहीं होता। इसी कारण अमेरिका को एक अतिरिक्त रडार प्रणाली को कोरिया से हटाकर पश्चिम एशिया में तैनात करना पड़ा है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों पर विशेष रडार प्रणाली लगी होती है, जो सैकड़ों किलोमीटर तक निगरानी कर सकती है। जरूरत पड़ने पर ये जहाज खतरे वाले इलाकों के पास पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं। कुल मिलाकर, उपग्रह, रडार और युद्धपोत मिलकर एक ऐसा सुरक्षा जाल तैयार करते हैं, जो किसी भी मिसाइल खतरे का समय रहते पता लगाने में अहम भूमिका निभाता है।
ड्रोन का पता लगाना क्यों बन रहा है बड़ी चुनौती?
मिसाइलों के मुकाबले ड्रोन को ढूंढना और उन्हें मार गिराना सुरक्षा एजेंसियों के लिए ज्यादा मुश्किल साबित हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी बनावट और उड़ान का तरीका है। मिसाइलें बहुत तेज गति से चलती हैं और उनसे तेज गर्मी निकलती है, इसलिए निगरानी करने वाली प्रणालियां उन्हें जल्दी पहचान लेती हैं। इसके उलट, आधुनिक ड्रोन अपेक्षाकृत धीमी गति से उड़ते हैं और उनसे निकलने वाली गर्मी भी काफी कम होती है। यही कारण है कि तापमान पहचानने वाले सेंसर उन्हें तुरंत नहीं पकड़ पाते। इसके अलावा, कई ड्रोन आकार में छोटे होते हैं और जमीन के बेहद करीब उड़ान भरते हैं, जिससे रडार की नजर से बच निकलना आसान हो जाता है। कुछ ड्रोन हल्के पदार्थों जैसे प्लास्टिक या मिश्रित रेशों से बनाए जाते हैं, जो रडार तरंगों को कम परावर्तित करते हैं। इससे वे रडार स्क्रीन पर बहुत कमजोर संकेत के रूप में दिखाई देते हैं या कई बार बिल्कुल नजर ही नहीं आते। कई ड्रोन ऐसी प्रणाली से संचालित होते हैं, जिसमें लगातार रेडियो संकेत प्रसारित नहीं होते, इसलिए उनका पीछा करना और उनकी सही स्थिति का पता लगाना और भी कठिन हो जाता है।
