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CM फेस से आगे की कहानी: बिहार में सिर्फ सत्ता परिवर्तन या फिर यूपी से लेकर 2029 तक पर BJP की नजर? समझिए एक-एक समीकरण

BIhar: बिहार में सत्ता परिवर्तन जितना आसान दिख रहा है, उतना है नहीं। बीजेपी एक सीएम पद से कई लक्ष्यों को साधने की कोशिश कर सकती है, जिसमें यूपी विधानसभा चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव भी शामिल है।

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बिहार में कौन होगा अगला सीएम और क्या होगा समीकरण
Curated by: Shishupal Kumar
Updated Apr 13, 2026, 17:42 IST

बिहार (Bihar) में नई सरकार का गठन होना है, नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा होनी है। अब तक इतना तो तय हो चुका है कि बिहार में अगली सरकार का नेतृत्व बीजेपी के पास होगा। अभी तक ड्राइविंग सीट पर बैठी जदयू अब बगल की सीट पर बैठेगी। इसी के साथ बिहार में उस नीतीश युग का अंत हो जाएगा, जो 2005 से जारी है। लेकिन जरा ठहरिए और सोचिए- क्या सच में नीतीश युग का अंत हो जाएगा? या फिर सत्ता भले ही बीजेपी के पास रहे, लेकिन नीतियां और रणनीति दोनों नीतीश की ही रहेंगी?

अब इसे बीजेपी की मजबूरी कहिए या जरूरत, नीतीश और उनका साथ, उसे हर हाल में चाहिए। बीजेपी के पास कई लक्ष्य हैं, जिन्हें वह बिहार के जरिए साधने की कोशिश कर सकती है। इसमें सिर्फ बिहार ही शामिल नहीं है, बल्कि 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव और फिर 2029 का लोकसभा चुनाव भी शामिल है। बीजेपी की इस रणनीति की शुरुआत उसी दिन से मानी जा रही है, जब नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। बीजेपी बिहार के जरिए हर वह समीकरण साधने की कोशिश में है, जो उसे कम से कम 2029 तक विनिंग मोमेंटम देता रहे। आइए, इसे स्टेप बाय स्टेप समझते हैं..."

बिहार का समीकरण

बीजेपी मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ ही सबसे पहले बिहार का समीकरण साधेगी। यही कारण है कि इस समय राज्य के बड़े से बड़े नेता अंधेरे में हैं। बिहार का अगला सीएम कौन होगा, यह सिर्फ बीजेपी आलाकमान को पता है, बाकी सिर्फ अटकलें हैं। बीजेपी के सामने बिहार में सबसे बड़ी चुनौती है जदयू के उस वोट बैंक को अपने पास बनाए रखना, जिसे नीतीश ने सालों तक सींचकर मजबूत किया है। बिना नीतीश के आज की तारीख में बिहार की सत्ता की कल्पना ही नहीं की जा सकती और नीतीश को मजबूत यही वोट बैंक करता है। नीतीश कुमार के पाले में मुख्य रूप से महिलाएं, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और ओबीसी से कुर्मी-कोइरी समाज रहा है। बीजेपी इसे किसी भी कीमत पर छिटकने नहीं देगी। अगला सीएम इसी वर्ग से हो सकता है।

सवर्ण को साधा, अब किसकी बारी?

बिहार की राजनीति को जाति आधारित राजनीति माना जाता है। BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्राह्मण- 82 प्रतिशत, भूमिहार- 74 प्रतिशत, बाकी अगड़ी जातियां- 77 प्रतिशत, कुर्मी-कोइरी- 71 प्रतिशत और अन्य ओबीसी- 68 प्रतिशत मतदाताओं ने NDA को 2025 के विधानसभा चुनाव में वोट दिया था। इसमें बीजेपी नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर अपने परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को साध चुकी है। अभी विजय सिन्हा डिप्टी सीएम हैं, जो भूमिहार समाज से आते हैं और वे फिर से रिपीट हो सकते हैं। इस तरह सवर्ण का समीकरण बीजेपी के पक्ष में है। अब बाकी जो कुर्मी-कोइरी और अन्य ओबीसी वर्ग हैं, उन्हें बीजेपी हर हाल में साधना चाहेगी।

पीएम मोदी, नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी एक रोड शो के दौरान (फोटो- PTI)

पीएम मोदी, नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी एक रोड शो के दौरान (फोटो- PTI)

महिलाओं के नाम पर मुहर और 2029 पर नजर?

केंद्र में मोदी सरकार महिला आरक्षण विधेयक लाने की तैयारी में है। ऐसे में अगर बीजेपी चौंकाते हुए किसी महिला को इस वर्ग से मुख्यमंत्री बनाती है, तो उसके कई राजनीतिक समीकरण साधे जा सकते हैं। महिला, यानी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व,और पिछड़ा समाज- मतलब पूरे देश में एक मजबूत संदेश। राष्ट्रपति के पद पर द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल 2027 तक है, ऐसे में बीजेपी यह दांव खेल सकती है, जो उसे 2029 के लोकसभा चुनाव में बढ़त दिला सकता है।

बिहार के समीकरण से यूपी पर नजर?

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। लोकसभा में सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने 43 सीटें जीतकर 43.52% मत हासिल किए। वहीं, एनडीए ने 36 सीटें जीतकर 43.69% मत प्राप्त किए। मतलब वोट प्रतिशत में मामूली अंतर है। इस नतीजे से उत्साहित सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपना PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद कर रहे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूपी में ओबीसी वर्ग बीजेपी से छिटका है, जिसके कारण पार्टी को नुकसान हुआ था। अब बीजेपी बिहार के जरिए इसकी भरपाई करने की कोशिश कर सकती है और 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा को वह बढ़त लेने से रोक सकती है, जो उसने लोकसभा चुनाव में हासिल की है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ श्रेयसी सिंह (फोटो- shreyasisinghofficial)

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ श्रेयसी सिंह (फोटो- shreyasisinghofficial)

अटकलों में कितने नाम और कितने समीकरण?

दिलचस्प बात यह है कि इस बदलाव से भाजपा को हिंदी पट्टी के उस राज्य में मुख्यमंत्री पद मिलने जा रहा है, जहां अब तक वह इस कुर्सी से दूर रही है। बिहार की 243 सदस्यीय विधानसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को 202 सीट के साथ प्रचंड बहुमत प्राप्त है। उनमें भाजपा की 89, जदयू की 85 और बाकी अन्य सहयोगी दलों लोजपा (रामविलास), हम और आरएलएम की सीट हैं।

  1. सम्राट चौधरी- अटकलें लगाई जा रही हैं कि निवर्तमान सरकार में महत्वपूर्ण गृह मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे हैं। चौधरी 'कोइरी' जाति से हैं और उनकी पदोन्नति से यह सुनिश्चित हो सकता है कि नीतीश कुमार द्वारा अपने 20 साल के शासनकाल में पोषित 'लव-कुश' (कुर्मी-कोइरी) समीकरण, जदयू प्रमुख के जाने के बाद भी राजग के पक्ष में बरकरार रहे।
  2. नित्यानंद राय- नित्यानंद राय संख्या के लिहाज से बिहार की सबसे बड़ी जाति 'यादव' समुदाय से हैं और उन्हें आगे बढ़ाने से पार्टी का जनाधार बढ़ सकता है। यादव समुदाय दशकों से लालू प्रसाद के राजद के साथ रहा है, जो राज्य में भाजपा का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल है।
  3. लखेंद्र पासवान- लखेंद्र पासवान दलित समुदाय से हैं और उनकी पदोन्नति से भाजपा को अपनी 'उच्च जाति समर्थक' छवि से उबरने में मदद मिल सकती है। हिंदी भाषी क्षेत्रों में इस छवि का एक अलग ही नुकसान रहा है, क्योंकि वर्ष 1990 के दशक के मंडल आंदोलन की छाया आज भी कायम है।
  4. श्रेयसी सिंह- श्रेयसी सिंह युवा हैं और क्षत्रिय समाज से आती हैं, लेकिन उनकी पदोन्नति को पार्टी द्वारा युवा प्रतिभाओं को प्राथमिकता देने के रूप में देखा जा सकता है।

कई चुनावों तक दिखेगा, बिहार के फैसले का असर

कुल मिलाकर बीजेपी जिसे भी बिहार में चुने वो उसके समीकरण के हिसाब से ही होगा। बिहार की राजनीति में यह बदलाव एक साधारण सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक लंबी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है—जिसके असर आने वाले कई चुनावों में दिखाई दे सकते हैं।

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