Independence Day 2026: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी निधि चौधरी ने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के खास कार्यक्रम 'पावर कॉरिडोर' के साथ बातचीत में प्रारंभिक जीवन, यूपीएससी यात्रा से लेकर Gen Z तक के जुड़े मुद्दों पर अपनी बेबाक राय दी।
राजस्थान के मारवाड़ के एक छोटे से गांव में जन्मी निधि चौधरी एक ऐसी शख्सियत हैं, जिनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और संवेदनशीलता से न केवल अपना सपना पूरा किया, बल्कि आज देश की लाखों बेटियों के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि निधि चौधरी के प्रोफेसर उन्हें कॉलेज के दिनों में ही 'कलेक्टर साहिबा' कहकर पुकारते थे।
हिंदी माध्यम की विद्यार्थी रही हैं IAS निधि
टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की रमा सोलंकी के साथ बातचीत में निधि चौधरी ने बताया कि मेरी पढ़ाई सरकारी स्कूलों और सरकारी कॉलेज में हुई और मैं हिंदी माध्यम की विद्यार्थी रही हूं। उन्होंने कहा, ''मैंने हमेशा अपने चारों तरफ सामाजिक भेदभाव दऔर घूंघट प्रथा को देखा था।'' बकौल निधि चौधरी, समाज में महिलाओं की स्थितियां देखकर उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, कम उम्र में ही उनके लिए रिश्ते आना शुरू हो गए थे।
यहां देखें पूरा इंटरव्यू:
संघर्षों से भरा रहा प्रारंभिक जीवन
निधि चौधरी ने बताया, ''बचपन में ही मैंने देखा कि समाज में लड़कियों की बहुत कम उम्र में शादी कर दी जाती थी, वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती थीं और घरों में औरतों का दर्जा बहुत नीचे था। समाज की ये स्थितियां मुझे अंदर से बहुत कचोटती थीं, जिसकी वजह से मैंने कविताएं लिखना शुरू किया।'' बकौल निधि चौधरी, सौभाग्य से मेरी कविताएं अखबारों में छपीं, जिससे मेरे माता-पिता को यह विश्वास हुआ कि मैं एक साधारण बच्ची नहीं हूं।
इस दौरान, निधि चौधरी ने अपने कॉलेज के प्रोफेसर नाथूराम ढाका का भी जिक्र किया, जो उन्हें कॉलेज के दिनों में ही 'कलेक्टर साहिबा' कहकर पुकारते थे।, जिससे उन्हें इस पद के बारे में जानने और प्रशासनिक सेवा में आने की प्रेरणा मिली।
RBI में काम कर चुकी हैं निधि चौधरी
निधि चौधरी ने पारिवारिक दबाव और जिम्मेदारियों के बीच अपनी राह खुद बनाई। उन्होंने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की परीक्षा पास की और चेन्नई में बतौर मैनेजर तैनात हुई। इसके अलावा वह 'इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस' में भी काम कर चुकी हैं।
उन्होंने बताया कि मेरी बहन का 2009 में आईपीएस में सलेक्शन हुआ था। तब उसने कहा था कि भले ही आरबीआई की नौकरी आईपीएस-आईएएस से बहुत अच्छी है, लेकिन तुम्हे आईएएस की तैयारी करनी चाहिए। निधि बताती हैं कि उस वक्त वह अपने पति से मिल चुकी थीं, जो आरबीआई में ही काम करते थे।
Nidhi Choudhary IAS
निधि चौधरी बताती हैं कि जब उन्होंने यूपीएससी का फॉर्म भरा, तब वह गर्भवती थीं। आपको बता दें कि निधि चौधरी ने तमाम चुनौतियों से पार पाते हुए 2012 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में सफलता हासिल की। दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर उनके छोटे भाई ने भी 2014 बैच में आईएएस बनकर इस परिवार को अफसरों का परिवार बना दिया।
अंग्रेजी मीडियम में दिया था UPSC एग्जाम
आईएएस निधि ने बताया कि मैंने सारी जिंदगी हिंदी भाषा में पढ़ाई की है और आरबीआई की परीक्षा भी हिंदी में ही लिखी थी। उन्होंने आगे बताया, ''मैंने सारी जिंदगी हिंदी भाषा में पढ़ाई की है... लेकिन यूपीएससी मैंने अंग्रेजी मीडियम में दिया। मैंने अभी यह नहीं बता पाऊंगी कि यह चयन सही था या नहीं... लेकिन मैं सभी अभ्यर्थियों को यह बताना चाहूंगी कि हमेशा उस भाषा का चयन करना चाहिए, जिसमें आप सपने देखते हैं और वह भाषा आपकी मातृभाषा होती है। उन्होंने आगे कहा कि शायद मैंने यह चयन भी किसी डर के कारण ही किया होगा।
UPSC इंटरव्यू का रोचक किस्सा
टाइम्स नाउ नवभारत के साथ बेबाक बातचीत में निधि चौधरी ने बताया कि वह नोवल लिखती हैं और उनकी दो नोवल तैयार हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर, सुमित्रा नंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि पसंद हैं। निधि चौधरी बताती हैं- "पुरुषोत्तम अग्रवाल सर चेयरमैन थे... उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं आरबीआई क्यों छोड़ना चाहती हूं... उन्होंने अचानक से कहा कि तुम साफ क्यों नहीं कहती कि तुम आरबीआई की गवर्नर बनना चाहती हो... तुम्हें नोट पर साइन करने की इच्छा थी।"
निधि चौधरी खुद को "प्रो-जेन ज़ी" मानती हैं। उनका कहना है कि यह मानव इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी है, जो सबसे कम उपभोग कर रही है और अपने स्वयं के विश्वास प्रणालियों (Belief Systems) के कारण नशे और धूम्रपान जैसी आदतों से दूर रह रही है। निधि चौधरी के मुताबिक, इस पीढ़ी में साहस है कि वे उन चीजों पर सवाल उठा सकें, जो उन्हें सही नहीं लगतीं, यहां तक कि वे अपने माता-पिता को भी मना करने की काबिलियत रखते हैं। वे उन्हें बहुत क्रिएटिव (रचनात्मक) मानती हैं, जिन्होंने अपनी एक अलग शब्दावली तक विकसित कर ली है।
