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दायरा: रेप केस में सही समय पर न्याय मिलना चाहिए या फिर सही तरीके से? क्या कहते हैं यूपी के पूर्व DGP ओपी सिंह

उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP ओ.पी. सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत के खास पॉडकॉस्ट 'पॉवर कॉरिडोर' में रमा सोलंकी से 'दायरा' में उठाए गए मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि समाज में आक्रोश होना स्वाभाविक है, लेकिन न्याय हमेशा कानून के दायरे के भीतर होना चाहिए।

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यूपी के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह एक्सक्लूसिव
Reported by: डॉ रमा सोलंकीEdited by: शिशुपाल कुमार
Updated Sep 18, 2026, 12:31 IST
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मेघना गुलजार की बहुचर्चित फिल्म दायरा शुक्रवार को रिलीज हो गई। फिल्म 2019 के चर्चित हैदराबाद रेप केस पर आधारित है। करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म दायरा का मूल सवाल ये है कि रेप केस में सही समय पर न्याय मिलना चाहिए या फिर सही तरीके से न्याय मिलना चाहिए? दायरा के इसी सवाल पर हमने बात की उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह से।

न्याय की प्रक्रिया और कानून

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) ओ.पी. सिंह ने टाइम्स नाउ नवभारत के खास पॉडकॉस्ट 'पॉवर कॉरिडोर' में रमा सोलंकी से इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने हैदराबाद रेप कांड की घटना पर बात करते हुए कहा कि समाज में आक्रोश होना स्वाभाविक है, लेकिन न्याय हमेशा कानून के दायरे के भीतर होना चाहिए। उन्होंने 'त्वरित न्याय' के नाम पर कानून को दरकिनार करने के बजाय एक निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया पर बल दिया। ओपी सिंह ने कहा, " देखिए ये घटना जो हैदराबाद की थी, वो मुझे बहुत अच्छी तरह याद है। 2019 की ये घटना थी, उस समय मैं उत्तर प्रदेश का डीजीपी था और ये एक तरह से एक नेशनल हेडलाइंस में थी ये घटना और इस घटना को मैं एक दूसरे दृष्टिकोण से भी देखता हूं, मैंने पहले भी कहा है और कहता रहा हूं कि अपराध जितना भी कठोर हो, जितना भी जघन्य हो, लेकिन कानून का शासन जो है वो मजबूत होना चाहिए। 2019 की घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। मेरा मानना है कि समाज में गुस्सा तो जरूर था। स्वाभाविक रूप से था गुस्सा और लोगों को तत्काल न्याय भी चाहिए था। लेकिन पुलिस अधिकारी के तौर पर मेरा ये टेक होगा कि गिरफ्तारी हो या जांच हो, प्रोसीक्यूशन हो या कन्विक्शन बाय कोर्ट हो। यह सारी विधाएं जो हैं वह एक न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत होती हैं और इसलिए किसी भी आरोपी के प्रति समाज का जो आक्रोश होता है, उस आक्रोश को विस्तार करने के रूप में पुलिस को अपना योगदान नहीं देना चाहिए। उस गुस्से को उस आक्रोश को विस्तार होने पर पुलिस को रोकना चाहिए। इसलिए पुलिस का काम जो है वो आरोपी को पकड़ना है। उसको बहुत ही वैज्ञानिक और अच्छे ढंग से उसकी जांच करनी है और उसे न्यायालय तक पहुंचाना है। तो मैं समझता हूं कि ये इसे मैं त्वरित न्याय नहीं कहूंगा। इंस्टेंट जस्टिस नहीं कहूंगा। न्याय वही है जो कानून के अनुसार हो और ऐसा न्याय जिसमें समाज को भी स्वीकार हो और वो कानून की कसौटी पर खरा उतरे।

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सिनेमा की भूमिका

पूर्व डीजीपी के अनुसार, सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित करने का माध्यम होना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि फिल्म पीड़ितों के प्रति संवेदनशील होगी और केवल सनसनी फैलाने के बजाय जांच की जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को दिखाएगी। पूर्व IPS ओपी सिंह ने कहा, " मैं ये समझता हूं कि सिनेमा का प्रभाव बहुत बड़ा है। और इसलिए इस प्रभाव को हम बहुत यूटिलाइज करें। उसको बहुत हम सेंसेशनलाइज नहीं करें बल्कि उसको सेंसिटाइज करें। फिल्मों के माध्यम से हम जनता के पास जाएं, उन्हें और संवेदनशील बनाएं। अगर हम रेप केस की बात करें जो मेघना गुलजार की जो फिल्म आने वाली है... तो बलात्कार को केवल वायलेंस या रिवेंज के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। एक गंभीर फिल्म निर्देशक के लिए और एक गंभीर फिल्म को विक्टिम की डिग्निटी के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। इन्वेस्टिगेशन की कॉम्प्लेक्सिटी के ऊपर भी देखा जाना चाहिए और मैं समझता हूं कि जो फैमिली जो परिवार पीड़ित है उसकी क्या पीड़ा है उसको भी हमें जज करना चाहिए और पुलिस की जिम्मेदारी प्रोसीक्यूशन की जिम्मेदारी और न्याय विभाग की जिम्मेदारी, ये तो अपने आप में है ही है। पुलिस की कॉम्प्लेक्सिटी होती है, रिससिबिलिटी होती है, प्रोसक्यूशन के अपने चैलेंजेस होते हैं। और न्यायिक प्रक्रिया में जो बाधाएं आती हैं और जो डिले होता है, इन सभी चीजों को अगर हम देखें तो हमें लगता है कि फिल्म के निर्माण में इन सब चीजों को निर्देशक को डायरेक्टर को देखा जाना चाहिए। और यही कारण है कि सिनेमा के प्रभाव को अगर हम एक विस्तृत रूप से देखें तो हमें सेंसेशनलाइज नहीं करना चाहिए, बल्कि सेंसिटाइज करना चाहिए। और ऐसी फिल्मों का खासकर... जो मैं बहुत ही आतुर हूं इस फिल्म को देखने के लिए... 2019 की जो घटना पर आधारित है। ऐसी फिल्मों का उद्देश्य केवल ये नहीं होना चाहिए कि दर्शक अंत में कहे कि आरोपी को सजा मिलनी चाहिए, बल्कि ये होना चाहिए कि ऐसा अपराध हुआ ही क्यों है और इस प्रकार की व्यवस्था थी तो कहां विफल हुई और भविष्य में इसे कैसे रोका जा सके। तो इसलिए मैं समझता हूं कि सिनेमा को एक सामाजिक समझ के रूप में देखा जाना चाहिए और यदि वो सामाजिक समझ से भी आगे आए और पब्लिक को एजुकेट करने लगे तो वो एंटरटेनमेंट से एजुकेशन बन जाता है।

नाबालिग आरोपी

पूर्व डीजीपी के साथ चर्चा के दौरान जब यह प्रश्न उठा कि गंभीर अपराधों में आरोपी की उम्र और अपराध की भयावहता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। ओपी सिंह ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और आरोपी की मानसिक परिपक्वता के आकलन की आवश्यकता पर बात की। उन्होंने कहा, " इन दोनों चीजों को अलग-अलग रखने की जरूरत है। पहला ये कि अपराध की क्या गंभीरता है और दूसरा कि आरोपी की उम्र क्या है? इस पर हम काफी डिबेट कर चुके हैं अपने देश में। समाज का गुस्सा जो है वो अपराध की गंभीरता से पैदा होता है। जितना ज्यादा अपराध गंभीर होगा समाज का गुस्सा उतना ही ज्यादा होगा। जबकि कानून जो है वो आरोपी की उम्र को देखता है। उसकी मानसिक परिपक्वता को देखता है और उसके रिहबिलिटेशन की संभावनाओं को भी देखता है। हमारे यहां भारत में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट भी है जो बच्चों के साथ-साथ यह भी दिखलाता है कि कैसे हम चाइल्ड फ्रेंडली अप्रोच रखें और पुलिस को क्या करना चाहिए और इसमें 16 से 18 वर्ष के आयु के बच्चों द्वारा जो अपराध किए जाते हैं उनके मामले में भी जुनाइल जस्टिस बोर्ड जो है वो उसको एक अधिकार दिया गया है कि वो प्रिलिमिनरी असेसमेंट करे कि किस प्रकार की व्यवस्था है वहां पर। उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता कैसी है और उनको परिणामों को रिजल्ट्स को समझने की क्षमता क्या है? इन सभी पहलुओं का आकलन किया जाना चाहिए। तो मेरे विचार से यह एक अहम मुद्दा है कि नाबालिक को केवल उसकी उम्र के कारण निर्दोष नहीं माना जाना चाहिए और केवल अपराध की भयावहता के कारण भी कानून को नकार देना भी गलत है। इसलिए कानून को हमेशा भावनाओं के ऊपर रहकर ही काम करना होगा।"

सिस्टम में बदलाव की आवश्यकता

फिल्म के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया कि थानों में पीड़ित परिवार के साथ अक्सर संवेदनहीन व्यवहार किया जाता है। ओपी सिंह ने माना कि पुलिस का माइंडसेट बदलने के लिए निरंतर व्यवहारिक प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक का सही उपयोग बहुत जरूरी है।

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