मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल की स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCU) में नवजात बच्चों की मौत के आंकड़ों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में 1 जुलाई से 30 सितंबर के बीच 592 नवजात भर्ती हुए, जिनमें से 46 की मौत हो गई। वहीं, 1 अप्रैल से 30 सितंबर तक छह महीने में 1188 नवजातों का इलाज किया गया, जिनमें 80 बच्चों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। मृत बच्चों के परिजनों ने इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए हैं, जबकि अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि ज्यादातर बच्चे गंभीर हालत और कम वजन के कारण भर्ती किए गए थे।
जन्म के कुछ घंटे और दिनों बाद बच्चों की मौत
बरघाट ब्लॉक के डुंगरिया गांव के निवासी मनीष वरकड़े की पत्नी ने 15 जुलाई को पहले बच्चे को जन्म दिया था। सांस लेने में परेशानी और दिल की धड़कन सामान्य नहीं होने के कारण नवजात को SNCU में भर्ती कराया गया। हालांकि, कुछ घंटे बाद ही बच्चे की मौत हो गई।
इसी तरह बरघाट के जावरकाठी निवासी संजय उइके के बच्चे का जन्म 7 सितंबर को समय से पहले हुआ था। बच्चे का वजन कम था और दिल की धड़कन भी काफी धीमी थी। उसे SNCU में भर्ती कराया गया, लेकिन छह दिन बाद उसकी मौत हो गई। इन घटनाओं के बाद परिजनों ने अस्पताल में इलाज की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
विधायक ने उठाए सवाल, जांच की मांग
मामला सामने आने के बाद स्थानीय भाजपा विधायक दिनेश राय जिला अस्पताल पहुंचे। उन्होंने SNCU में डॉक्टरों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए और मामले में जांच व कार्रवाई के लिए शासन को पत्र लिखा। कांग्रेस ने भी पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की है।
अस्पताल मैनेजमेंट ने बताई मौतों की वजह
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नावकर के मुताबिक, SNCU में दूरदराज के ग्रामीण इलाकों से गंभीर हालत में नवजात लाए जाते हैं। इनमें समय से पहले जन्मे, कम वजन वाले और जन्म के समय सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे बच्चे भी शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि छह महीने में 1188 बच्चों का इलाज हुआ, जिनमें 642 का वजन सामान्य से कम था। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, इस अवधि में 80 बच्चों की मौत हुई और मृत्यु दर करीब 6.7 फीसद रही। डॉक्टर ने यह भी कहा कि मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विभाग के डॉक्टरों की नियमित ड्यूटी SNCU में लगने से इलाज व्यवस्था बेहतर हो सकती है।
नवजातों की मौत के कारणों और लगाए गए लापरवाही के आरोपों की स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी हैं। ऐसे में जांच, उपचार व्यवस्था और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर उठे सवाल अहम हैं।
