Allahabad HC on Live-in relationships: इलाहाबाद हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणी कि कोई विवाहित पुरुष, किसी वयस्क के साथ आपसी सहमति से 'लिव-इन' रिश्ते में रहने पर कोई अपराध नहीं कर रहा है, यह बात उसकी(हाई कोर्ट) अपनी ही एक पिछली टिप्पणी के विपरीत है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 25 मार्च को यह टिप्पणी की कि एक शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है; कोर्ट ने कहा कि सामाजिक नैतिकता, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य पर भारी नहीं पड़ सकती।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक मामले में दो याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण देते हुए की। अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कहा, 'यदि एक विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से सहजीवन संबंध में रह रहा है, तो यह कोई अपराध नहीं है। नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना होगा। यदि कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, तो सामाजिक विचार और नैतिकता अदालत का मार्गदर्शन नहीं करेंगे।'
क्या था मामला?
यह मामला उस समय अदालत के समक्ष आया, जब महिला की मां ने प्राथमिकी दर्ज कर आरोप लगाया कि उसकी 18 वर्षीय बेटी को उक्त व्यक्ति बहला फुसलाकर अपने साथ ले गया है। याचिका के अनुसार हालांकि महिला ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को दिए प्रार्थना पत्र में कहा कि वह वयस्क है और अपनी इच्छा से उक्त व्यक्ति के साथ सहजीवन संबंध में रह रही है।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसके परिजन इस संबंध का विरोध कर रहे हैं और उसे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, जिससे झूठी शान की खातिर की जाने वाली हत्या (ऑनर किलिंग) की आशंका है। उसके अनुसार, इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई आठ अप्रैल को तय की। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इलाहाबाद HC का यू-टर्न
ऊपर बताई गई यह टिप्पणी कि शादीशुदा पुरुष का लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं है, यह 20 मार्च को एक सिंगल जज द्वारा दिए गए अपने ही बयानों के विपरीत थी, जब उन्होंने एक लिव-इन जोड़े को सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था।
LiveLaw के अनुसार, कोर्ट ने 20 मार्च को कहा था कि किसी शादीशुदा व्यक्ति को अपने जीवनसाथी से पहले तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की कानूनी तौर पर अनुमति नहीं दी जा सकती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी, 'अगर याचिकाकर्ता पहले से ही शादीशुदा हैं और उनके जीवनसाथी जीवित हैं, तो उन्हें अपने पहले जीवनसाथी से तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की कानूनी अनुमति नहीं दी जा सकती। शादी करने या अपनी कानूनी शादी के बाहर लिव-इन रिलेशनशिप में आने से पहले, उन्हें सबसे पहले सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत से तलाक का आदेश प्राप्त करना होगा।' यह जानकारी LiveLaw द्वारा X पर साझा की गई टिप्पणी के एक स्क्रीनशॉट के अनुसार है।
पिछले साल दिसंबर में हाई कोर्ट ने भी इसी तरह की एक टिप्पणी की थी, जिसमें यह फैसला दिया गया था कि कोई भी शादीशुदा व्यक्ति, तलाक का आदेश (डिवोर्स डिक्री) लिए बिना, किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी तौर पर लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता।
PTI न्यूज एजेंसी के अनुसार, इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से यह गुहार लगाई थी कि वे दोनों बालिग हैं और पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं, और उन्हें प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) से अपनी जान का खतरा है।
