FII Selling भारतीय शेयर बाजार को इस साल अब तक इस एक टर्म ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 3200 करोड़ डॉलर यानी करीब 3 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली कर चुके हैं। जून का अभी मजह एक सप्ताह बीता है। पहले ही सप्ताह में जून में FII ने करीब 50 हजार करोड़ रुपये की बिकवाली की है।
दमदार रैली करते हुए भारतीय शेयर बाजार ने सितंबर 2024 में नए शिखर को छुआ। उस समय निफ्टी 26 हजार और Sensex 86000 तक पहुंचे। इसके बाद से ये स्तर भारतीय बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स के लिए लक्ष्मण रेखा बन गए हैं। 2025 में पूरे साल सेंसेक्स और निफ्टी इन स्तरों से नीचे बने रहे। हालांकि, दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में दोनों इंडेक्स ने फिर से नए रिकॉर्ड हाई बनाए, लेकिन मोटे तौर पर लेवल यही रहे और फिर रिवर्सल शुरू हो गया।
RBI ने शुक्रवार 5 जून को MPC बैठक के बाद बाजार की सबसे बड़ी चिंता, ब्याज दर में बढ़ोतरी को खत्म कर दिया। ब्याज दर स्थिर रखने के साथ ही रिजर्व बैंक ने पॉलिसी आउटलुक 'न्यूट्रल' रखा। इसके अलावा भी रिजर्व बैंक और सरकार ने वे तमाम उपाय किए हैं, जो भारतीय बाजार में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने वाले हैं।मसलन, सरकार ने गवर्नमेंट बॉन्ड्स में निवेश को टैक्स फ्री कर दिया है। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश जारी कर आयकर अधिनियम में संशोधन कर दिया है। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने भी अपने स्तर पर विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाले कई उपाय किए हैं।
सरकार और RBI ने क्या-क्या किया?
RBI ने बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट्स को बढ़ावा देने के लिए छूट दी है। PSU कंपनियों के लिए ECB को आसान बना दिया है। इसके अलावा FPI के लिए सरकारी बॉन्ड में निवेश के नियम नरम किए हैं। वहीं, शेयर बाजार में निवेश बढ़ाने के लिए RBI ने नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRIs) और ओवरसीज सिटिजंंस ऑफ इंडिया (OCIs) के लिए निवेश सीमा बढ़ाने का फैसला किया है। रिजर्व बैंक की तरफ से नियमों में दी गई ढील सिर्फ NRI और OCI तक सीमित नहीं रहेगी। RBI ने इसे सभी इंडिविजुअल पर्सन्स रेजिडेंट आउटसाइड इंडिया (PROIs) तक बढ़ाने का फैसला किया है।
पहले वैल्यूएशन का बहाना
2024 में Nifty PE करीब 24 तक पहुंच गया था। यही हाल Sensex, Bank Nifty और Nifty IT जैसे इंडेक्स का था। सबका PE 20 से ऊपर पहुंच गया। सितंबर 2024 के बाद जो बाजार में बिकवाली शुरू हुई, तो लंबे समय तक दलील दी जाने लगी कि भारतीय बाजार वैल्यूएशन के लिहाज से महंगा हो गया है। 2025 में भी यही कहानी चलती रही और साथ में यह भी कहा जाने लगा कि कॉरपोरेट अर्निंग में सुस्ती आ रही है।
अब ग्रोथ पर सवाल
वहीं, 2026 में ईरान-अमेरिका युद्ध, तेल गैस संकट, कॉरपोरेट अर्निंग, मानसून की कमी और खपत में कमी जैसी चिंताएं बाजार के एक दायरे में बने रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह बताई जा रही हैं। इस साल बाजार के एक हद में बने रहने के पीछे सबसे बड़ी वजह US-Iran युद्ध की वजह से क्रूड ऑयल और गैस के दाम में तेजी बताई जा रही है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे एक्सपर्ट का तर्क है कि क्रूड ऑयल के दाम में तेजी की वजह से न केवल भारत के खजाने पर दबाव बढ़ रहा है। बल्कि, महंगाई भी बढ़ रही है और ग्रोथ भी स्लो हो रही है। रिजर्व बैंक ने भी इस धारणा की पुष्टि की है। क्योंकि, रिजर्व बैंक ने भी भारत की GDP ग्रोथ के अनुमान को 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है। वहीं, महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है।
हेजिंग कॉस्ट बड़ी चिंता
जापान और यूएस बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड और रुपये की कमजोरी विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार से दूर करने की बड़ी वजह है। जापान को दुनियाभर के निवेशकों का बैंकर माना जाता है। जापान से निवेशक सस्ता कर्ज लेते हैं और दुनियाभर में निवेश करते हैं। लेकिन, जापानी बॉन्ड्स की यील्ड अब तकरीबन 3 दशक के शीर्ष पर है। इसकी वजह से तमाम बाजारों से पैसा वापस जापानी बॉन्ड्स में लौट रहा है। वहीं, दूसरी तरफ जियो-पॉलिटिकल वजहों से डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है, जिससे डॉलर बॉन्ड्स में भी मजबूती देखने को मिल रही है। इसकी वजह से निवेशक इक्विटी मार्केट की जगह जापान और अमेरिकी बॉन्ड्स जैसे सुरक्षित ऐसेट्स में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। क्योंकि, भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट में स्लो ग्रोथ हेजिंग कॉस्ट की चिंता बढ़ाती है।
कितना गिर सकता है बाजार?
ज्यादातर ब्रोकरेज और रिसर्च फर्म का मानना है कि अगर क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है और भारत में मानसून सामान्य से कम रहता है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। जाहिर तौर पर इसका असर भारतीय बाजार पर देखने को मिलेगा। दुनियाभर के ब्रोकरेज हाउस ने भारतीय बाजार के बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी का प्रेडिक्शन करते हुए बताया है कि अगर हालात खराब हुए, तो निफ्टी 21000 तक फिसल सकता है। वहीं, अगर हालात सामान्य रहते हैं, तो मौजूदा लेवल से लेकर 26000 के बीच में बाजार बना रह सकता है। वहीं, अगर परिस्थितियां सुधरती हैं, तो निफ्टी 28000 से 30000 तक जा सकता है।
Nifty Base and Best Case
क्या हैं बुल केस, बेस केस और वर्स्ट केस के पैरामीटर
ब्रोकरेज हाउसों के अनुमानों के मुताबिक बेस केस यानी भारत की GDP ग्रोथ 6-7% के आसपास बनी रहे, कॉरपोरेट अर्निंग्स 10-15% की दर से बढ़ें और कच्चा तेल 70-85 डॉलर प्रति बैरल रहे, तो निफ्टी 26,000 से 28,000 तक जा सकता है। वहीं, वहीं Bull Case यानी कॉरपोरेट मुनाफा उम्मीद से ज्यादा बढ़े, विदेशी निवेश (FII) मजबूत रहे, ब्याज दरों में कटौती हो और कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आएं और मानसून अच्छा रहे, तो निफ्टी 28,000 से 32,000 तक उछल सकता है। वहीं, Bear Case या वर्स्ट केस यानी पश्चिम एशिया का तनाव जारी रहे। क्रूड का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहे। मानसून कमजोर रहे, ब्याज दर बढ़ जाएं, तो निफ्टी 19,000 से 21,000 के बीच रह सकता है।
टूट रही बेस्ट केस की उम्मीद
जून का दूसरा सप्ताह शुरू हो चुका है। ब्रेंट क्रूड 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। ब्याज दरें स्थिर हैं। लेकिन, महंगाई बढ़ रही है और मानसून कमजोर है। इस लिहाज से अब बेस्ट केस की उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है। यहां तक कि बेस केस की स्थितियां भी बनती नहीं दिख रही हैं। मोटे तौर पर अब परिस्थितियां वर्स्ट केस की तरफ बढ़ती दिख रही हैं। हालांकि, परिस्थितियां सुधरने पर बाजार उम्मीद से बहुत कम समय में रिकवरी भी कर सकता है।
डिस्क्लेमर : TimesNow Navbharat किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
