शेयर बाजार के लिहाज से देखें, तो 2025 बेहद निराशाजनक रहा। वहीं, 2026 की शुरुआत स्टॉक्स से लेकर गोल्ड-सिल्वर हर तरह के एसेट्स में धमाकेदार दिखी, लेकिन साल का दूसरा महीना भी पूरा नहीं हुआ है, मल्टीबैगर रिटर्न की उम्मीद देने वाले ये ज्यादातर एसेट्स आज धूल चाटते दिख रहे हैं। शेयर मार्केट एक जोन में फंसा है, जहां खासतौर पर स्मॉल और मिड कैप में शेयरों के साथ ही तमाम म्यूचुअल फंड्स भी बेहाल हैं। वहीं, गोल्ड और सिल्वर में महज 15 दिन के भीतर तबाही आ चुकी है। पिछले 1 महीने से 1 साल के टाइम फ्रेम पर देखें, तो बड़ी संख्या में इक्विटी म्यूचुअल फंड ने नेगेटिव रिटर्न दिया है।
| एसेट | ऑल टाइम हाई (पीक) | मौजूदा स्तर | पीक से गिरावट | गिरावट (%) |
|---|---|---|---|---|
| Sensex | 86,159 | 83,379 | -2,780 अंक | -3.23% |
| Nifty 50 | 26,373 | 25,725 | -648 अंक | -2.46% |
| Gold (MCX) | ₹1,80,000 | ₹1,53,240 | -₹26,760 | -14.87% |
| Silver (MCX) | ₹4,20,000 | ₹2,37,267 | -₹1,82,733 | -43.51% |
| Bitcoin* | $126,000 | $78,000 | -$48,000 | -38% |
क्यों फंसे आम निवेशक?
पिछले कुछ महीनों में निवेशकों को एक कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा है। जिन एसेट्स को लोग जल्दी अमीर बनने का जरिया समझ रहे थे, वही अब पोर्टफोलियो पर बोझ बन गए हैं। शेयर बाजार की तेजी पिछले एक साल से थमी हुई है। सोना-चांदी और बिटकॉइन अपने शीर्ष से 40% तक फिसल चुके हैं। आम निवेशकों को इन एसेट्स में फंसने की बड़ी वजह, जल्दी पैसा बनाने का लालच रहा है। खासतौर पर जिस तरह से गोल्ड, सिल्वर और बिटकॉइन में रैली आई, उसे देखकर तमाम लोगों ने पीक के आसपास निवेश किया और अब जब ये एसेट्स 40% तक गिर चुके हैं, तो निवेशक खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं।
| फंड का नाम | कैटेगरी | रिटर्न (%) |
|---|---|---|
| Shriram Multi Sector Rotation Fund | Sectoral/Thematic | -17.99% |
| Samco Flexi Cap Fund | Flexi Cap | -17.50% |
| quant Teck Fund | Sectoral/Thematic | -14.81% |
| Samco Active Momentum Fund | Sectoral/Thematic | -14.29% |
| LIC MF Small Cap Fund | Small Cap | -12.15% |
| Tata Small Cap Fund | Small Cap | -11.28% |
| Motilal Oswal Midcap Fund | Mid Cap | -11.36% |
| HSBC Small Cap Fund | Small Cap | -10.63% |
| Samco ELSS Tax Saver Fund | ELSS | -11.39% |
| Motilal Oswal ELSS Tax Saver Fund | ELSS | -8.00% |
मार्केट में थ्रिल और शॉर्टकट
कोविड के बाद दुनिया भर में जबरदस्त लिक्विडिटी आई। ब्याज दरें कम रहीं और शेयर बाजारों ने रिकॉर्ड ऊंचाई छुई। भारत में भी लाखों नए निवेशक बाजार में आए। सोशल मीडिया और यूट्यूब के जरिए ‘जल्दी अमीर बनो’ वाली निवेश सोच तेजी से फैली। नतीजा यह हुआ कि लोग मजबूत फंडामेंटल के बजाय तेजी पकड़ने वाले शेयरों, क्रिप्टो टोकन और कम समय में दोगुना रिटर्न देने वाले निवेश विकल्पों की तरफ दौड़ पड़े। कई स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों में बेतहाशा तेजी आई, लेकिन अब उसी तेजी का उल्टा असर दिख रहा है।
मुनाफावसूली ने बदला खेल
हाल के महीनों में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा है। ग्लोबल ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं, भू-राजनीतिक तनाव कायम है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भी दबाव बढ़ाया है। कई शेयर जो पिछले दो साल में दोगुने-तीन गुने हुए थे, अब 20–40 प्रतिशत तक फिसल चुके हैं, जो निवेशक तेजी के आखिरी दौर में बाजार में आए, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। इससे साफ हुआ कि बाजार में शॉर्टकट की सोच अक्सर गलत समय पर निवेश करवा देती है।
सोना भी सुरक्षित ठिकाना नहीं रहा
सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है, लेकिन हाल के महीनों में यहां भी अस्थिरता देखने को मिली है। ग्लोबल डॉलर की मजबूती और ब्याज दरों में अनिश्चितता के कारण सोने की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव आया। जिन निवेशकों ने ऊंचे स्तर पर खरीदारी की, वे फिलहाल सीमित रिटर्न या हल्के नुकसान में हैं। यानी हर समय सोना भी सुरक्षित नहीं रहता, खासकर तब जब निवेश बिना योजना के किया जाए।
दादा-दादी का मंत्र आखिर था क्या?
पुरानी पीढ़ी निवेश को ‘जल्दी पैसा बनाने’ का साधन नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित भविष्य’ का आधार मानती थी। उनका फोकस तीन चीजों पर होता था। नियमित बचत, कम जोखिम और धैर्य।
हर महीने थोड़ी रकम बचाना, कर्ज से दूर रहना और लंबे समय के लिए पैसा निवेश करना उनकी आदत थी। बैंक जमा, सोना, जमीन या सुरक्षित योजनाओं में निवेश कर धीरे-धीरे संपत्ति बनाना उनका तरीका था। आज की भाषा में इसे अनुशासित वित्तीय योजना और कंपाउंडिंग की ताकत कहा जाता है।
निवेशक कहां गलती कर रहे हैं?
आज कई निवेशक निवेश को ट्रेडिंग समझ बैठे हैं। सोशल मीडिया टिप्स, दोस्तों की सलाह या तेजी देखकर पैसा लगाना आम बात हो गई है। बिना जोखिम समझे निवेश करना सबसे बड़ी गलती साबित हो रही है। दूसरी गलती यह है कि लोग तेजी में लालच और गिरावट में डर के कारण गलत फैसले लेते हैं। असली निवेशक वही होता है जो योजना के अनुसार चलता है।
Small Savings rate
क्या काम आएगा पुराना मंत्र?
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक निवेश विकल्पों के साथ भी पुरानी बचत की सोच आज भी प्रासंगिक है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज निवेश के विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन अनुशासन और धैर्य की जरूरत पहले जितनी ही है। शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, सोना और यहां तक कि डिजिटल एसेट्स भी पोर्टफोलियो का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन सीमित जोखिम और लंबी अवधि की सोच जरूरी है। तेजी से अमीर बनने का सपना अक्सर निराशा देता है, जबकि धीरे-धीरे बनाया गया निवेश भविष्य में मजबूत सहारा बनता है।
पीपीएफ का लॉन्ग टर्म फायदा
PPF जैसी योजनाओं में लंबी अवधि तक निवेश पर टैक्स छूट के साथ कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है। इसी तरह पोस्ट ऑफिस की टाइम डिपॉजिट, सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम और मंथली इनकम स्कीम नियमित आय का भरोसेमंद साधन रही हैं। इन योजनाओं की खास बात यह है कि बाजार गिरने या आर्थिक संकट आने पर भी इनकी वैल्यू अचानक नहीं गिरती, जिससे निवेशक मानसिक रूप से भी सुरक्षित महसूस करता है। जबकि, दूसरी तरफ शेयर और म्यूचुअल फंड्स में फिक्स रिटर्न नहीं मिलता, इसके अलावा जो भी रिटर्न मिलता है, उस पर टैक्स लगता है, जिससे वास्तविक रिटर्न घट जाता है।
एफडी और बॉन्ड से मिलती थी स्थिर आय
बैंक एफडी और सरकारी बॉन्ड भी पारंपरिक पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा रहे हैं। खासकर रिटायर लोगों के लिए यह सुरक्षित और अनुमानित आय का जरिया बनते रहे। हालांकि महंगाई को पूरी तरह मात देने के लिए सिर्फ एफडी पर्याप्त नहीं होती, लेकिन पोर्टफोलियो में स्थिरता बनाए रखने में इनकी अहम भूमिका रहती है।
क्या है एक्सपर्ट की राय?
तेज रिटर्न के पीछे भागते नए निवेशकों को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसे लेकर CFP तारेश भाटिया, सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर और द रिचनेस अकादमी के संस्थापक का कहना है, " वर्षों के अनुभव में मैंने एक दिलचस्प बात बार-बार देखी है। बहुत से निवेशक मानते हैं कि जब बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, तो इसका मतलब है कि हर एसेट क्लास में पैसा डूब रहा है और सबसे सुरक्षित रास्ता पूरी तरह पारंपरिक बचत साधनों में लौट जाना है। लेकिन, वास्तविकता यह है कि उतार-चढ़ाव बाजार चक्र का सामान्य हिस्सा है, और सभी एसेट क्लास एक ही कारण या एक ही गति से नहीं गिरते। अक्सर उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया करने और उतार-चढ़ाव के बीच योजना बनाकर चलने का अंतर ही लंबे समय में निवेश की सफलता तय करता है। अलग-अलग बाजार चक्रों में निवेशकों के साथ काम करते हुए मैंने एक पैटर्न देखा है। जब बाजार तेजी से ऊपर जाते हैं, तो कई नए निवेशक जल्दी मुनाफे की उम्मीद से प्रवेश करते हैं, न कि दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के दृष्टिकोण से और जैसे ही उतार-चढ़ाव आता है, वही निवेशक सबसे पहले नुकसान झेलते हैं।
इसी तरह सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार जितेंद्र सोलंकी का कहना है कि नए दौर के निवेशक हाल में सोना और चांदी जैसी एसेट क्लास में मिले शानदार शॉर्ट टर्म रिटर्न से आकर्षित हो रहे हैं। वे सिर्फ पिछले रिटर्न को देखकर निवेश कर रहे हैं और फंडामेंटल को नजरअंदाज कर यह मान लेते हैं कि इससे वे जल्दी अमीर बन जाएंगे। यह तरीका गलत है। वहीं, सिर्फ पारंपरिक और बेहद सुरक्षित निवेश वाला पुराना तरीका भी सही नहीं है, क्योंकि उसमें संपत्ति बनाने के मौके छूट जाते हैं। सही तरीका एसेट एलोकेशन का है। यानी अलग-अलग एसेट क्लास में संतुलित निवेश किया जाए, ताकि जोखिम और रिटर्न के बीच संतुलन बना रहे और पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव को बेहतर तरीके से संभाला जा सके।
वहीं, सेबी रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार प्रकाश प्रहराज ने कहा, "यह एक तथ्य है कि इक्विटी और कमोडिटी में उतार-चढ़ाव रहता है, जबकि फिक्स्ड इनकम उत्पादों में आमतौर पर ऐसी अस्थिरता नहीं होती। हालांकि, दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है। इक्विटी लंबे समय में पूंजी वृद्धि (ग्रोथ) का अवसर देती है, जबकि फिक्स्ड इनकम उत्पाद पूंजी की सुरक्षा प्रदान करते हैं।
सही तरीका यह है कि निवेशक अपनी जोखिम क्षमता, वित्तीय लक्ष्यों और निवेश अवधि को ध्यान में रखते हुए एसेट एलोकेशन के आधार पर निवेश करें।"
डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
