US IRAN WAR CRUDE OIL CRISIS : अमेरिका-ईरान युद्ध को करीब 6 महीने हो चुके हैं, लेकिन वैश्विक तेल बाजार को अब तक उस स्तर का झटका नहीं लगा है, जिसकी शुरुआत में आशंका थी। इसकी बड़ी वजह रणनीतिक तेल भंडार, वैकल्पिक सप्लाई रूट, गैर-खाड़ी देशों से बढ़ता उत्पादन और चीन जैसे बड़े आयातक देशों की मांग में कमी रही है। लेकिन अब सवाल बदल गया है। अब पूछा जाने लगा है कि दुनिया कितने लंबे समय तक इस झटके को झेल सकती है?
19 अगस्त, 2026 को ब्रेंट क्रूड करीब $91.44 प्रति बैरल पहुंच गया। कीमत लगातार चौथे दिन बढ़ी और इसकी बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही को लेकर बढ़ती अनिश्चितता रही। अमेरिका इसे खुला और सुरक्षित बता रहा है, जबकि ईरान का कहना है कि जब तक उसकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, होर्मुज बंद रहेगा। इस खींचतान ने बाजार में फिर सप्लाई रिस्क बढ़ा दिया है।
आशंकाओं जितना विकराल क्यों नहीं हुआ तेल?
इस सवाल का जवाब तीन शब्दों में छिपा है। भंडार, विकल्प और मांग। असल में युद्ध के बाद ग्लोबल मार्केट में रणनीतिक भंडार से तेल जारी किया गया। IEA ने मार्च में सदस्य देशों के संयुक्त भंडार से 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने की घोषणा की थी। यह इतिहास में सबसे बड़ा स्टॉक रिलीज था। इसके साथ अमेरिका सहित कई देशों ने अपने रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल किया।
दूसरा सहारा गैर-खाड़ी सप्लाई रही। अमेरिका, ब्राजील, गुयाना जैसे उत्पादकों से उत्पादन बढ़ने की संभावना ने बाजार को कुछ राहत दी है। लेकिन यह तुरंत मिलने वाला समाधान नहीं है। नई उत्पादन क्षमता को बाजार तक पहुंचने में समय लगता है।
तीसरा और सबसे अहम कारण मांग में कमी है। अमेरिका की ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक होर्मुज संकट के कारण 2026 में वैश्विक तेल मांग पिछले साल की तुलना में करीब 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम रहने का अनुमान है। यानी सप्लाई में भारी कमी के बावजूद मांग में कमजोरी ने कीमतों को और ऊपर जाने से कुछ हद तक रोका है।
खतरा तेल की कमी नहीं, लॉजिस्टिक्स
आज की समस्या दुनिया में तेल की कमी नहीं है। बल्कि, तेल का सही जगह पर मौजूद होना जरूरी है। होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या तेजी से घटी है। 19 अगस्त को केप्लर के आंकड़ों के अनुसार एक दिन में केवल 6 कमोडिटी जहाज होर्मुज से गुजरे, जबकि हाल की औसत आवाजाही करीब 11 जहाज प्रतिदिन थी। बड़े चीनी शिपिंग ऑपरेटरों ने भी सुरक्षा जोखिम के कारण होर्मुज और बाब-अल-मंडेब मार्गों से परिचालन रोक दिया है। यही वजह है कि दुनिया के पास तेल होने के बावजूद उसकी डिलीवरी महंगी और मुश्किल हो रही है। IEA के मुताबिक संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में इतिहास का सबसे बड़ा सप्लाई डिसरप्शन आया है। होर्मुज से करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन का प्रवाह लगभग ठप होने के बाद खाड़ी देशों ने उत्पादन में बड़े स्तर पर कटौती की है।
अगर युद्ध 6 महीने और चला तो?
इस युद्ध के 6 महीने बीत चुके हैं। मार्च-अप्रैल में जब क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंची, तो अनुमान लगा गए कि अगर जल्द ही यह संकट खत्म नहीं हुआ, तो क्रूड की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। लेकिन, मई-जून में दोनों देशों के बीच बातचीत और समझौते की वजह से क्रूड 75 डॉलर तक लुढ़क गया था। लेकिन, अब फिर से चिंता बढ़ रही है। क्योंकि, ज्यादातर रणनीति रिजर्व खाली हो चुके हैं। अगर अब फिर से मार्च-अप्रैल जैसे हालात बनते हैं, तो इस बार वे सभी आशंकाएं सच साबित हो सकती हैं, जो क्रूड के 150 डॉलर पार जाने की बातें करती हैं।
अब फट सकता है क्रूड बम
IEA के आंकड़ाें के मुताबिक जून से अब तक वैश्विक तेल भंडार से औसतन 6.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन और तीसरी तिमाही में करीब 7.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन निकासी हुई। OECD देशों के तेल भंडार भी 2003 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। इसका अर्थ है कि संकट को लंबे समय तक केवल भंडार भरोसे नहीं टाला जा सकता। अभी कुछ और महीनों तक रणनीतिक रिजर्व बाजार को सहारा दे सकते हैं, लेकिन लगातार कमी बनी रही तो हर अगला महीना संकट को गहरा करता जाएगा।
भारत के लिए खतरा कितना बड़ा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में है। लेकिन इस संकट में उसकी एक बड़ी ताकत सामने आई है सप्लाई का तेजी से विविधीकरण।
भारत सरकार ने मार्च में बताया था कि उसके करीब 70% क्रूड आयात अब ऐसे रास्तों से आ रहे थे, जो होर्मुज से बाहर हैं। इससे पहले यह हिस्सेदारी करीब 55% थी। सरकार ने यह भी बताया कि घरेलू LPG उत्पादन करीब 25% बढ़ाया गया और वैकल्पिक सप्लायरों से LNG कार्गो जुटाए गए।
इसका मतलब है कि होर्मुज संकट भारत में तुरंत पेट्रोल-डीजल खत्म होने की स्थिति पैदा नहीं करता। भारतीय रिफाइनरियां रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और दूसरे स्रोतों से क्रूड खरीद सकती हैं।
फिर गहरा सकता है क्रूड का संकट
महंगा क्रूड बिगाड़ेगा हालात
भारत को भले ही आपूर्ति के विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन, ये विकल्प किफायती होंगे यह तय नहीं है। भारत के लिए क्रूड का दाम 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के बीच में रहना चाहिए। जब भी कीमत इससे ऊपर जाती है, तो भारत की इकोनॉमी पर इसका अतिरिक्त दबाव पड़ता है। हालांकि, सरकार ने LPG के संकट से निपटने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन यह भी क्रूड की सप्लाई पर निर्भर करता है।
भारत कब तक झेल सकता है?
मौजूदा स्थिति में भारत के लिए सबसे संभावित चुनौती तेल की उपलब्धता नहीं, बल्कि कीमत और महंगाई है। क्रूड अगर करीब $80-$90 के दायरे में रहता है, तो भारत वैकल्पिक सप्लाई और अपनी रिफाइनरी क्षमता के दम पर स्थिति संभाल सकता है। लेकिन, कीमत लगातार $100 के पार रहने लगी तो इसका असर आयात बिल, रुपये, चालू खाते, महंगाई और सरकारी वित्त पर दिखाई देने लगेगा। वहीं, अगर किसी घटनाक्रम के कारण क्रूड $120 या उससे ऊपर चला जाता है, तो स्थिति बिल्कुल अलग होगी। तब केवल तेल कंपनियां नहीं, बल्कि एयरलाइंस, ट्रांसपोर्ट, उर्वरक, पेट्रोकेमिकल और आम उपभोक्ता सभी प्रभावित होंगे।
दुनिया की सहनशीलता सीमा कहां है?
दुनिया अभी संकट के उस बिंदु पर नहीं पहुंची है, जहां तेल पूरी तरह खत्म हो जाए। असली सवाल यह है कि कितने समय तक बाजार कम सप्लाई, ऊंची फ्रेट कॉस्ट और घटते भंडार के साथ काम कर सकता है। अगर अगले कुछ महीनों में होर्मुज का प्रवाह धीरे-धीरे सामान्य होने लगता है, तो मौजूदा संकट को नियंत्रित किया जा सकता है। IEA भी मानता है कि आपूर्ति सामान्य होने पर कीमतें नीचे आ सकती हैं और 2027 में ब्रेंट का औसत करीब $79 प्रति बैरल रह सकता है।
