Semiconductor Hub: भारत की टैक्नोलॉजी आत्मनिर्भरता की दिशा में आज यानी 28 फरवरी 2026 को एक बड़ा कदम उठाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के साणंद में माइक्रोन टेक्नोलॉजी की पहली 'सेमीकंडक्टर असेंबली, टेस्ट और पैकेजिंग' (ATMP) यूनिट का उद्घाटन किया। यह प्लांट भारत में पहली ऐसी सुविधा होगी, जहां से 'मेड-इन-इंडिया' सेमीकंडक्टर मेमोरी मॉड्यूल का उत्पादन और निर्यात शुरू होगा। इस प्रोजेक्ट की कुल लागत 22,500 करोड़ रुपये से अधिक है और यह भारत को ग्लोबल सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में एक महत्वपूर्ण केंद्र बना देगा। साणंद में बने इस प्लांट में करीब 5 लाख वर्ग फुट का 'क्लीनरूम' होगा, जिसे दुनिया के सबसे बड़े 'रेज्ड-फ्लोर क्लीनरूम' में से एक माना जा रहा है। यहां माइक्रोन के वैश्विक नेटवर्क से आने वाले वेफर्स को DRAM और NAND जैसे मेमोरी और स्टोरेज प्रोडक्ट्स में बदला जाएगा। ये चिप्स स्मार्टफोन, सुपर कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक उपकरणों में इस्तेमाल होंगे।
आत्मनिर्भर भारत और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा
यह भारत के सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत एक बड़ी सफलता है। इस प्रोजेक्ट का भूमि पूजन सितंबर 2023 में हुआ था और यह केंद्र सरकार के मिशन के तहत मंजूर होने वाला पहला प्रस्ताव था। इस प्लांट से भारत दुनिया के लिए एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी सेमीकंडक्टर उत्पादन स्थान के रूप में उभरेगा। बढ़ती AI और हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग की डिमांड के बीच, यहां बने चिप्स अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजे जाएंगे और भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम आगे ले जाएंगे।
क्या भारत बन सकता है सेमीकंडक्टर हब?
आज की दुनिया में अगर तेल अर्थव्यवस्था की रफ्तार तय करता है, तो सेमीकंडक्टर चिप्स उस रफ्तार को दिमाग देते हैं। स्मार्टफोन, वाशिंग मशीन, मिसाइल या इलेक्ट्रिक कार हर तकनीक के पीछे चिप्स का हाथ है। इस वैश्विक प्रतियोगिता में भारत अब पीछे नहीं रहना चाहता। प्रधानमंत्री मोदी के 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' (ISM) ने भारत को इस क्षेत्र में एक मजबूत दावेदार के रूप में पेश किया है।
सेमीकंडक्टर की अहमियत
सेमीकंडक्टर चिप्स आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की आत्मा हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई, तब दुनिया को एहसास हुआ कि चिप्स के लिए केवल ताइवान या चीन पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा है। भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है, अपनी जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है। इसे बदलने और 'आत्मनिर्भर भारत' बनाने के लिए देश अब अपना सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार कर रहा है।
सरकार की रणनीति
दिसंबर 2021 में भारत सरकार ने 76,000 करोड़ रुपये की उत्पादन प्रोत्साहन योजना (PLI) की घोषणा की। यह केवल सब्सिडी नहीं है, बल्कि वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश करने का बुलावा भी है। सरकार प्रोजेक्ट की लागत का 50% तक वित्तीय समर्थन देने को तैयार है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद आकर्षक है।
बड़ी कंपनियों का भारत में प्रवेश
भारत ने इस क्षेत्र में कई बड़ी सफलताएं देखी हैं। टाटा ग्रुप की टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने ताइवान की PSMC के साथ मिलकर गुजरात के धोलेरा में पहला कमर्शियल फैब प्लांट स्थापित करने की घोषणा की है। अमेरिकी दिग्गज माइक्रोन टेक्नोलॉजी ने गुजरात के साणंद में असेंबली और टेस्टिंग (ATMP) प्लांट बनाया है। मुरुगप्पा और केन्स टेक्नोलॉजी जैसी भारतीय कंपनियां भी चिप पैकेजिंग में कदम रख चुकी हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में इंडिया चिप प्राइवेट लिमिटेड द्वारा सेमीकंडक्टर पार्क बनाया जा रहा है। यह HCL Group और Foxconn का ज्वाइंट वेंचर है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत
विश्वभर के सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजीनियरों में करीब 20% भारतीय हैं। इंटेल, एनवीडिया और क्वालकॉम के बड़े डिजाइन सेंटर भारत के बेंगलुरु और हैदराबाद में हैं। अब भारत सिर्फ 'दिमाग' नहीं देगा, बल्कि 'हाथ' यानी मैन्युफैक्चरिंग भी करेगा। सरकार ने हजारों इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने के लिए 'चिप-टू-स्टार्टअप' प्रोग्राम शुरू किया है।
चुनौतियां
सेमीकंडक्टर हब बनना आसान नहीं। प्लांट को लाखों लीटर शुद्ध पानी और 24/7 बिजली की जरूरत होती है। सप्लाई चेन में जरूरी रसायन और गैसों का इकोसिस्टम अभी विकसित हो रहा है। इस क्षेत्र में तकनीक हर 2-3 साल में बदलती है, जिससे निरंतर अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत पड़ती है।
वैश्विक भू-राजनीति
वर्तमान वैश्विक हालात में पश्चिमी देश और बड़ी कंपनियां चीन के विकल्प की तलाश में हैं। भारत अपनी लोकतांत्रिक स्थिरता और मजबूत नीतियों के कारण 'चाइना प्लस वन' रणनीति के लिए उपयुक्त है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ भारत के बढ़ते तकनीकी समझौते (जैसे iCET) इस दिशा में मील का पत्थर हैं।
भविष्य की राह
विशेषज्ञों के अनुसार 2030 तक भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 100 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है। अगर अगले 5-7 साल में 3-4 बड़े फैब प्लांट और दर्जनों असेंबली यूनिट्स स्थापित हो जाते हैं, तो भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि दुनिया को चिप्स निर्यात भी करेगा। भारत का सेमीकंडक्टर हब बनने का सपना अब केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर उतर रहा है। नीतियों में निरंतरता बनी रही, तो भारत जल्द ही विश्व का प्रमुख चिप मेकर बनकर उभरेगा।