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El Nino का साया! सूखे का इतिहास, कमजोर मॉनसून की आहट क्या बिगड़ेगा आपके किचन का बजट?

El Nino भारत के लिए अकाल के साये की तरह है। भारत की जमीन से हजारों किलोमीटर दूर होकर भी यह भारतीय घरों के किचन से लेकर कॉरपोरेट बोर्ड रूम तक बजट की चिंता खड़ी कर देता है।

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मौसम की मार से बढ़ेगी महंगाई
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated May 20, 2026, 16:33 IST

El Nino आ चुका है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) इसकी मुनादी कर चुका है। अब यह बात सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। बल्कि, आपके किचन से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों के बोर्ड रूम तक पहुंचने वाली है। क्योंकि, अल नीनो का अतीत बताता है कि जब भी इसका साया भारत पर पड़ता है, तो देश में कोहराम मच जाता है। इतिहास के पन्नों से ही यह भी बात पता चलती है कि फिलहाल भारत जिस अल नीनो का सामना करने जा रहा है, वह बीते ढाई दशक में सबसे रौद्र होने वाला है।

मोटे तौर पर भारत में अल नीनो के असर का मतलब ज्यादा गर्मी और कम बारिश होता है। लेकिन, इकोनॉमी, मॉनेटरी पॉलिसी, इन्फ्लेशन सब इसकी जद में हैं। आसान भाषा मे कहें, तो आपके-हमारे घर का बजट, नौकरियां, घर की EMI और वेतन जैसी हर चीज पर इसका असर होगा।

औसत से कम होगी बारिश

IMD के मुताबिक अल नीनो की वजह से इस बार देश में Monsoon औसत से कम रह सकता है। मौसम विभाग के मौजूदा अनुमानों के मुताबिक 2026 में मानसून कमजोर रहेगा और औसत से करीब 35 फीसदी तक कम बारिश हो सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि मानसून की बारिश पर आधारित फसलों की सिंचाई कम होगी। इसके साथ ही बांध और तालाब भी कम भरेंगे, जिसका असर पूरे साल के फसल चक्र पर होगा।

उत्पादन घटेगा महंगाई बढ़ेगी

भारत कृषि प्रधान के साथ ही मानसून प्रधान भी है। यानी देश में खेती मोटे तौर पर मानसून पर निर्भर है। कमजोर मानसून यानी फसलों का कमजोर उत्पादन, ग्रामीण मांग में कमी, खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा साथ लेकर आता है। इस तरह मानसून से शुरू हुआ यह चक्र आखिर में देश के हर व्यक्ति को प्रभावित करता है। मौसम विज्ञान और अर्थशास्त्र के आंकड़ों को मिलाकर देखा जाए, तो 2026 भी अल नीनो के पिछले एपिसोड जैसा ही दिख रहा है, जहां खेत-खलिहान से कंपनियों बोर्ड रूम तक बजट को मैनेज करने की चिंता साफ दिखती है।

क्या होता है अल नीनो?

US Geological Survey के मुताबिक स्पैनिश भाषा के शब्द अल नीनो का शाब्दिक अर्थ तो 'द क्राइस्ट चाइल्ड' होता है। लेकिन, असल में यह समुद्र की सतह के गर्म होने की घटना है। खासतौर पर सेंट्रल और ईस्टर्न ट्रॉपिकल पैसिफिक ओशन में समुद्र की सतह का टेम्परेचर जब औसत से ज्यादा हो जाता है, तो निचले लेवल की सतही हवाएं, जो आम तौर पर इक्वेटर के साथ पूरब से पश्चिम की ओर चलती हैं, जिन्हें “ईस्टरली विंड्स कहा जाता है, वे कमजोर हो जाती हैं या, कुछ मामलों में, दूसरी दिशा से चलने लगती हैं। यह घटना ऐस बदलाव लाती है, जिससे भारत सहित पूरी दुनिया में मौसम का सामान्य चक्र प्रभावित हो जाता है।

El Nino ex

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भारत के लिए क्यों चिंताजनक?

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA की अप्रेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक IMD के मानसून अनुमान इकोनॉमी के लिए चिंता खड़ी करने वाले हैं। क्योंकि, इस साल औसत बारिश में 35 फीसदी तक कमी आ सकती है। अल नीनो और भारत के अतीत को देखें, तो 1950 से अब तक भारत में 21 अल नीनो आए और 15 बार अकाल की स्थिति बनी। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRA) की रिसर्च के अनुसार, उन 15 अकाल वाले सालों में में से 10 सीधे अल नीनो से जुड़े थे। रिपोर्ट के मुताबिक मजबूत या मध्यम एल नीनो के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश की संभावना लगभग 70 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

इस बार कितना बुरा हो सकता है अल नीनो

NOAA के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर की 14 मई, 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक मई और जुलाई 2026 के बीच अल नीनो बनने की 82 फीसदी संभावना है और दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इस घटना के बने रहने की 96 फीसदी संभावना है। वहीं, WMO यानी वर्ल्ड मेटेरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन ने इस बार के अल नीनो को ऑफिशियल क्लासिफिकेशन में 'सुपर अल नीनो' कहा है। NOAA के डेटा के मुताबिक, 1950 के बाद से ऐसी घटनाएंं, जिन्हें सुपर अल नीनो कहा जा 1972-73, 1982-83, 1997-98 और 2015-16 में चार बार हुई हैं।

क्यों सबसे भयावह हो सकता है आर्थिक असर?

भारत ने पहले भी खराब मॉनसून का सामना किया है। लेकिन, 2026 पूरी तरह अलग है। राइट रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की GDP में खेती का हिस्सा लगभग 15 फीसदी है। लेकिन, यह करीब 45 फीसदी वर्कफोर्स को रोजगार देती है। करीब 60 फीसदी भारतीय किसान खरीफ सीजन की फसलों जैसे- चावल, दालें, मक्का और तिलहन के लिए पूरी तरह से मॉनसून की बारिश पर निर्भर हैं। खराब मॉनसून खेतों तक ही नहीं रहता। यह खाने की चीजों की कीमतों, ग्रामीण मजदूरी, कंज्यूमर खर्च और आखिरकार सरकार की फाइनेंशियल स्थिति पर असर डालता है।

अल नीनो का दूसरा नाम महंगाई

कोटक MF की एक रिसर्च के मुताबिक भारत में महंगाई बताने वाले सूचकांका कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाने की चीजों का हिस्सा 37 फीसदी के करीब है। पिछले अल नीनो सालों के दौरान सब्जियों की महंगाई में तेज उछाल देखा गया है। 2026 में इसी तरह का पैटर्न हेडलाइन CPI में दिख सकता है। वहीं, ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के मुताबिक RBI ने पहले ही FY2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6 परसेंट लगाया है। ऐसे में सेंट्रल बैंक के 6 परसेंट के ऊपरी टॉलरेंस बैंड के हिट होने की आशंकाएं काफी बढ़ सकती हैं, जिससे रेट सायकल प्रभावित हो सकता है। यानी ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसे कड़े फैसले भी देखने को मिल सकते हैं।

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