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EL Nino vs Hormuz : भारत की इकोनॉमी पर दोहरा संकट, कौन बड़ा और गंभीर?

भारत की इकोनॉमी पर फिलहाल दो बड़े खतरे मंडरा रहे हैं। दोनों ही खतरों पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि इन दोनों में से कौन सा खतरा ज्यादा बड़ा और गंभीर है?

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भारत पर मंडरा रहा दोहरा संकट
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Apr 27, 2026, 16:02 IST

अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी के आखिरी सप्ताह में शुरू हुई जंग भले ही थम गई है। लेकिन, इसकी वजह से ग्लोबल ऑयल सप्लाई को झटका लगा है, दुनिया को उससे उबरने में कई साल लगेंगे। IMF की पूर्व अर्थशास्त्री रह चुकीं गीता गोपिनाथ के मुताबिक भारत होर्मुज संकट की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल है।

वहीं, वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल संगठन (WMO) के हिसाब से मई से जुलाई के बीच सुपर अल नीनो भारत को अपनी चपेट में ले सकता है। इस सिलसिले में IMD यानी भारत मौसम विभाग का कहना है कि इस साल सामान्य की तुलना में बारिश का लॉन्ग टर्म औसत 92% तक सिमट सकता है।

इस तरह भारत की इकोनॉमी पर दो बड़े खतरे मंडरा रहे हैं। इनमें से पहला खतरा, यानी होर्मुज संकट साफ दिख रहा है। जबकि, अल नीनो के तौर पर उपजा खतरा अदृश्य रूप से इकोनॉमी की सांस फुलाने की तैयारी कर रहा है।

असल में फरवरी 2026 में जब ईरान ने अमेरिकी हमले के बाद होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया, तभी से पूरी दुनिया की नजरें उस संकड़े समुद्री रास्ते पर टिकी हैं, जहां से ग्लोबल ऑयल सप्लाई का 20 फीसदी कारोबार होता है। लेकिन, प्रशांत महासागर में समुद्र की गहराई में पानी के महज 2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म होने से उपजे अल नीनो पर अब ध्यान गया है।

जो खतरा दिख नहीं रहा, वो ज्यादा गहरा

मौसम वैज्ञानिक "Super El Niño" की चेतावनी दे रहे हैं। अल नीनो का ऐसा रूप जो डेढ़ सदी में पहली बार देखने को मिल सकता है। कुछ मौसम विज्ञान मॉडल इसे 140 साल का सबसे शक्तिशाली अल नीनो बता रहे हैं। अगर, अल नीनो की स्थिति चरम पर पहुंची, तो यह भारत के लिए होर्मुज से भी बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है। यहां, फर्क सिर्फ यह है कि होर्मुज की वजह से तेल के दाम में जो आग लगी है, उसकी तपिश सरकार और तेल कंपनियां सह सकती हैं। लेकिन, अल नीनो की वजह से आसमान से बरसने वाले शोले और अकाल जैसे हालात के सामने सब बेबस होंगे।

होर्मुज की चोट तीखी और सीमित

MUFG के अनुमान के अनुसार, हर $10 प्रति बैरल की तेल मूल्य वृद्धि भारत के चालू खाता घाटे को GDP के 0.4-0.5% तक बढ़ा देती है। वहीं, $100 प्रति बैरल पर यह घाटा बेसलाइन के 1.5% से बढ़कर 3% के करीब पहुंच सकता है। MUFG यह भी अनुमान लगाता है कि अगर संकट लंबा खिंचा और तेल $100 पर टिका रहा, तो USD/INR 95.50 के स्तर तक जा सकता है।

लेकिन यह एक बाहरी झटका है। तेल की कीमत बदलती है, सरकार रूस से खरीद बढ़ाती है, रुपया दबाव में आता है, फिर धीरे-धीरे संतुलन बनता है। BMI के अनुमान के अनुसार पूर्ण होर्मुज बंदी GDP को सीधे 0.5 प्रतिशत अंक तक नुकसान पहुंचा सकती है। यानी,

होर्मुज की चोट तीखी है, लेकिन सीमित है। इसके अलावा इससे निपटने की तैयारी की जा सकती है।

Hormuz vs El nino

Hormuz vs El nino

अल नीनो हमला धीमा और असीमित

अल नीनो का सीधा असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। अल नीनो जितना तीव्र होता है, भारत में मानसून उतना ही हल्का हो जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था, खासतौर पर व्यापक जनसंख्या को प्रभावित करने वाले फैक्टर में बारिश सबसे अहम है। क्योंकि, करीब 60 करोड़ लोग देश में अब भी खेती-किसानी से जुड़े हैं। इनमें से भी ज्यादातर की खेती के लिए मानसून की बारिश बेहद बहम होती है। ऐसे में यह सिर्फ बारिश का मामला नहीं है। बल्कि, भारत की लगभग 60% खेती योग्य भूमि की सिंचाई से जुड़ा मुद्दा भी है। जब बारिश कम होती है, तो खरीफ की फसलें जैसे- धान, दलहन और गन्ना सीधे प्रभावित होती हैं। ICRIER के 1951 से के ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि मध्यम से गंभीर अल नीनो के 15 में से 11 वर्षों में भारत की कृषि उत्पादन में गिरावट आई

होर्मुज और अल नीनो का संगम

यहां असली समस्या है। होर्मुज संकट और अल नीनो एक साथ आ रहे हैं। दोनों मिलकर एक-दूसरे को और घातक बना रहे हैं। होर्मुज बंद होने से अरब की खाड़ी से आने वाले यूरिया जैसे उर्वरकों की आपूर्ति बाधित हुई है। जबकि, अरब क्षेत्र वैश्विक यूरीया का 46% हिस्सा निर्यात करता है। भारत अपनी लगभग 40% उर्वरक जरूरतें सीधे पश्चिम एशिया से आयात करता है। जब उर्वरक महंगे और मानसून कमजोर हो, तो यह किसानों के साथ ही पूरी देश की इकोनॉमी के लिए चिंता की वजह है।

अल नीनो होर्मुज से बड़ा क्यों?

होर्मुज एक रास्ता है, जिसे बंद किए जाने पर दूसरे रास्तों से ऑयल सप्लाई लाई जा सकती है। भारत लगातार ऊर्जा स्रोतों में डायवर्सिफिकेशन कर रहा है। आज भारत 40 से ज्यादा देशों से कच्चा तेल आयात कर रहा है। लेकिन, मानसून का कोई विकल्प नहीं होता। आसमान का कोई बाईपास नहीं है। 1965 में जब अल नीनो की वजह से मानसूनी बारिश में 18.2% की कमी आई थी, तो

खाद्यान्न उत्पादन 19% तक गिर गया था। हालांकि, 2015 में 13.8% कमी के दौरान महज 0.2% गिरावट आई। इससे पता चलता है कि हमारी क्षमताएं बढ़ी हैंं। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि 150 साल में पहली बार आ रहे सुपर अल नीनो से निपटने के लिहाज से हमारी तैयारी है।

GDP और मांग पर सीधा असर

एग्रीकल्चर सेक्टर GDP में 18-20% हिस्सेदारी रखता है। करोड़ों लोग सीधे तौर पर इससे प्रभावित होते हैं। बारिश में कमी का मतलब होता है, फसल में कमी और इसका सीधा असर ग्रामीण मांग घटने के तौर पर दिखता है, जिससे एक ऐसा आर्थिक चक्र शुरू होता है, जो आखिर में पूरी GDP को झटका दे सकता है।

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