ईरान में युद्ध को आज 33 दिन हो गए हैं। अमेरिका-इजरायल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की थी। युद्ध के पहले कुछ ही घंटों में अमेरिका-इजरायल ने ताबड़तोड़ हमले करके ईरान के शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया था। इसके बाद भी दोनों देशों ने ईरान पर हमले जारी रखे। ईरान ने भी इजरायल के साथ ही खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और बैलेस्टिक मिसाइलें दागकर अपनी मंशा साफ कर दी। होर्मूज स्ट्रेट से ईंधन के जहाजों की आवाजाही पर इस युद्ध का बहुत ज्यादा असर पड़ रहा है। भारत में भी होर्मूज स्ट्रेट में बढ़ती टेंशन से ईंधन की सप्लाई और दामों पर असर पड़ रहा है। अब इस युद्ध से थोड़ा पीछे चलें और याद करें कि अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर क्या आरोप लगाए थे? दोनों देशों का मानना था कि ईरान यूरेनियम का संवर्धन कर रहा है, जिससे वह जल्द ही परमाणु बम बना लेगा। अमेरिका और इजरायल नहीं चाहते कि ईरान परमाणु बम बनाए, इसलिए दोनों देशों ने उसके खिलाफ यह कार्रवाई शुरू की। दावा किया जा रहा है कि ईरान के परमाणु बम बनाने के मंसूबे को काफी हद तक नुकसान पहुंचाया जा चुका है। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि अमेरिका जल्द ही ईरान की धरती पर उतरकर वहां से बम बनाने का सामान यानी यूरेनियम उठाकर ले जा सकता है। अगर ऐसा कहा जा रहा है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि अमेरिका करीब 32 साल पहले रूस की नाक के नीचे से ऐसा ही कारनामा कर चुका है। क्या था 32 साल पुराना वह मिशन और वैसा ही मिशन ईरान में करना कितना आसान या मुश्किल हो सकता है? चलिए जानते हैं।
द वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान से 10 से 11 परमाणु बम बनाए जाने लायक यूरेनियम को बाहर निकालने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर अमेरिका इस मिशन पर आगे बढ़ता है तो यह बहुत ही जटिल और खतरनाक हो सकता है। ईरान से कुल 450 किलो एनरीच्ड यूरेनियम बाहर निकालने के लिए यह ग्राउंड ऑपरेशन किया जा सकता है। इस ऑपरेशन के लिए अमेरिकी विशेष बलों को ईरान की धरती पर उतरना होगा। यह ऑपरेशन कुछ घंटों का नहीं, बल्कि इसमें कई दिन लग सकते हैं। इस दौरान जब अमेरिकी सैनिक ईरान की धरती पर होंगे तो उनकी जान को हमेशा खतरा रहेगा। कहा जा रहा है कि इस मिशन के लिए अभी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि ऐसा मिशन किया जा सकता है।
32 साल पहले का वह मिशन
रूस की नाक की नीचे से 600 किलो यूरेनियम ले गया था अमेरिका (AI Image))
जी हां, ईरान में ऐसा मिशन किया जा सकता है, क्योंकि अमेरिका 32 साल पहले ऐसे ही एक मिशन को अंजाम दे चुका है। तब अमेरिका एक देश से 600 किलोग्राम अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium - HEU) सुरक्षित निकाल चुका है। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उस ऑपरेशन को हरी झंडी दी थी और माना जा रहा है कि उसी तर्ज पर अभी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में ऐसे ही मिशन को ग्रीन सिग्नल दे सकते हैं।
कहां किया गया था 32 साल पहले वो ऑपरेशन
32 साल पहले 600 किलो Highly Enriched Uranium निकालकर सुरक्षित ले जाने का वह मिशन कजाकिस्तान में किया गया था। इतने यूरेनियम से लगभग 20 परमाणु बम बनाए जा सकते थे। इस मिशन की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि USSR का विघटन हो चुका था और इससे निकलकर 15 अलग-अलग देश बन चुके थे। अगर इतनी बड़ी मात्रा में HEU आतंकवादियों, तस्करों या हथियार माफिया के हाथ लग जाता तो वह दुनिया में तबाही मचा सकते थे। USSR के विघटन से बने 15 देशों की लिस्ट यहां नीचे दी जा रही है -
- इस्टोनिया (Estonia)
- लात्विया (Latvia)
- लिथुआनिया (Lithuania)
- बेलारूस (Belarus)
- मॉलडोवा (Moldova)
- यूक्रेन (Ukraine)
- अर्मेनिया (Armenia)
- अजरबैजान (Azerbaijan)
- जॉर्जिया (Georgia)
- कजाकिस्तान (Kazakhstan)
- किर्गिस्तान (Kyrgyzstan)
- ताजिकिस्तान (Tajikistan)
- तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan)
- उज्बेकिस्तान (Uzbekistan)
- रूस (Russia)
32 साल पहले अमेरिकी प्रोजेक्ट का नाम क्या था?
1990-91 में जब USSR का विघटन हुआ तो उस समय परमाणु बम बनाने के लिए तैयार यूरेनियम इन देशों में अलग-अलग जगह पर रह गया। कजाकिस्तान के उस्त-कामेनोगोर्स्क शहर के पास उल्बा मेटेलर्जिकल प्लांट के पुराने वेयर हाउस में यह यूरेनियम रखा हुआ था। USSR काल की अल्फा क्लास सबमरीन के लिए यह यूरेनियम रखा हुआ था। USSR के टूटने से पूरे क्षेत्र में माहौल खराब था। कमजोर सुरक्षा के चलते इस यूरेनियम के गलत हाथों में पड़ने का खतरा बना हुआ था। कजाकिस्तान ने भी उस समय परमाणु हथियारों से मुक्ति का फैसला लिया। एक लोकल मैकेनिक के जरिए अमेरिकी दूतावास को इस यूरेनियम के बारे में पता चला। महीनों तक गुपचुप डिप्लोमेसी चलती रही और फिर दोनों देशों में समझौता हो गया। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 7 अक्टूबर 1994 को प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी। प्रोजेक्ट का कोडनेम रखा गया, प्रोजेक्ट सफायर।
इतनी मात्रा के यूरेनियम से बन सकते थे 20 एटम बम (AI Image)
कैसा था प्रोजेक्ट सफायर मिशन?
अमेरिका से 31 लोगों की टीम कजाकिस्तान पहुंची और चार हफ्ते तक हर रोज 12 घंटे से भी ज्यादा समय तक काम किया। इस दौरान उन्होंने कुल 2200 किलो मैटेरियल हैंडल किया और 600 किमी HEU को 400 से अधिक स्पेशल शिपिंग कंटेनरों में पैक किया। सर्दियों के दिन थे। ठंड, बर्फ और रेडियोएक्टिव खतरे के बीच काम बहुत ही मुश्किल था। मिशन की अंतिम रात लगभग 3 बजे बर्फ से ढकी सड़क पर HEU से भरे ट्रक एयरपोर्ट की तरफ बढ़ चले। बर्फ में फिसलने और एक्सीडेंट की स्थिति में रेडिएशन का खतरा बहुत अधिक था। लेकिन अमेरिकी टीम और कजाकिस्तान के अधिकारियों ने बड़ी ही सावधानी से ट्रकों को एयरपोर्ट पहुंचा दिया। फिर C-5 गैलेक्सी विमान इस HEU के लेकर उड़ गए। विमान अमेरिका के डोवर एयरफोर्स बेस पर उतरे, यहां से ट्रकों में यूरेनियम को टेनेसी के ओक रिज में मौजूद नेशनल सिक्योरिटी कॉम्प्लेक्स में पहुंचाया गया। इसके बाद IAEA की निगरानी में खतरनाक मैटेरियल को हाई एनरिच्ड यूरेनियम से लो एनरिच्ड यूरेनियम में बदला गया, ताकि इसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल में लाया जा सके।
फिर राष्ट्रपति क्लिंटन ने की घोषणा
आखिर 23 नवंबर 1994 को अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इस मिशन की सफलता की घोषणा की। इससे दुनिया को बड़े खतरे से तो बचाया ही गया, साथ ही अमेरिका और कजाकिस्तान के बीच सहयोग के एक नए दौर की शुरुआत भी हुई।
बम की बजाय यूरेनियम से बिजली बनाएं तो कई शहर रोशन होंगे (AI Image)
ईरान में प्रोजेक्ट सफायर दोहराना मुश्किल कैसे?
कजाकिस्तान में प्रोजेक्ट सफायर बहुत ही आसानी से पूरा कर लिया गया, लेकिन ईरान में यह आसान नहीं है। क्योंकि कजाकिस्तान की तरफ से उस समय सहयोग किया जा रहा था और शांतिपूर्ण माहौल में यह मिशन किया गया था। जबकि ईरान में युद्ध चल रहा है और ईरान की तरफ से ऐसी किसी भी कोशिश का जोरदार विरोध होगा। कजाकिस्तान में खतरा सिर्फ रेडिएशन का था, ईरान में रेडिएशन के साथ वहां के सैनिकों और नॉन स्टेट एक्टर्स के हमले का भी है। कजाकिस्तान में सरकार की तरफ से सहयोग किया जा रहा था, जबकि ईरान में प्रोजेक्ट सफायर जैसे किसी मिशन के लिए टीम की जान हर समय खतरे में रहेगी। ईरान की तरफ से ऐसे किसी मिशन की टीम पर मिसाइलों की बरसात होना तय है। युद्ध के बीच अमेरिका या कोई भी देश ये उम्मीद तो नहीं कर सकता कि ईरान में आसानी से ऐसा कोई मिशन अंजाम दिया जा सकेगा। क्योंकि यह मिशन पूर तरह से हाई रिस्क वाला कॉम्बैट ऑपरेशन होगा।
एक अनुमान के मुताबिक ईरान में इस्फहान जैसे न्यूक्लियर साइट के अंडरग्राउंड टनल्स या बंकरों को सुरक्षित करना पड़ेगा। मलबे या क्षतिग्रस्त साइट्स से यूरेनियम को निकालने के लिए वहां कई दिनों तक रहना पड़ेगा। एक अनुमान के मुताबिक इस काम में लगभग 7 दिन तक लग सकते हैं।
