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Explainer: ईरान की तेल आय से लेकर चीन के बैंकों तक...,तेहरान पर दबाव बढ़ाने के लिए ट्रंप के पास क्या हैं विकल्प और इनमें कितना जोखिम?

ट्रंप का कहना है कि अमेरिका तेहरान को आर्थिक रूप से 'कड़ी चोट'पहुंचाएगा। ट्रंप के अलावा,अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में ईरान के खिलाफ ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं,जो पहले कभी नहीं देखे गए। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि दशकों से अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहा ईरान अब तक टिका कैसे हुआ है? और अगर पुराने प्रतिबंध उसका रवैया बदलने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुए, तो अमेरिका के पास अब कौन-कौन से नए विकल्प बचे हैं?

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तेहरान पर दबाव बढ़ाने के लिए ट्रंप के पास क्या हैं विकल्प? (फोटो- AI)
Edited by: Shiv Shukla
Updated Aug 22, 2026, 16:28 IST
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तारीख थी 28 फरवरी और दिन था शनिवार जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर सैन्य हमलों को अंजाम दिया था। उन हमलों से शुरू हुई जंग की आग को लगे हुए करीब छह महीने होने को आए हैं, लेकिन आग की लौ कम होने के बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही है। ईरान को इस जंग में भले ही नुकसान अमेरिका और इजरायल की अपेक्षा ज्यादा हुआ है, लेकिन उसके हौंसला है कि टूट ही नहीं रहा। ईरान अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी एक हथियार की तरह प्रयोग कर रहा है। वहीं, दूसरी ओर अमेरिका भी होर्मुज पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में एक नक्शा जारी कर एक बार फिर अपने इरादों के संकेत दे दिए थे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर एक पोस्ट किए गए नक्शे में ट्रंप ने होर्मुज को अमेरिका के नए क्षेत्र के रूप में दिखाया था। वहीं, ट्रंप ने फिर एक बार शुक्रवार को ईरान को सख्त आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी दी। ट्रंप ने कहा था कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन वह अभी सही डील के लिए नहीं तैयार है। हम देखेंगे आगे क्या होता है।उनका ये बयान तब आया जबकि पहले ही ट्रंप ने ईरान पर और सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने को लेकर बयान दिया था।

ट्रंप का कहना है कि अमेरिका तेहरान को आर्थिक रूप से 'कड़ी चोट'पहुंचाएगा। ट्रंप के अलावा,अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में ईरान के खिलाफ ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं,जो पहले कभी नहीं देखे गए। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि दशकों से अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहा ईरान अब तक टिका कैसे हुआ है? और अगर पुराने प्रतिबंध उसका रवैया बदलने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुए, तो अमेरिका के पास अब कौन-कौन से नए विकल्प बचे हैं?

दशकों पुराने प्रतिबंध,फिर भी ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह क्यों नहीं टूटी?

अमेरिका,संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने 1970 के दशक के आखिर से अलग-अलग कारणों से ईरान पर प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें उसके परमाणु कार्यक्रम,मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन और पश्चिमी देशों द्वारा आतंकी या उग्रवादी संगठनों को समर्थन बताए जाने जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। लेकिन प्रतिबंधों का इतिहास यह भी दिखाता है कि किसी देश पर केवल आर्थिक पाबंदियां लगा देना पर्याप्त नहीं होता। अगर प्रतिबंधित देश वैकल्पिक बाजार,खरीदार,भुगतान व्यवस्था और आपूर्ति नेटवर्क तैयार कर ले,तो वह काफी हद तक दबाव का सामना कर सकता है और ईरान ने यही किया है। ईरान के मामले में तेल सबसे महत्वपूर्ण कारक है। उसकी अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा निर्यात एक बड़ा राजस्व स्रोत है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरानी तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता रहा है। इस कारोबार को संभव बनाने के लिए जटिल शिपिंग नेटवर्क, कंपनियों के बदलते ढांचे,बिचौलियों और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने समुद्री,ऊर्जा और वित्तीय प्रतिबंधों को और बढ़ाया तथा नौसैनिक नाकेबंदी भी शुरू की। अमेरिकी वित्त विभाग के OFAC के आंकड़ों के मुताबिक,ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद एजेंसी 1,000 से अधिक व्यक्तियों,जहाजों और विमानों पर प्रतिबंध लगा चुकी है। हाल के अमेरिकी कदमों में ईरान की कथित शैडो ऑयल फ्लीट,शिपिंग बीमा कंपनियों,हथियार खरीद में मदद करने वाले नेटवर्क और डिजिटल एक्सचेंजों को निशाना बनाया गया है। अब वाशिंगटन के सामने सवाल है कि अगला कदम कितना बड़ा और कितना जोखिम भरा होना चाहिए। आइए समझते हैं कि अमेरिकी ईरान के खिलाफ क्या क्या ठोस कदम उठा सकता है...

पहला विकल्प- चीन की 'टीपॉट' रिफाइनरियों पर दबाव

ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने का सबसे सीधा तरीका उसके तेल खरीदारों को निशाना बनाना हो सकता है। इस मामले में चीन सबसे महत्वपूर्ण है। 2025 के केप्लर आंकड़ों के अनुसार चीन ईरान के समुद्री मार्ग से भेजे जाने वाले तेल का 80 प्रतिशत से अधिक खरीदता है। चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियां,जिन्हें आमतौर पर “टीपॉट रिफाइनरियां” कहा जाता है, इस व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालती हैं।

ये रिफाइनरियां चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनके मुनाफे का मार्जिन अक्सर बहुत कम होता है और कुछ मामलों में नकारात्मक भी हो सकता है। इसलिए अमेरिकी प्रशासन का अनुमान हो सकता है कि कड़े प्रतिबंध या द्वितीयक प्रतिबंधों का खतरा पैदा कर इन खरीदारों को ईरानी तेल से दूर किया जाए।

बता दें कि सामान्य प्रतिबंध सीधे उस देश,कंपनी या व्यक्ति को निशाना बनाते हैं जिस पर अमेरिका कार्रवाई कर रहा है। इसके विपरीत,द्वितीयक प्रतिबंध किसी तीसरे देश की कंपनी या संस्था पर लगाए जा सकते हैं,अगर वह प्रतिबंधित इकाई के साथ व्यापार कर रही हो। यानी अमेरिका सिर्फ ईरान को नहीं,बल्कि ईरानी तेल खरीदने वाली चीनी कंपनियों को भी दंडित करने की कोशिश कर सकता है।

हालांकि इसमें एक बड़ी समस्या भी है। कई छोटी चीनी रिफाइनरियों का अमेरिकी बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था से सीमित संबंध है। अगर किसी कंपनी को डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली या अमेरिकी बाजार की विशेष जरूरत नहीं है,तो अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रत्यक्ष असर सीमित हो सकता है। fसके बावजूद बड़ी संख्या में खरीदारों पर कार्रवाई का डर पैदा करना बाजार में व्यापक “चिलिंग इफेक्ट” ला सकता है। कंपनियां कानूनी और वित्तीय जोखिम से बचने के लिए ईरानी तेल से दूरी बना सकती हैं।

दूसरा विकल्प- चीनी बैंकों को निशाना बनाना

तेल खरीदने वाली रिफाइनरी को निशाना बनाना एक तरीका है,लेकिन उस व्यापार को चलाने वाले वित्तीय नेटवर्क को रोकना कहीं अधिक असरदार हो सकता है। ऐसे में अमेरिका इस व्यापारिक नेटवर्क को चलाने वाली बैंकों पर भी कार्रवाई कर सकता है। अमेरिकी वित्त विभाग पहले ही चीन और हांगकांग स्थित कुछ छोटे संस्थानों पर कार्रवाई कर चुका है,जिन पर अरबों डॉलर के ईरानी तेल लेनदेन को प्रोसेस करने और हथियार खरीद से जुड़े नेटवर्क को मदद देने के आरोप हैं। अमेरिकी ट्रेजरी दो बड़े चीनी बैंकों को भी चेतावनी दे चुकी है कि अगर उनके सिस्टम से ईरानी धन का लेनदेन पाया गया तो वे द्वितीयक प्रतिबंधों के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि अमेरिका ने इन बैंकों की सार्वजनिक पहचान नहीं बताई है और अब तक उन्हें औपचारिक रूप से प्रतिबंधित नहीं किया गया है।

अगर वाशिंगटन वास्तव में किसी बड़े चीनी बैंक को निशाना बनाता है तो उसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। दूसरे बड़े बैंक और वित्तीय संस्थान भी ईरान से जुड़े किसी भी लेनदेन से दूर हो सकते हैं।

लेकिन चीन पर कार्रवाई अमेरिका के लिए भी जोखिम भरी

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। चीन ऐसी कार्रवाई को अपने वित्तीय हितों पर हमला मान सकता है और जवाबी कदम उठा सकता है। खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, प्रौद्योगिकी और महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर पहले से तनाव है, यह कदम दोनों महाशक्तियों के रिश्ते को और खराब कर सकता है। ट्रंप प्रशासन के लिए यह दुविधा इसलिए भी बड़ी है क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और पश्चिमी देश उन्नत तकनीक के लिए जरूरी महत्वपूर्ण खनिजों की वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। चीन अगर जवाबी कार्रवाई में ऐसे खनिजों या अन्य महत्वपूर्ण निर्यातों पर नियंत्रण कड़ा करता है तो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए नई मुश्किल पैदा हो सकती है। यही कारण है कि ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति चीन के साथ सीधे आर्थिक टकराव का रूप भी ले सकती है।

तीसरा विकल्प- ईरान के नेटवर्क पर बैक-टू-बैक कार्रवाई

ईरान की कमर तोड़ने के लिए अमेरिका के पास सबसे संभावित रास्ता यह है कि अमेरिका लगातार उन व्यक्तियों,कंपनियों,जहाजों और बिचौलियों को निशाना बनाता रहे जो ईरान को प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। इसे “व्हैक-ए-मोल” रणनीति की तरह बताया गया है। इसका अर्थ है कि जैसे ही एक नेटवर्क बंद किया जाता है,उसकी जगह दूसरा नेटवर्क खड़ा हो जाता है। अमेरिका किसी शेल कंपनी,तेल टैंकर या बिचौलिए पर प्रतिबंध लगाता है,तो कथित तौर पर नए नाम,नई कंपनियां और नए रास्ते सामने आ जाते हैं।

प्रतिबंध विशेषज्ञ ब्रेट एरिकसन का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई अब तक ईरान के व्यवहार में निर्णायक बदलाव नहीं ला सकी है,क्योंकि तेहरान पुराने नेटवर्क के खत्म होने पर नए नेटवर्क खड़े कर लेता है। उनका कहना है कि बावजूद इसके यह रणनीति बेकार नहीं है। इसका उद्देश्य हर कारोबार को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि उसे अधिक महंगा, जोखिमपूर्ण और जटिल बनाना है। अगर तेल बेचने के लिए ईरान को ज्यादा बिचौलिए इस्तेमाल करने पड़ें, ज्यादा छूट देनी पड़े और लंबी वित्तीय श्रृंखला बनानी पड़े तो उसे वास्तविक राजस्व कम मिल सकता है।

चौथा विकल्प- विमानन और दूसरे लॉजिस्टिक नेटवर्क पर शिकंजा

मियाद मालेकी जैसे प्रतिबंध विशेषज्ञों का अनुमान है कि अमेरिकी प्रशासन तेल व्यापार के अलावा उन माध्यमों को भी निशाना बना सकता है जिनके जरिए ईरान अपना आयात और व्यापार संचालित करता है। विमानन क्षेत्र पर अतिरिक्त प्रतिबंध एक संभावित विकल्प हो सकता है। अगर समुद्री व्यापार पहले से ही अमेरिकी नाकेबंदी और निगरानी के दबाव में है,तो हवाई परिवहन से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई ईरान की व्यापारिक और लॉजिस्टिक क्षमता को और प्रभावित कर सकती है।

पांचवां और सबसे कठिन विकल्प- जमीनी नाकेबंदी

समुद्री रास्तों के बाद अमेरिका सैद्धांतिक रूप से ईरान की सीमाओं से होने वाले व्यापार को भी सीमित करने की कोशिश कर सकता है। इसे जमीनी नाकेबंदी कहा जा सकता है। लेकिन ईरान की लंबी सीमाएं हैं और वह इराक,तुर्किये,पाकिस्तान,अफगानिस्तान,तुर्कमेनिस्तान,अजरबैजान और आर्मेनिया सहित कई देशों से जुड़ा हुआ है। किसी प्रभावी जमीनी नाकेबंदी के लिए इन पड़ोसी देशों का व्यापक सहयोग चाहिए होगा।

हर पड़ोसी देश के अपने राजनीतिक और आर्थिक हित हैं। कुछ देशों पर अमेरिका का प्रभाव अधिक हो सकता है,लेकिन उन्हें ईरान के साथ व्यापार पूरी तरह बंद करने के लिए तैयार करना आसान नहीं होगा। पाकिस्तान हाल में अमेरिकी ट्रेजरी से 10 अरब डॉलर की करेंसी स्वैप लाइन मांग रहा था,जबकि तुर्किये अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में दोबारा शामिल होने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में अमेरिका को कुछ कूटनीतिक दबाव भले ही मिल सकती है, लेकिन अफगानिस्तान जैसी सीमा अत्यंत कठिन और पहाड़ी इलाकों से गुजरती है, जहां प्रभावी निगरानी बेहद मुश्किल है।

छठा विकल्प- ईरान से कारोबार करने वाले देशों पर ‘सेकेंडरी टैरिफ’

ट्रंप पहले भी उन देशों के सामान पर शुल्क लगाने की धमकी दे चुके हैं जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं। इसका मतलब होगा कि अमेरिका सीधे ईरान पर ही नहीं, बल्कि उसके व्यापारिक साझेदारों पर भी आर्थिक दबाव बनाए। हालांकि ऐसे शुल्क लगाने के लिए कानूनी आधार एक बड़ी चुनौती है।सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे करों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे कानूनी आधार को खारिज कर दिया था। फिर भी पिछले सप्ताह अमेरिकी सीनेट से पारित व्यापक रूस प्रतिबंध विधेयक में नए ईरान प्रतिबंध और राष्ट्रपति को संभावित रूप से अतिरिक्त टैरिफ शक्तियां देने का प्रावधान शामिल है। हालांकि इसे अभी प्रतिनिधि सभा से पारित होना बाकी है। अगर यह कानून आगे बढ़ता है तो ट्रंप के पास उन देशों के खिलाफ अधिक आक्रामक आर्थिक कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है जो ईरान के वाणिज्य या हथियार खरीद नेटवर्क की मदद करते हैं। लेकिन यह विकल्प भी राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के साथ-साथ कुछ रिपब्लिकन सदस्यों को भी व्यापक टैरिफ उपायों पर चिंता है।

ऐसे में इन सब प्रतिबंधों को और कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन के सामने असली चुनौती और प्रतिबंध लगाने की नहीं,बल्कि ईरान की तेल आय,वित्तीय नेटवर्क और वैकल्पिक व्यापारिक रास्तों को इस हद तक सीमित करने की है कि दबाव तेहरान की नीतियों को बदलने में सक्षम हो। लेकिन अमेरिका ईरान के आर्थिक साझेदारों खासकर चीन को जितना ज्यादा निशाना बनाएगा,उतना ही यह संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित आर्थिक टकराव न रहकर व्यापक भू-राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।

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