Times Now Navbharat Explainer: इंटरनेट पर अक्सर भारत की जाति व्यवस्था (Caste System) को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चाएं होती हैं। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर भारतीयों और वैश्विक यूजर्स के बीच एक नई बहस छिड़ गई कि 'क्या चीन में भी कोई जाति व्यवस्था है?' इस बहस के केंद्र में आया चीन का एक पुराना कानून, जिसे 'हुकौ व्यवस्था' (Hukou System) कहा जाता है। जानकारों का मानना है कि भले ही यह भारत जैसी पारंपरिक या धार्मिक जाति व्यवस्था न हो, लेकिन इसके कारण चीन में जो सामाजिक भेदभाव और विभाजन पैदा होता है, वह किसी जाति व्यवस्था से कम नहीं है।
क्या चीन में भी है भारत जैसी 'जाति व्यवस्था'? छिड़ी बहस, जानिए क्या है ड्रैगन का 'हुकौ सिस्टम' जिसने जनता को दो हिस्सों में बांटा (istock)
क्या है चीन का 'हुकौ (Hukou) सिस्टम'?
'हुकौ' असल में चीन की एक पारंपरिक घरेलू पंजीकरण प्रणाली है, जिसे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने 1958 में आधिकारिक तौर पर लागू किया था। इसके तहत चीन के हर नागरिक को जन्म के समय ही दो कड़े विभागों में पंजीकृत कर दिया जाता है:
शहरी हुकौ (Urban Hukou): शहरों में रहने वाले लोग।
ग्रामीण हुकौ (Rural Hukou): गांवों में रहने वाले किसान और मजदूर।
मूल बात यह है: यह सिर्फ एक एड्रेस प्रूफ या पहचान पत्र नहीं है। यह तय करता है कि आपको देश में क्या अधिकार मिलेंगे और क्या नहीं। आप किस हुकौ में पैदा हुए हैं, यह काफी हद तक आपकी मां के हुकौ पर निर्भर करता है, जिसे बदलना लगभग नामुमकिन होता है।
इसके कारण कैसे होता है 'जाति जैसा भेदभाव'?
इस व्यवस्था के चलते चीन की आबादी दो अलग-अलग वर्गों में बंट गई है, जहां ग्रामीण हुकौ वाले लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। इसके मुख्य बिंदु हैं:
संसाधनों और सुविधाओं का असमान बंटवारा: शहरी हुकौ वाले नागरिकों को चीन के बेहतरीन सरकारी स्कूलों, टॉप अस्पतालों, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता है। वहीं, ग्रामीण हुकौ वाले लोग इन सुविधाओं से पूरी तरह वंचित रह जाते हैं।
शहरों में 'अवैध' प्रवासी जैसी स्थिति: यदि कोई ग्रामीण हुकौ वाला व्यक्ति रोजगार की तलाश में बीजिंग या शंघाई जैसे बड़े शहर जाता है, तो उसे वहां रहने की अनुमति तो मिल जाती है, लेकिन उसे 'प्रवासी मजदूर' माना जाता है। उसके बच्चों को शहरों के सरकारी स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता और न ही उन्हें मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है।
शादी-ब्याह और सामाजिक प्रतिष्ठा में अंतर: इंटरनेट पर बहस के दौरान यह बात सामने आई कि चीन के शहरों में आज भी 'ग्रामीण हुकौ' वाले लड़के या लड़की से शादी करने को कतई पसंद नहीं किया जाता। इसे सामाजिक और आर्थिक रूप से नीचा माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में अंतर-जातीय शादियों को लेकर हिचकिचाहट होती है।
भारत की 'जाति' बनाम चीन का 'हुकौ'
भारत की जाति व्यवस्था- मूल आधार- धार्मिक, ऐतिहासिक और जन्म
चीन का हुकौ सिस्टम- मूल आधार- प्रशासनिक, सरकारी और भौगोलिक (स्थान आधारित)
भारत की जाति व्यवस्था- कानूनी स्थिति- कानूनन प्रतिबंधित और दंडनीय (आरक्षण के जरिए सुधार का प्रयास)
चीन का हुकौ सिस्टम- कानूनी स्थिति- सरकार द्वारा खुद संचालित और कानूनी रूप से लागू
भारत की जाति व्यवस्था- बदलाव- जाति को चाहकर भी बदला नहीं जा सकता
चीन का हुकौ सिस्टम- बदलाव- कुछ विशेष परिस्थितियों (जैसे सेना, बड़ी सरकारी नौकरी या अमीर होने पर) में बदला जा सकता है, पर यह बेहद कठिन है।
सोशल मीडिया पर भारतीयों का क्या तर्क है?
ऑनलाइन बहस में भारतीय यूजर्स का कहना है कि जब भी पश्चिमी मीडिया या वैश्विक मंचों पर भारत के सामाजिक ताने-बाने की आलोचना होती है, तो चीन के इस 'हुकौ सिस्टम' को हमेशा छुपा लिया जाता है। चीन खुद को एक 'समानतावादी' कम्युनिस्ट देश कहता है, लेकिन हकीकत में उसने कानूनी तौर पर अपने ही नागरिकों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर रखी है, जो अमीरों को और अमीर तथा ग्रामीणों को हमेशा के लिए हाशिए पर धकेल देती है।
ऐसे में जो बात सामने आई है वो ये कि चीन में भले ही हमारे जैसी 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र' वाली धार्मिक व्यवस्था न हो, लेकिन 'शहरी बनाम ग्रामीण' का यह हुकौ विभाजन व्यावहारिक रूप से ठीक वैसा ही काम करता है। यह जन्म से तय होता है, भेदभाव को बढ़ावा देता है, और व्यक्ति के आगे बढ़ने के अवसरों को सीमित कर देता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे चीन की आधुनिक और कानूनी जाति व्यवस्था कह रहे हैं।
