Times Now Navbharat
live-tv
Premium

'कायर, कागजी शेर' : NATO पर क्यों निकल रही ट्रंप की खिसियाहट, ईरान युद्ध के बाद क्या 'सबक' सिखाएंगे?

व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि हमें किसी की जरूरत नहीं है, हम दुनिया के सबसे ताकतवर देश हैं। हमारी सेना सबसे ताकतवर है। हमें उनकी जरूरत नहीं है, दो सप्ताह पहले यूनाइटेड किंगडम ने कहा कि वह अपने युद्धपोत भेजना चाहता है लेकिन मैंने कहा कि हमें आपकी जरूरत नहीं है।

Image
Photo : AP
नाटो देशों से नाराज हुए डोनाल्ड ट्रंप।
Written by: Alok Rao
Updated Mar 21, 2026, 11:49 IST
Follow on Google News

Why is Trump angry with NATO: डोनाल्ड ट्रंप खिसिया गए हैं। उनकी खिसियाहट नाटो पर निकली है। ट्रंप ने उन्हें कागजी शेर और कायर तक बता दिया है। आपको याद होगा कि कुछ दिनों पहले ट्रंप ने चीन, जापान सहित नाटो देशों से अपने युद्धपोत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भेजने के लिए कहा था लेकिन किसी भी देश ने अपने युद्धपोत नहीं भेजे। अपने आदेश का पालन नहीं होने नाराज हुए ट्रंप ने नाटो पर जमकर अपनी भड़ास निकाली है। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि 'बिना यूएस नाटो कुछ भी नहीं है। वे कागज के शेर हैं। अपने सोशल मीडिया अकाउंट ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के बिना नाटो कागज का शेर है। वे न्यूक्लियर हथियार वाले ईरान को रोकने के लिए लड़ना नहीं चाहते। सैन्य रूप से यह लड़ाई जीत ली गई है। उनके लिए बहुत थोड़ा खतरा है। वे शिकायत कर रहे हैं इस लड़ाई की वजह से उन्हें तेल के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है लेकिन वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाने में मदद नहीं करना चाहते। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में युद्धपोत भेजना उनके लिए आसान था, ...कायर हम इसे याद रखेंगे।'

पर्शियन गल्फ से निकाले अपने युद्धपोत, अरब सागर में भेजा

व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि हमें किसी की जरूरत नहीं है, हम दुनिया के सबसे ताकतवर देश हैं। हमारी सेना सबसे ताकतवर है। हमें उनकी जरूरत नहीं है, दो सप्ताह पहले यूनाइटेड किंगडम ने कहा कि वह अपने युद्धपोत भेजना चाहता है लेकिन मैंने कहा कि हमें आपकी जरूरत नहीं है। हम इनकी सुरक्षा और नाटो पर काफी पैसा खर्च कर रहे हैं। हम हजारों किलोमीटर दूर यूक्रेन में इनकी मदद कर रहे हैं।' ट्रंप का यह गुस्सा इसिलए है क्योंकि उनके कहने के मुताबिक देशों ने अपने युद्धपोत नहीं भेजे। वे चाहते हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जहां ईरान तेल टैंकरों और जहाजों को निशाना बनाता आया है, वहां वे अपने युद्धपोत भेज दें। नाटो जिसमें ज्यादातर यूरोपीय देश वे इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं है। वे ईरान के साथ अपना टकराव नहीं चाहते। मजेदार बात यह है कि ईरान के बढ़ते हमलों के बाद ट्रंप ने अपने एयरक्राफ्ट करियर को पर्शियन गल्फ (फारस की खाड़ी) से निकालकर दूर अरब सागर में ले गए हैं। यानी अपने एयरक्राफ्ट की सुरक्षा की चिंता उन्हें है लेकिन नाटो को होर्मुज के दलदल में फंसाना चाहते हैं।

युद्ध शुरू करने के पारे में नाटो से नहीं ली राय

सवाल है कि ट्रंप आखिर किस अधिकार से नाटो देशों को अपना युद्धपोत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भेजने के लिए कह रहे हैं। पहली बात, यह युद्ध नाटो का नहीं है। बीते 28 फरवरी को इस युद्ध को ट्रंप ने खुद शुरू किया। जंग शुरू करने से पहले उन्होंने नाटो या यूरोपीय देशों के साथ कोई सलाह-मशविरा नहीं किया और न ही उनकी राय ली। अपने अहंकार और सबसे मजबूत सेना का दंभ लेकर वह ईरान पर टूट पड़े और जब मिडिल इस्ट में उनके सैन्य ठिकानों पर मार पड़ी, सात अमेरिकी सैनिक मारे गए और एयरक्राफ्ट सहित सैन्य उपकरणों को नुकसान पहुंचने लगा तो उन्हें नाटो की याद आने लगी। नाटो उनकी क्यों मदद करे? ट्रंप दूसरी बार जबसे राष्ट्रपति बने हैं। वह आए दिन यूरोपीय नेताओं को सार्वजनिक रूप से जलील-फजीहत करते आए हैं। ऐसा लगता है कि दोस्तों को मजाक बनाने में उन्हें मजा आता है।

donald Trump

donald Trump

यूरोपीय देशों के नेताओं को बार-बार जलील किया

राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोप और नाटो के बारे में उन्होंने कई बार उल्टी-सही बातें की हैं। यूरोप के नेताओं को कमजोर बताया और किएर स्टार्मर को 'मूर्ख'तक कह दिया। कनाडा जो कि यूएस का बेहद करीबी देश है। उसे अपना 51वां राज्य बनाने की बात कह और उस पर टैरिफ लगाकर उसे दूर किया। यूरोप के अन्य देशों पर टैरिफ लगाकर उनकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के दांव ने यूरोपीय देशों को हिलाकर रख दिया। यूरोप के देश सकते में आ गए कि जो देश उनकी सुरक्षा करने की बात करता है, वही देश उन पर धावा बोलने के लिए तैयार है।

यूरोप के साथ शत्रु जैसा बर्ताव किया

कहने का मतलब है कि यूरोप और अमेरिका की दोस्ती और करीबी आज की नहीं बल्कि कई दशकों पुरानी है। ये वे देश हैं जो 60-70 साल से अमेरिका के पीछे खड़े रहे। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया के सैन्य अभियानों में इन्होंने अमेरिका का पूरा साथ दिया। इन देशों में अपने सैनिक गंवाए। लेकिन ट्रंप ने उनकी इस कुर्बानी और बलिदान की कोई परवाह नहीं की। इनके साथ शत्रुओं जैसा बर्ताव करने लगे। अब ट्रंप इन्हीं देशों से चाहते हैं कि वे उनकी मदद करें।

iran war

iran war

होर्मुज में सुरक्षित गलियारे के लिए एक साथ आए 6 देश

ईरान युद्ध में न पड़ने की यूरोपीय देशों की अपनी वजहें हैं। वे वजहें वाजिब भी हैं। वे ईरान के साथ सीधा टकराव नहीं चाहते। हां, तेल और गैस को लेकर उनकी चिंता है और यह चिंता सभी देशों की है। वे भी चाहते हैं कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल टैंकर निकले, मध्य पूर्व में गैस स्टेशनों और तेल रिफाइनरियों पर हमले न हों। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और नीदरलैंड इन छह देशों की कोशिश है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक सुरक्षित गलियारा निकले। इसके लिए वे ईरान के संपर्क में हैं। बात यह है कि नाटो से बिना पूछे या उनकी राय लिए ट्रंप यदि युद्ध में गए तो इससे निकलना भी उन्हें आना चाहिए। उन्होंने क्या सोचा था कि इजराइल के साथ मिलकर वह दो-चार दिनों में ईरान को निपटा देंगे।

नाटो को 'सबक' सिखाने के लिए कदम उठा सकते हैं ट्रंप

ईरान, वेनेजुएला नहीं है। 22 दिन के इस युद्ध में ईरान ने अमेरिका के दांत खट्टे कर दिए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इस युद्ध से वह कैसे निकलें। अमेरिका में ट्रंप से सवाल किए जा रहे हैं कि आखिर इस युद्ध के लिए वे गए क्यों? इसका जवाब देना उन्हें मुश्किल हो रहा है। इस युद्ध से दूरी बनाना नाटो और यूरोप के लिए सही कदम है। ट्रंप को जताना जरूरी है कि उनके हिसाब से दुनिया नहीं चलेगी। नाटो ने ट्रंप को यही संदेश दिया है। हालांकि, नाटो के इस रुख से ट्रंप के अहं को ठेस पहुंची है। आशंका है कि ईरान युद्ध से निकलने के बाद वे नाटो को सबक सिखाने के लिए ऊल-जुलूल फैसले ले सकते हैं। नाटो को इसके लिए तैयार रहना चाहिए।

End of Article