What is Suez Canal Crisis : प्राचीन काल से दुनिया पर ताकतवर देशों की हुकूमत रही है। रोमन साम्राज्य, ऑटोमन साम्राज्य, मंगोल साम्राज्य, रूसी साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य ने अलग-अलग समय पर विश्व के ज्यादातर हिस्सों पर राज किया। ब्रिटेन के बारे में कहा जाता है कि इसके सूरज का कभी अंत नहीं होता था लेकिन समय के साथ साम्राज्य कमजोर हुए और फिर इनका पतन हुआ। दुनिया पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाला ब्रिटिश साम्राज्य भी खुद को संभाल नहीं पाया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उसकी ताकत कमजोर पड़ गई। धीरे-धीरे दुनिया के नक्शे पर अमेरिका का उदय एक सुपरपावर के रूप में हुआ। ब्रिटेन जो कि कमजोर होने के बावजूद खुद को सुपरपावर समझने की गलतफहमी पाले हुआ था वह जल्द ही, 1956 में दूर हो गई। वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका ने खुद को एक ताकतवर मुल्क के रूप में स्थापित कर लिया।
आज यूएस की बात नहीं सुन रहे उसके करीबी देश
ब्रिटेन की बादशाहत खत्म होने और नए सुपरपावर के रूप में यूएस के उभरने की कहानी दिलचस्प है, क्योंकि इसका इतिहास स्वेज नहर से जुड़ा है। एक स्वेज नहर का मामला जिसने जियो-पॉालिटिक्स में यूएस की धाक जमा दी तो दूसरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जहां अमेरिका की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। यूएस के करीबी देश आज उसकी बात नहीं सुन रहे हैं। ईरान युद्ध पर यूरोप और नाटो देशों का रुख यूएस के सुपरपावर होने के दर्जे पर सवाल खड़ा कर रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आज 1956 के स्वेज नहर संकट की याद दिला रहा है।
नासिर ने स्वेज नहर को राष्ट्रीयकृत घोषित कर दिया
स्वेज नहर मिस्र में स्थित एक मानव निर्मित जलमार्ग है जो भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ता है। 1869 में खुली यह 193 किलोमीटर लंबी नहर यूरोप और एशिया के बीच का सबसे छोटा समुद्री मार्ग है। इस नहर से होकर वैश्विक व्यापार का लगभग 12% हिस्सा गुजरता है। इस नहर की देख-रेख ब्रिटेन और फ्रांस संयुक्त रूप से करते थे, और इस पर नियंत्रण भी उन्हीं का था लेकिन 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर को राष्ट्रीयकृत कर दिया। राष्ट्रपति नासिर के इस कदम से ब्रिटेन और फ्रांस भड़क गए और इससे एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। दरअसल, मिस्र के आसवान हाई डैम प्रोजेक्ट की वित्तीय मदद देने से पश्चिमी देश पीछे हट गए थे, यह बात राष्ट्रपति नासिर को बुरी लगी थी। ऐसे में स्वेज नहर को राष्ट्रीयकृत करते हुए उन्होंने अपने इस कदम सही ठहराया। राष्ट्रपति नासिर के इस कदम ने ब्रिटेन एवं फ्रांस की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर चुनौती दी। यह वही समय था जब एशिया एवं अफ्रीकी देशों में औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ भावनाएं तीव्र हो गई थीं। इसी समय एक करिश्माई नेता के रूप में नासिर के उभार ने अरब देशों में राष्ट्रीयता की भावना को उभारा और उन्हें एकजुट किया।
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मध्य पूर्व में पश्चिमी देशों के रसूख को मिली चुनौती
इस विवाद ने न केवल मध्य पूर्व में पश्चिमी देशों के रसूख और औपनिवेशिक दबदबे को चुनौती दी बल्कि इसने शीत युद्ध के दौरान ताकत के बदलते स्वरूप और परिदृश्य को प्रमुखता से उजागर कर दिया। फ्रांस और ब्रिटेन के लिए स्वेज नहर पर नियंत्रण उनके आर्थिक प्रभाव को प्रमुखता से आगे बढ़ाता था। यह रास्ता एशिया एवं अफ्रीका में उनकी आसान पहुंच भी देता था। तो वहीं मिस्र इसे अपने लिए विदेशी औपनिवेशिक दबदबे के एक प्रतीक एवं अपमान के रूप में देखता था। राष्ट्रपति नासिर ने मध्य पूर्व एवं अफ्रीका के अन्य देशों को एक खुद्दार मुल्क के रूप में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मिस्र पर हमले की बनाई योजना
अक्टूबर 1956 में ब्रिटेन, फ्रास और इजराइल ने गोपनीय तरीके से मिस्र पर हमले की योजना बनाई। इस योजना के तहत इजराइल ने सिनाई प्रायद्वीप पर हमला कर दिया। कुछ समय बाद ब्रिटेन एवं फ्रांस ने मिस्र के इलाकों पर हमले शुरू कर दिए। इनको कोशिश स्वेज नहर पर दोबारा नियंत्रण पाना और नासिर को सत्ता से बेदखल करना था। देखते ही देखते इस संघर्ष ने बड़ा रूप ले लिया। इस संघर्ष की आंच अमेरिका तक पहुंची। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर ने मिस्र पर हमले की निंदा की। उन्होंने कहा कि इस हमले के बारे में उन्हें जानकादी नहीं दी गई। यही नहीं रूस भी चुप नहीं था। उसने कहा कि वह सैन्य दखल देगा। फ्रांस और ब्रिटेन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव खासकर संयुक्त राष्ट्र का बढ़ता जा रहा था। इसका असर यह हुआ कि 1957 की शुरुआत होते-होते ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल को अपनी सेनाएं पीछे करनी पड़ीं।
ब्रिटेन की साम्राज्यवादी छवि को लगा बड़ा धक्का
इतिहास में पहली बार दोनों औपनिवेशिक ताकतों ब्रिटेन और फ्रांस को अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकना पड़ा। कूटनीतिक रूप से अमेरिका और रूस दोनों हावी हुए और पुरानी औपनिवेशिक बड़ी ताकतों को एक तरह से हार का सामना करना पड़ा। स्वेज नहर विवाद ने ब्रिटेन और फ्रांस के दबदबे को कमजोर किया और उनकी सैन्य, कूटनीतिक क्षमता पर सवाल उठे। इस संकट ने ब्रिटेन की वैश्विक साम्राज्यवादी छवि को एक बड़ा धक्का लगाया। फ्रांस भी दूसरे जगहों की बजाय यूरोप में अपना प्रभाव बनाने में जुट गया। स्वेज नहर विवाद के बाद राष्ट्रपति नासिर अरब वर्ल्ड एवं रेजिस्टेंस के एक बड़े नेता के रूप में उभरे। इस संकट ने देशों को संदेश दिया कि उन्हें अमेरिका या सोवियत संघ किसी एक खेमे में जाने की जरूरत नहीं है। वे अपनी स्वतंत्र नीति के साथ आगे बढ़ सकते हैं। यही नहीं, स्वेज संकट संयुक्त राष्ट्र के लिए एक कूटनीतिक जीत मानी गई। यूएन की सक्रियता की वजह से पहली बार वहां शांति सेना की तैनाती हुई और वैश्विक संकट दूर करने में यूएन को एक प्रभावी संस्था के रूप में देखा गया।
Strait of hormuz
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंस गए हैं ट्रंप?
कहने का मतलब है कि ब्रिटेन के सुपर पावर की छवि तोड़ने में स्वेज नहर संकट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अब उसी तरह का संकट अमेरिका के सामने है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में उसका रसूख दांव पर लगा है। वह मदद के लिए नाटो देशों से गुहार लगा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप नाटो देशों से अपने युद्धपोत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भेजने की अपील कर चुके हैं लेकिन दक्षिण कोरिया को छोड़कर सभी देशों ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। जो बाइडेन के समय यूरोप और नाटो पूरी तरह अमेरिका के साथ थे लेकिन अभी ये देश उसके साथ खड़े होने में हिचकिचा रहे हैं। उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान पर हमला कर ट्रंप फंस गए हैं। युद्ध शुरू करने से पहले उन्होंने जो सोचा था वैसा कुछ नहीं हुआ, वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के दलदल में फंस गए हैं। अमेरिका के सुपरपावर होने की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है।
