What is Asian NATO : दुनिया में ऐसे हालात बन रहे हैं या कहिए कि बन गए हैं कि चीजों को अब नए चश्मे से देखा जाने लगा है जो अब तक टिकाऊ और भरोसेमंद माना जाता था, उस पर शक और संदेह पैदा हो गया है। वैश्विक संस्थाएं कमजोर पड़ गई हैं। युद्धों ने अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है। अपना और पराया कौन है, देश इसे महसूस करने लगे हैं। खुद को सुरक्षित रखने की चिंता पश्चिम एशिया से लेकर हिंद-प्रशांत महासागर तक फैल गई है। नए-नए भू-राजनीतिक समीकरण बनाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं और नए ब्लॉक तैयार हो रहे हैं। एशिया में एक ऐसा ही मंच तैयार करने की तैयारी जोड़ पकड़ रही है और इसके पीछे बालिकातन युद्धाभ्यास (Balikatan 2026) है जो 20 अप्रैल से 8 मई तक फिलिपींस प्रायद्वीप में चला है। सवाल है कि इसमें नया क्या है? यूएस और फिलिपींस तो हर साल संयुक्त रूप से यह युद्धाभ्यास करते हैं और दोनों के बीच यह पहला दूसरा नहीं बल्कि 41वां युद्धाभ्यास था।
1990 के दशक से चलता आ रहा है बालिकातन युद्धाभ्यास
यह युद्धाभ्यास 1990 के दशक से चलता आ रहा है लेकिन इस साल यह इस मायने में नया है क्योंकि इसका दायरा बड़ा हो गया है। इसे अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास बताया जा रहा है। अमेरिका और फिलिपींस के अलावा इस बार बालिकतान युद्धाभ्यास में पांच अन्य देशों ऑस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा, फ्रांस और न्यूजीलैंड की एंट्री हुई है। इनके अलावा दुनिया भर से 17 देशों ने अपनी सेना ऑब्जर्वर के रूप में भेजी। इस युद्धाभ्यास में सात देशों के 17,000 सैन्यकर्मी शामिल हुए। सबसे ज्यादा 10,000 सैनिक यूएस के थे। फ्रांस की एक छोटी सैन्य टुकड़ी शामिल हुई जबकि कनाडा और न्यूजीलैंड नए देश के रूप में इसमें हिस्सा लिया। इस युद्धाभ्यास की सबसे बड़ी खास बात इसमें जापान का शामिल होना है। जापान ऐसा देश है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद युद्ध, संघर्ष जैसी चीजों को खुद को दूर रखता आया है। उसके पास यूएस, चीन, रूस और भारत जैसी सेना नहीं है। फिर भी वह इस युद्धाभ्यास में शामिल हुआ है। इस युद्धाभ्यास के लिए उसने अपने 1400 सैन्यकर्मी भेजे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है जब किसी युद्धाभ्यास के लिए जापान ने अपने सैनिक तैनात किए।
जापान के पास नहीं है पेशेवर सेना
जापान द्वारा सैनिक भेजा जाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। यह उसकी डॉक्ट्रिन से बिल्कुल अलग है। अलग इसलिए कि द्वितीय विश्व युद्ध में सरेंडर करने के बाद अमेरिका के हस्तक्षेप से जापान का जो नया संविधान बना उसमें नियमित और स्थायी सेना रखने पर रोक लगा दी गई। जापान ने भी स्थायी सेना न रखने और युद्ध को एक राष्ट्र के संप्रभु अधिकार के रूप में त्यागने का संकल्प लिया लेकिन 1954 में, आत्मरक्षा की आवश्यकता को देखते हुए जापान आत्मरक्षा बल की स्थापना हुई लेकिन यह बल केवल आत्मरक्षा, आपदा राहत और शांति स्थापना के लिए है। यह किसी देश पर हमला नहीं कर सकता। जापान की सुरक्षा का जिम्मेदारी अमेरिका के कंधों पर है।
japan
जापान को अब यूएस पर पहले जैसा भरोसा नहीं
आज भी जापान में अमेरिका के हजारों सैनिक तैनात हैं। लेकिन अब हिंद और उत्तर प्रशांत सागर में चीन की गतिविधियों ने जापान के कान खड़े कर दिए हैं। दूसरा, डोनाल्ड ट्रंप की हरकतों ने यूरोपीय देशों की तरह जापान के भरोसे को हिला दिया है। जापान, चीन से खतरा महसूस कर रहा है। अपनी सुरक्षा को लेकर उसे यूएस पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा। जापान को अब अहसास हो गया है कि अपनी सुरक्षा और संप्रभुता किसी तीसरे देश को आउटसोर्ट नहीं की जा सकती। अपनी सुरक्षा उसे खुद करनी होगी। इसके लिए बाकी विकसित देशों की तरह उसे भी अपनी पेशेवर सेना तैयार करनी होगी। कुछ वर्षों से जापान ने इस पर धीरे-धीरे काम करना शुरू कर दिया है।
रक्षा बजट एक से बढ़ाकर दो प्रतिशत करेगा जापान
इसी क्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए फुमियो किशिदा की सरकार ने साल 2022 में नेशनल सिक्युरिटी स्ट्रेटजी (NSS) और नेशनल डिफेंस स्ट्रेटजी पर दस्तावेज लेकर आई। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि 'द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के सुरक्षा हालात सबसे ज्यादा जटिल एवं गंभीर हैं। जापान बलपूर्वक किसी भी एकतरफा बदलाव को वह स्वीकार नहीं करेगा।' दरअसल, रूस की आक्रामक कार्रवाई और इलाके में चीन के 'दबदबे एवं बढ़ते प्रभुत्व' को लेकर जापान काफी चिंतित है। इसे देखते हुए किशिदा ने देश का रक्षा बजट 2027 तक एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो प्रतिशत करने पर जोर दिया। वहीं, मौजूदा सनाए सनाए ताकाइची सरकार ने रक्षा बजट को 2025 तक दो प्रतिशत करने की बात कही है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जापान की सुरक्षा नीति में तेज बदलाव होने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि ताकाइची एक राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी की स्थापना, घातक हथियारों के निर्यात पर लगी पाबंदियों को हटाने और घरेलू हथियार निर्माण का विस्तार करने जैसे कदम उठा सकती हैं। इससे जापानी कंपनियां वैश्विक हथियार बाजार में बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर सकती हैं।
japan
'एशियन NATO' बनाने पर जोर
चीन से अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे को देखते हुए शिगेरू इशिबा की सरकार ने NATO की तर्ज पर 'एशियन NATO' बनाने के विचार को आगे बढ़ाया। उनकी सरकार ने इलाके में नाटो की तरह एक बहुपक्षीय सामूहिक रक्षा संगठन तैयार करने पर जोर दिया। इसमें संभवत: भारत सहित एशिया के अन्य देशों को भी शामिल करने का प्रस्ताव था। वाशिंगटन डीसी स्थित हडसन इंस्टीट्यूट की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट में इशिबा ने लिखा, 'आज यूक्रेन शिकार हुआ है, कल एशिया की बारी है। एशिया में नाटो जैसे संगठन के अभाव का मतलब है कि यहां युद्ध शुरू हो सकता है क्योंकि यहां एक-दूसरे की रक्षा करने वाला कोई संगठन और प्रतिबद्धता नहीं है। इन हालातों में चीन एवं पश्चिमी संगठनों को काबू में रखने के लिए NATO के एशियाई संस्करण की जरूरत है।' वहीं, चीन के प्रति ट्रंप का रुख बार-बार बदलता रहा है, वह कभी उसे नरम होते हैं तो कभी आक्रामक। ट्रंप के इस रुख की वजह से जापान पूरी तरह से यूएस पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। चीन के प्रति यूएस की अस्थिर नीति को देखते हुए जापान के अलावा हिंद-प्रशांत यहां तक कि यूरोप के कई देश अमेरिका के साथ अपनी गारंटी को दोबारा समीक्षा कर रहे हैं।
