आज का टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल का आई ओपनर (Eye Opener) का यह एपिसोड आपके लिए बहुत ही खास है। आज के शो में एक ऐसे एक्सपर्ट से आपकी मुलाकात होने वाली है जो साइबर एक्सपर्ट तो हैं ही, साथ ही साइबर क्राइम से रिलेटेड जितना भी क्राइम होता है उससे वो आपको बचाते भी हैं। आज हमारे साथ हैं अमित दुबे जी, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। टाइम्स नाउ नवभारत के स्पेशल पॉडकास्ट Eye Opener में रमा सोलंकी ने साइबर एक्सपर्ट अमित दुबे से स्मार्टफोन की प्राइवेसी और सिक्योरिटी पर खुलकर बातें की हैं और यह समझने की कोशिश की है आखिर स्कैमर्स को हमारे बारे में पूरी जानकारी कैसे होती है?
आज के दौर में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही यूजर प्राइवेसी को लेकर खतरे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार ऐसी खबरें सामने आती हैं एक पेजर से धमाके कर दिए गए। कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति “डिजिटल अरेस्ट” जैसे साइबर फ्रॉड का शिकार बन गया। सवाल उठता है कि जब दो लोग आपस में भरोसे के साथ बात कर रहे होते हैं, तो तीसरा कौन होता है जो उनकी बातचीत सुन रहा है और जब मैसेज डिलीट हो जाता है, तो फिर वह लीक कैसे हो जाता है? यही सवाल आज आम यूजर को परेशान कर रहे हैं। आइए इन सवालों के जवाब साइबर एक्सपर्ट अमित दुबे से जानते हैं...
स्मार्टफोन होने का मतलब सुरक्षित होना नहीं
अक्सर लोगों को लगता है कि महंगे स्मार्टफोन, जैसे iPhone, इस्तेमाल करने से उनकी सुरक्षा पक्की हो जाती है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। अधिकतर लोग जो डिजिटल अरेस्ट के शिकार हुए हैं, उनके पास आईफोन ही था। कई साइबर क्राइम मामलों में देखा गया है कि हाई-प्रोफाइल और पढ़े-लिखे लोग भी आसानी से ठगी का शिकार हो जाते हैं। डिजिटल अरेस्ट में औसतन 60 लाख रुपये तक का नुकसान और कई मामलों में करोड़ों रुपये तक की ठगी सामने आई है। इसमें बैंक अधिकारी, डॉक्टर, वकील और बड़े कारोबारी तक शामिल हैं।
डिजिटल अरेस्ट का शिकार एक व्यक्ति 6 करोड़ रुपये दे देता है जो एक बैंक का वाइस चेयरमैन है। इससे साफ है कि सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि जागरूकता ही असली सुरक्षा है। तो आप देखिए, ऐसा नहीं हो सकता कि इनके आईक्यू कम थे या लोग जानते नहीं थे या न्यूज नहीं पढ़ते या टीवी नहीं देखते या रेडियो नहीं सुनते। फिर कैसे हो गया इनके साथ? मेरा सवाल यही है कि इतना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी फंस जाए तो बाकी सब क्योंकि आंखें तो खुली है ना हम इसका मतलब हम देख तो रहे हैं ऑब्जर्व तो कर रहे हैं लेकिन सीख नहीं रहे हैं।
आधी-अधूरी जानकारी बन रही है खतरा
अमित दुबे के अनुसार, आजकल लोग सिर्फ हेडलाइन पढ़कर ही अपनी समझ बना लेते हैं। जैसे “रैनसमवेयर” और “डिजिटल अरेस्ट” जैसे शब्दों को लोग सही से समझे बिना ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं। यह आधी-अधूरी जानकारी ही सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है। लोग यह मान लेते हैं कि उन्हें सब पता है, जबकि असल में वे साइबर अपराधियों के जाल में फंसने के लिए तैयार बैठे होते हैं।
हमें लगता है कि हमने अपने अकाउंट का पासवर्ड किसी को नहीं बताया तो आपको मालूम होना चाहिए कि सीधा पासवर्ड क्रिमिनल के पास ऑलरेडी होता है। आज तक कभी कोई ऐसा क्राइम नहीं हुआ जिसमें पासवर्ड मांग लिया हो कि पासवर्ड बताइए अपना। साइबर स्कैम के शिकार अधिकतर वही लोग होते हैं जिनमें ईगो कूट-कूटकर भरा पड़ा है। उन्हें लगता है कि उन्हें सब पता है और उनके साथ स्कैम नहीं हो सकता।
AI और सोशल इंजीनियरिंग का खतरनाक खेल
आज के समय में साइबर अपराध सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सोशल इंजीनियरिंग का भी बड़ा रोल है। अपराधी एक ऐसा माहौल तैयार करते हैं, जिससे यूजर को बिल्कुल भी शक नहीं होता। उदाहरण के तौर पर, एक व्यक्ति ने सिर्फ जानकारी के लिए ऑनलाइन सर्च किया, जिसके बाद उसे निवेश से जुड़े विज्ञापन और ग्रुप्स दिखने लगे।
Eye Opener: Phone Privacy- Digital Safe
धीरे-धीरे उसे एक ऐसे नेटवर्क में जोड़ा गया, जहां नकली स्क्रीनशॉट्स और फर्जी प्रॉफिट दिखाकर भरोसा बनाया गया। शुरुआत में उन्होंने निवेश किया और पैसे कमाए भी, लेकिन जैसे ही उन्होंने 3 करोड़ निवेश किया, उसके बाद वे कभी पैसे नहीं निकाल पाए। सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर चीज असली नहीं होती है। किसी भी चीज पर भरोसा करने से पहले उसे बार-बार देखें और कई बार देखें।
फर्जी कॉल और मैसेज से बनाया जाता है भरोसा
इस तरह के फ्रॉड में एक पूरी टीम काम करती है। पहले एक व्यक्ति कॉल करके शक जताता है, फिर दूसरा व्यक्ति उसे “कन्फर्म” करता है कि सब सही है। इस प्रक्रिया में यूजर का भरोसा जीत लिया जाता है। बाद में उसे फर्जी वेबसाइट, एड्रेस और डॉक्यूमेंट्स दिखाकर यह यकीन दिलाया जाता है कि सब कुछ असली है। इसी भरोसे के आधार पर लोग पैसे निवेश कर देते हैं और ठगी का शिकार हो जाते हैं।
ओटीपी शेयर नहीं करें के विज्ञापन दिखते हैं, लेकिन पासवर्ड शेयर नहीं करें के नहीं, क्यों?
आमतौर पर आपने देखा होगा कि बड़े-बड़े पोस्टर पर लिखा होता है कि ओटीपी शेयर ना करें, लेकिन कहीं यह नहीं लिखा होता है कि पासवर्ड शेयर ना करें, क्यों? क्योंकि पासवर्ड स्कैमर्स के पास पहले से होता है। हमें यह समझना होगा कि हमारी क्या-क्या चीजें सार्वजनिक हैं, जिस दिन यह आपको पता चल जाएगा, उस दिन आप सेफ हो जाएंगे।
Digital Arrest
स्मार्टफोन में हमारी पर्सनल जानकारी, बैंकिंग डिटेल्स, चैट्स और लोकेशन जैसी संवेदनशील जानकारी होती है। यदि यूजर सावधान नहीं है, तो यह डेटा आसानी से लीक हो सकता है। कई बार ऐप्स, फर्जी लिंक या अनजान कॉल्स के जरिए यूजर की जानकारी हासिल की जाती है। यहां तक कि डिलीट किए गए मैसेज भी विभिन्न तकनीकों से रिकवर किए जा सकते हैं, जिससे प्राइवेसी पर गंभीर खतरा पैदा होता है।
“मुझे कुछ नहीं होगा” वाली सोच सबसे बड़ी गलती
एक बड़ी समस्या यह है कि लोग यह मान लेते हैं कि उनके साथ ऐसा नहीं हो सकता। यही ओवरकॉन्फिडेंस उन्हें कमजोर बना देता है। अमित दुबे का मानना है ज्यादातर पीड़ित वही लोग होते हैं, जो खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित समझते हैं। वे चेतावनियों को नजरअंदाज कर देते हैं और सतर्क नहीं रहते।
सीखने की जरूरत, सिर्फ सुनने की नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ “क्या करें और क्या न करें” (Do’s and Don’ts) जानना काफी नहीं है। असल जरूरत है कि लोग इन घटनाओं से सीखें और गहराई से समझें कि फ्रॉड कैसे होता है। क्योंकि इंसान नियम भूल सकता है, लेकिन कहानियां और अनुभव याद रहते हैं। इसलिए जागरूकता बढ़ाना और हर छोटी जानकारी को गंभीरता से लेना जरूरी है।
सतर्कता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया ने हमारी जिंदगी आसान बनाई है, लेकिन इसके साथ ही जोखिम भी बढ़ा है। यूजर प्राइवेसी की सुरक्षा अब केवल टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं है, बल्कि आपकी समझ और सतर्कता पर भी निर्भर करती है। अगर आप हर जानकारी को ध्यान से समझेंगे, अनजान लिंक और कॉल से बचेंगे और ओवरकॉन्फिडेंस से दूर रहेंगे, तो आप खुद को बड़े साइबर फ्रॉड से बचा सकते हैं।
