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EOS-05: अंतरिक्ष में भारत की ‘आंख’, 36 हजार किमी ऊपर से लगातार रखेगा नजर, जानें NASA को कैसे देगा टक्कर

EOS-05 की सबसे बड़ी तकनीकी खासियत इसकी मल्टी-बैंड इमेजिंग क्षमता है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह के मुताबिक, यह Visible, Infrared, Multispectral और Hyperspectral बैंड्स में एडवांस इमेजिंग करने में सक्षम होगा।

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कैसी तस्वीरें खींचेगा EOS-05?
Authored by: प्रदीप पाण्डेय
Updated Sep 4, 2026, 14:52 IST
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने 4 सितंबर 2026 को GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाकर भारत की अर्थ ऑब्जर्वेशन क्षमता को नई ऊंचाई दी है। यह भारत का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट है, जिसे जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की तस्वीरें और डेटा जुटाने के लिए तैयार किया गया है। ISRO के मुताबिक, EOS-05 को पहले Sub-Geosynchronous Transfer Orbit में स्थापित किया गया है और इसके बाद इसे निर्धारित जियो प्लेटफॉर्म तक पहुंचाया जाएगा।

EOS-05 की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि यह पृथ्वी की तस्वीरें खींचेगा। असली ताकत यह है कि करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई से यह भारत और आसपास के क्षेत्रों पर लगातार नजर रख सकेगा। सामान्य लो-अर्थ ऑर्बिट वाले अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट किसी जगह के ऊपर से गुजरते हुए तस्वीर लेते हैं और फिर अगली बार उसी क्षेत्र तक पहुंचने में समय लगता है। इसके विपरीत जियोस्टेशनरी/जियोसिंक्रोनस सिस्टम एक ही बड़े क्षेत्र को लगातार देखते रह सकते हैं।

आखिर EOS-05 करेगा क्या?

सरल भाषा में समझें तो EOS-05 अंतरिक्ष से भारत की ‘Eye in the Sky’ की तरह काम करेगा। यह पृथ्वी की सतह, वातावरण और बदलते हालात की लगातार निगरानी के लिए इमेजिंग डेटा उपलब्ध कराएगा। इसका इस्तेमाल मौसम, प्राकृतिक आपदाओं, कृषि, पर्यावरण, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

मसलन, अगर किसी इलाके में बादलों का बड़ा सिस्टम बन रहा है, बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है, जंगल में आग लगी है या किसी बड़े क्षेत्र में पर्यावरणीय बदलाव हो रहे हैं, तो लगातार मिलने वाली सैटेलाइट इमेजरी इन घटनाओं को समझने और उनकी निगरानी करने में मदद कर सकती है।

कैसी तस्वीरें खींचेगा EOS-05?

EOS-05 की सबसे बड़ी तकनीकी खासियत इसकी मल्टी-बैंड इमेजिंग क्षमता है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह के मुताबिक, यह Visible, Infrared, Multispectral और Hyperspectral बैंड्स में एडवांस इमेजिंग करने में सक्षम होगा।

इसका मतलब यह है कि EOS-05 सिर्फ ऐसी तस्वीरें नहीं लेगा जैसी हमें सामान्य कैमरे से दिखाई देती हैं। अलग-अलग स्पेक्ट्रल बैंड्स में डेटा जुटाकर जमीन, वनस्पति, पानी, वातावरण और दूसरी वस्तुओं की ऐसी जानकारी निकाली जा सकती है जो सामान्य RGB तस्वीर में दिखाई नहीं देती। यही तकनीक कृषि में फसलों की स्थिति समझने, पर्यावरण में बदलाव पहचानने और आपदा के बाद प्रभावित क्षेत्रों का आकलन करने में उपयोगी हो सकती है।

NASA को कैसे देगा टक्कर?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। EOS-05 को सीधे NASA के हर सैटेलाइट का प्रतिद्वंद्वी कहना सही नहीं होगा। NASA के पास अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बेहद उन्नत और बड़े सैटेलाइट सिस्टम हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका का NASA-समर्थित और NOAA द्वारा संचालित GOES सिस्टम जियोस्टेशनरी ऑर्बिट से पश्चिमी गोलार्ध की लगातार इमेजिंग करता है। GOES सिस्टम मौसम, तूफान, बिजली, जंगल की आग, धूल, बाढ़ और दूसरे पर्यावरणीय खतरों की निगरानी में इस्तेमाल होता है।

भारत का उपग्रह EOS-05

भारत का उपग्रह EOS-05

EOS-05 का महत्व यह है कि अब भारत के पास अपने क्षेत्र पर लगातार नजर रखने के लिए इसी तरह की जियोसिंक्रोनस इमेजिंग क्षमता का स्वदेशी विकल्प होगा। यानी मौसम या आपदा से जुड़ी अहम जानकारी के लिए भारत की अपनी स्पेस-बेस्ड निगरानी क्षमता और मजबूत होगी।

NASA के GOES-R सिस्टम में अत्याधुनिक इमेजिंग के साथ वातावरण और अंतरिक्ष मौसम की निगरानी की क्षमता है। इसलिए EOS-05 को NASA से ‘बेहतर’ बताने के बजाय यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत अब उसी तरह की जियोसिंक्रोनस अर्थ मॉनिटरिंग की वैश्विक क्षमता वाले देशों के समूह में अपनी जगह मजबूत कर रहा है।

सिर्फ अमेरिका ही नहीं, इन देशों के पास भी है ऐसी तकनीक

जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की लगातार निगरानी करने वाली तकनीक दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के पास पहले से मौजूद है। अमेरिका के पास NASA-नोआए का GOES सिस्टम है। जापान Himawari-8 और Himawari-9 जैसे सैटेलाइट्स से जियोस्टेशनरी अर्थ ऑब्जर्वेशन करता है।

चीन के पास Fengyun-4 सीरीज के जियोस्टेशनरी मौसम सैटेलाइट हैं। दक्षिण कोरिया GEO-KOMPSAT-2 और यूरोप Meteosat/MTG सिस्टम के जरिए इसी तरह की क्षमताओं का इस्तेमाल करते हैं। NASA खुद इन अलग-अलग जियोस्टेशनरी प्लेटफॉर्म्स में अमेरिका के GOES, जापान के Himawari, दक्षिण कोरिया के GEO-KOMPSAT, यूरोप के MTG और चीन के Fengyun-4 को सूचीबद्ध करता है यानी EOS-05 भारत को उस चुनिंदा वैश्विक क्लब में मजबूती से खड़ा करता है, जहां जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से बड़े क्षेत्र की लगातार अर्थ मॉनिटरिंग की क्षमता मौजूद है।

भारत के लिए क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

भारत जैसे विशाल और भौगोलिक रूप से विविध देश के लिए लगातार सैटेलाइट निगरानी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां एक तरफ हिमालय और संवेदनशील सीमाएं हैं, तो दूसरी तरफ लंबी समुद्री सीमा, बड़े कृषि क्षेत्र और बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन तथा जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी रहता है।

NASA को कैसे देगा टक्कर?

NASA को कैसे देगा टक्कर?

EOS-05 से मिलने वाला लगातार इमेजिंग डेटा आपदा प्रबंधन और शुरुआती चेतावनी को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। बाढ़ या चक्रवात जैसी घटनाओं के दौरान तेजी से बदलती स्थिति पर नजर रखना राहत और बचाव एजेंसियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है। इसी तरह कृषि और पर्यावरण की निगरानी में भी इसका डेटा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सुरक्षा के लिहाज से भी अहम

EOS-05 का रणनीतिक महत्व भी कम नहीं है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से भारतीय क्षेत्र और आसपास के इलाकों की लगातार निगरानी की क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि सैटेलाइट की वास्तविक सैन्य क्षमताओं और रिजॉल्यूशन से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक नहीं है, लेकिन लगातार उपलब्ध अर्थ-इमेजरी रणनीतिक क्षेत्रों की निगरानी और परिस्थितियों के आकलन में मदद कर सकती है। यही वजह है कि इसे भारत की स्पेस-बेस्ड सर्विलांस क्षमता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी माना जा रहा है।

2021 की नाकामी के बाद मिली बड़ी सफलता

EOS-05 मिशन इसलिए भी खास है क्योंकि यह 2021 में असफल हुए Gisat-1/EOS-03 मिशन के बाद आया है। अगस्त 2021 में GSLV Mk-II के तीसरे चरण में आई तकनीकी समस्या के कारण पिछला मिशन सफल नहीं हो पाया था। अब EOS-05 की सफलता ने उस पुराने झटके को पीछे छोड़ते हुए ISRO के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है।

इसके अलावा हाल के कुछ मिशन में आई चुनौतियों के बाद यह सफलता ISRO के लिए मनोबल बढ़ाने वाली भी है। ISRO के चेयरमैन वी. नारायणन ने बताया कि GSLV की क्षमता को समय के साथ लगातार बेहतर किया गया और इस मिशन में इस रॉकेट से अब तक का सबसे भारी 2,367 किलोग्राम का सैटेलाइट लॉन्च किया गया।

भारत की ‘आंख’ अब लगातार देख सकेगी बदलती धरती

EOS-05 की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह भारत की अर्थ ऑब्जर्वेशन क्षमता को केवल ‘तस्वीर लेने’ से आगे ले जाता है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट, मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग तथा लगातार निगरानी की क्षमता इसे मौसम से लेकर आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा तक कई क्षेत्रों के लिए उपयोगी बनाती है।

इसलिए EOS-05 को NASA को सीधी चुनौती देने वाले एक सैटेलाइट के बजाय भारत की उस तकनीकी छलांग के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा, जिसके जरिए देश अमेरिका, जापान, चीन, यूरोप और दक्षिण कोरिया जैसी प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों के साथ जियोसिंक्रोनस अर्थ ऑब्जर्वेशन के क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है।

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