नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके UPI यूजर्स को शिकार बना रहे साइबर ठग, क्लाउडसेक की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

‘सिम-बाइंडिंग’ को आम तौर पर इस बात का सबूत माना जाता है कि बैंक खाता किसी खास मोबाइल डिवाइस से सुरक्षित रूप से जुड़ा हुआ है। यूपीआई ऐप किसी भी लेन-देन से पहले उस फोन नंबर के सिम की जांच करते हैं, जिस नंबर से बैंक खाता मोबाइल में रजिस्टर किया गया होता है।

ऑनलाइन ठग अब नई तकनीकों का इस्तेमाल करके यूपीआई ऐप्स की सुरक्षा व्यवस्था को धोखा दे रहे हैं और लोगों के पैसों का गलत तरीके से लेन-देन कर रहे हैं। क्लाउडसेक नाम की साइबर खुफिया कंपनी की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर कम से कम 20 ऐसे सक्रिय ग्रुप पाए हैं। हर ग्रुप में 100 से ज्यादा सदस्य हैं। इन ग्रुपों में “डिजिटल लुटेरा” नाम के टूलकिट के बारे में चर्चा की जा रही है, उसे आपस में शेयर किया जा रहा है और उसका इस्तेमाल भी किया जा रहा है।

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साइबर क्रिमिनल्स अब नई टेक्नोलॉजी की मदद से यूपीआई यूजर्स को ठगी का शिकार बना रहे हैं। (फोटो क्रेडिट-iStock)

क्लाउडसेक के अनुसंधानकर्ता (खतरा) शोभित मिश्रा ने कहा, ’’ यह केवल यूपीआई से जुड़ा एक और हानिकारक सॉफ्टवेयर नहीं है। डिजिटल लुटेरा उपकरण प्रणाली पर भरोसे की संरचना पर हमला करता है। जब संचालन तंत्र ही प्रभावित हो जाता है तो ’सिम-बाइंडिंग’ और हस्ताक्षर जांच जैसी पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्थाएं भरोसेमंद नहीं रहतीं। यदि इसे नहीं रोका गया तो यह डिजिटल भुगतान प्रणाली में बड़े पैमाने पर खातों पर पकड़ बनाने की घटनाओं को बढ़ावा दे सकता है।’’

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