चीन ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ा प्रयोग कर रहा है। देश की एक स्टार्टअप कंपनी ऐसा ब्रेन इम्प्लांट विकसित कर रही है, जिसे खोपड़ी खोले बिना दिमाग तक पहुंचाया जा सकेगा। इस तकनीक में गर्दन की नस के जरिए डिवाइस को शरीर के अंदर पहुंचाकर दिमाग के एक खास हिस्से तक ले जाने की योजना है। कंपनी का दावा है कि इस प्रक्रिया को भविष्य में करीब 10 मिनट में पूरा किया जा सकता है। हालांकि, फिलहाल यह तकनीक प्रयोग के स्तर पर है और इंसानों पर इसका परीक्षण अभी शुरू नहीं हुआ है।
क्या यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है?Concept Image By AI
कैसे दिमाग तक पहुंचेगी चिप?
शंघाई की StairMed Technology चीन की Academy of Sciences के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर इस तकनीक पर काम कर रही है। पारंपरिक ब्रेन इम्प्लांट में डॉक्टरों को खोपड़ी खोलकर दिमाग के अंदर या उसकी सतह पर इलेक्ट्रोड लगाना पड़ता है। इसके मुकाबले नई तकनीक में गर्दन की रक्त वाहिका के जरिए डिवाइस को शरीर के अंदर पहुंचाया जाएगा।
डिवाइस को रक्त वाहिकाओं के नेटवर्क से होते हुए दिमाग के लक्षित हिस्से तक ले जाया जाएगा। वहां पहुंचने के बाद इसे रक्त वाहिका की बाहरी दीवार पर सुरक्षित किया जाएगा। इसका उद्देश्य बड़ी ब्रेन सर्जरी से होने वाले जोखिम और शारीरिक नुकसान को कम करना है।
अभी भेड़ों पर हुआ है परीक्षण
StairMed ने इस प्रोजेक्ट को पहली बार दिसंबर में सामने रखा था। अभी तक इस प्रक्रिया का परीक्षण भेड़ों पर किया गया है, जबकि इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। इसलिए 10 मिनट में इम्प्लांट लगाने की बात फिलहाल इंसानों के लिए उपलब्ध मेडिकल प्रक्रिया नहीं है, बल्कि शोध में हासिल किया गया लक्ष्य है। बीजिंग के Xuanwu Hospital के डॉक्टर भी रक्त वाहिकाओं के जरिए BCI लगाने की एक अलग तकनीक पर काम कर रहे हैं। उनकी टीम ने इंसानों पर इसका शुरुआती क्लिनिकल अध्ययन शुरू कर दिया है।
पारंपरिक BCI से कितनी अलग है तकनीक?
पारंपरिक BCI में खोपड़ी खोलकर दिमाग के कॉर्टेक्स में डिवाइस या इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर एलन मस्क की कंपनी Neuralink की तकनीक में सर्जरी के जरिए डिवाइस को दिमाग में इम्प्लांट किया जाता है। चीन की नई तकनीक शरीर की मौजूदा रक्त वाहिकाओं को दिमाग तक पहुंचने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश करती है। इससे भविष्य में सर्जरी कम जटिल और कम इनवेसिव हो सकती है, हालांकि लंबे समय तक इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित होना अभी बाकी है।
BCI से क्या-क्या किया जा सकता है?
Brain-Computer Interface का उद्देश्य दिमाग से निकलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल को कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के कमांड में बदलना है। खास तौर पर गंभीर रूप से पैरालाइज्ड लोगों के लिए यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है। भविष्य में ऐसे मरीज अपने विचारों के जरिए कंप्यूटर को कंट्रोल करने, संवाद करने या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चलाने में सक्षम हो सकते हैं। इससे गंभीर शारीरिक अक्षमता वाले लोगों को रोजमर्रा के कामों में ज्यादा स्वतंत्रता मिल सकती है।
चीन में BCI इंडस्ट्री को मिल रहा बढ़ावा
चीन अब BCI और न्यूरोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से निवेश बढ़ा रहा है। StairMed के मुताबिक, कंपनी ने पिछले एक साल में 1.1 अरब युआन से ज्यादा की फंडिंग जुटाई है। इसमें Alibaba और Tencent जैसी बड़ी कंपनियों से जुड़े निवेशक भी शामिल हैं।
चीन का लक्ष्य 2030 तक BCI के क्षेत्र में दो या तीन ऐसी कंपनियां तैयार करना है, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। देश की Nankai University भी रक्त वाहिकाओं के जरिए BCI इम्प्लांट करने का इंसानों पर परीक्षण कर चुकी है।
क्या यह तकनीक पूरी तरह सुरक्षित है?
फिलहाल इस तकनीक के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसकी लंबी अवधि की सुरक्षा और विश्वसनीयता है। जानवरों पर हुए परीक्षण से यह पूरी तरह साबित नहीं होता कि इंसानों में डिवाइस कितने समय तक सुरक्षित रहेगा और लगातार उपयोगी ब्रेन सिग्नल हासिल कर पाएगा।
डॉक्टरों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि डिवाइस को दिमाग के सही हिस्से में सटीक तरीके से लगाया जा सके और लंबे समय तक रक्त वाहिकाओं को गंभीर नुकसान न पहुंचे। इसलिए बड़े पैमाने पर मानव परीक्षण और लंबे समय की निगरानी के बाद ही इस तकनीक की वास्तविक क्षमता का पता चलेगा।
अमेरिका में भी हो रहा है ऐसा प्रयोग
रक्त वाहिका के जरिए BCI को दिमाग तक पहुंचाने का विचार सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है। अमेरिका की Synchron कंपनी भी इसी तरह की तकनीक पर काम कर रही है और ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका में मरीजों पर अपने BCI इम्प्लांट का परीक्षण कर चुकी है।
अगर ये तकनीकें लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती हैं, तो भविष्य में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को लगाने के लिए पारंपरिक बड़ी सर्जरी की जरूरत कम हो सकती है। फिलहाल चीन का 10 मिनट वाला इम्प्लांट प्रोजेक्ट इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है।
