Times Now Summit 2021: नीरज चोपड़ा नहीं चाहते अभी बने बॉयोपिक, तो श्रीजेश बोले- अब बन जाए फिल्म

टोक्यो ओलंपिक मेें भारतीय खेलों सफलता का नया इतिहास रचने वाले नीरज चोपड़ा और पीआर श्रीजेश ने टाइम्स नाउ सम्मिट में भारत में खेलों को लेकर आ रहे बदलाव के बारे में चर्चा की। जानिए दोनों ने क्या कहा?

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टाइम्स नाउ सम्मिट-2021 में नीरज चोपड़ा और पीआर श्रीजेश  
मुख्य बातें
  • नीरज चोपड़ा बोले-गोल्ड मेडल के बाद अब करना है ये काम
  • हाकी खिलाड़ी श्रीजेश बोले टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद केरल में आई नई क्रांति
  • स्पोर्टिंग कल्चर के लिए लोगों को खेलों को अपनी दिनचर्चा में शामिल करना होगा। 

नई दिल्ली: टोक्यो ओलंपिक में पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाले नीरज चोपड़ा और टोक्यो में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य पीआर श्रीजेश ने टाइम्स नाउ सम्मिट 2021 में शिरकत की। इन दोनों खिलाड़ियों ने भारत में खेलों के भविष्य के बारे में टाइम्स नाउ के सीनियर एडिटर अंकित त्यागी से चर्चा करते हुए कहा कि खेलों को लेकर लोगों की सोच में बदलाव हो रहा है। देश में स्पोर्टिंग कल्चर बनाने के लिए लोगों को खेलों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा। 

शुरुआत से ही मिल रही हैं सुर्खियां
टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने के बाद लगातार सुर्खियों में रहने वाले नीरज चोपड़ा ने लाइमलाइट को हैंडल करने के सवाल पर कहा कि थोड़ी-थोड़ी लाइमलाइट तो शुरुआत से ही मिल रही हैष जब मैंने 2016 में मेडल जीता था तभी से ऐसा हो रहा है। इसलिए इनसे वाकिफ था लेकिन मैंने इनसे दूर होकर दोबारा से अपनी ट्रेनिंग शुरू कर दी है। ट्रेनिंग धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। अब मेरी कोशिश है कि दोबारा फिट होकर मैदान पर लौटूं और वो काम करूं जो एक एथलीट करता है। सुर्खियों में आना तो जीवन का एक हिस्सा है लेकिन असली चीज तो मैदान में ही होती है। 

टोक्यो की सफलता के बाद मैदान में वापस लौट रहे हैं खिलाड़ी 
टोक्यो में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने लाइमलाइट के सवाल पर कहा, मुझे तो ओलंपिक पदक जीतने में लंबा समय लग गया। जब आप उम्र के 33वें पड़ाव तक पहुंचते हैं तब तक बहुत सारे उतार-चढ़ाव देख चुके होते हैं। इस उम्र तक आप परिपक्व हो जाते हैं कि लाइमलाइट को कैसे हैंडल करना है। लेकिन मेरी सफलता के बाद केरल में भी हॉकी को लेकर नई क्रांति आ गई है। हमारे राज्य में लोग फुटबॉल खेलते हैं या एथलेटिक्स की ओर रुख करते हैं लेकिन अब वहां भी बच्चे हॉकी खेलते दिखाई देने लगे हैं। पुराने हॉकी खिलाड़ी अपनी हॉकी स्टिक वापस निकालकर अभ्यास के लिए मैदान में जाने लगे हैं। टोक्यो ओलंपिक के बाद हम ये बदलाव लेकर आए हैं। 

बढ़ी है जैवलिन (भाला फेक) की लोकप्रियता 
भालाभेंक की बतौर खेल भारत में बढ़ी लोकप्रियता के बारे में नीरज ने कहा, हरियाणा में काफी बदलाव आया है। यहां खेल के रूप में पहली प्राथमिकता कुश्ती, कबड्डी, बॉक्सिंग जैसे खेल होती है।  लेकिन अब शूटिंग और एथलेटिक्स की दिशा में भी उनका रुझान बढ़ा है। जैवलिन को लेकर तो लोगों के रूख में बड़ा बदलाव आया है। जब मैंने शुरुआत की थी तब मुझे भी कुछ पता नहीं था लेकिन अब लगता है कि मैंने देश के लिए कुछ तो किया है। 

श्रीजेश ने अपने करियर में आए उतार-चढ़ाव के बारे में कहा कि मेरे ऊपर तो एक फिल्म बन सकती है। साल 2008 में हम ओलंपिक के लिए क्वालीफाइ नहीं कर सके थे। इसके बाद साल 2012 में लंदन में एक भी मैच नहीं जीत सके। लेकिन इसके बाद 2014 में जब इंचियॉन एशियाई खेलों में पाकिस्तान को मात देकर पदक जीता उसके बाद बदलाव शुरू हुए। तब लोगों को लगा की हॉकी वापसी कर रही है।


लोगों को खिलाड़ियों पर हुआ है मेडल जीतने का भरोसा

 
जब हम ओलंपिक में जाते हैं तो पुराने इतिहास की वजह से हमसे बहुत उम्मीदें होती हैं। वो दबाव बहुत ज्यादा होता है। इस बार जब हमने मेडल जीता है तब लगा कि यह एक दिन में मिली सफलता नहीं है। लेकिन टोक्यो ओलंपिक के बाद लोगों की सोच में बदलाव आया है लोगों को लगने लगा है कि हमारे खिलाड़ी भी मेडल जीत सकते हैं। हम उसके लायक हैं। 

बायोपिक के मिले हैं नीरज और श्रीजेश को ऑफर 
पीआर श्रीजेश और नीरज चोपड़ा ने बताया कि उनके जीवन पर फिल्म बनाने के ऑफर मिले हैं। इस बारे में नीरज ने कहा, मैंने लोगों से कहा कि अभी तो शुरुआत हुई है पहला ओलंपिक था। आगे और मेडल जीतूंगा तो फिल्म भी अच्छी बनेगी। मैं नहीं चाहता हूं कि फिल्म फ्लॉप हो। मैं चाहता हूं कि आगे और मेडल जीतूं और फिल्म भी अच्छी बने। 

अगले ओलंपिक में क्या लक्ष्य है इसके जवाब में नीरज ने कहा, हमारे लिए 10 मीटर का एक बैरियर होता है। मैं 80 मीटर फेंक चुका हूं और 90 मीटर के पार जाना चाहता हूं। यह लक्ष्य मेरे अंदर बसा है। मैं  अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ करने की कोशिश करुंगा। गोल्ड मेडल जीत चुका हूं लेकिन एक बार 90 मीटर के पार भाला फेंकना चाहता हूं। 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग और अभ्यास का मिला फायदा
क्या बदलाव आया है क्यों मेडल जीत रहे हैं? इसके जवाब में नीरज ने कहा कि मुझे ट्रेनिंग और अभ्यास के लिए अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट मिल रहे हैं। वहां प्रतिस्पर्धा करके हमें आत्मविश्वास मिलता है। आप दिमागी रूप से प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो जाते हो। विदेशी खिलाड़ियों के बीच खेलकर अपना स्तर पता चलता है। ट्रेनिंग और तकनीक में भी बदलाव करने का फायदा हुआ और मैं मेडल जीत सका।

 

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