दंडकर्म पारायणम (फोटो सोर्स - X)
Dand Karm Parayanam in Hindi (दंड कर्म पारायणम् क्या होता है): महाराष्ट्र में अहिल्या नगर के रहने वाले 19 वर्षीय देवव्रत महेश रेखे इन दिनों चर्चा में हैं। दरअसल उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के लगभग 2000 मंत्रों वाले कठिन दंड कर्म पारायणम् को पूरा कर इतिहास रच दिया है। उन्होंने यह उपलब्धि लगातार 50 दिनों में बिना किसी व्यवधान के पूरा किया। इससे पहले 200 साल पहले महाराष्ट्र के ही नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्र देव ने यह उपलब्धि हासिल की थी। इस दंड कर्म पारायणम् को पूरा कर देवव्रत महेश रेखे वेदमूर्ति बन गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश के तमाम लोग देवव्रत महेश रेखे को शुभकामनाएं दे रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वेदमूर्ति बनने की यह खास दंड कर्म पारायणम् प्रक्रिया है क्या?
हिंदू धर्म के चार प्रमुख वेद हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों वेदों ने मिलकर हिंदू सभ्यता को आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक आधार दिया है। इन्हें श्रुति कहा गया है, यानी वे ज्ञान जो ऋषियों ने गहन तप, ध्यान और दिव्य अनुभूति के माध्यम से सुने और आगे संजोया:
ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन है। इसमें 10 मंडलों में विभाजित 1,028 सूक्त हैं, जो अग्नि, इंद्र, वरुण और अन्य देवताओं की स्तुति में रचे गए मंत्रों का संग्रह है। यह वेद प्रकृति, जीवन, ब्रह्मांड और मनुष्य के अस्तित्व का काव्यात्मक वर्णन प्रस्तुत करता है।
यजुर्वेद यज्ञ और पूजा-विधानों का वेद है। इसमें यज्ञ करने की विधि, उससे जुड़े मंत्र, क्रम और नियम विस्तार से बताए गए हैं। इसका उद्देश्य मनुष्य के कर्म को शुद्ध और अनुशासित बनाना है।
सामवेद संगीत और स्वरों का वेद माना जाता है। इसमें ऋग्वेद के मंत्रों को विशेष धुनों में पिरोकर प्रस्तुत किया गया है, ताकि यज्ञों में गाया जा सके। भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें भी सामवेद से ही मानी जाती हैं।
अथर्ववेद लोकजीवन का वेद है। इसमें स्वास्थ्य, आयुर्वेदिक उपचार, गृहस्थ जीवन, शांति, सुरक्षा और समाज के कल्याण से जुड़े मंत्र शामिल हैं। इसे व्यावहारिक ज्ञान का खज़ाना भी कहा जाता है।
यजुर्वेद यज्ञ या पूजा कर्मों की विधियों और मंत्रों का संग्रह है। यजुर्वेद नाम उसके काम (यज्ञ,पूजा और अनुष्ठान) से ही आया है। वेदों में यजुर्वेद की दो मुख्य शाखाएं हैं - शुक्ल (श्वेत) और कृष्ण (कृष्ण)।
शुक्ल और कृष्ण यजुर्वेद में मुख्य अंतर यह है कि शुक्ल यजुर्वेद में संहिता (मंत्र) और ब्राह्मण (अनुष्ठान-विवरण) अलग-अलग मिलते हैं, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में दोनों मिला-जुला होता है। यही वजह है कि शुक्ल यजुर्वेद को कम जटिल माना जाता है। शुक्ल यजुर्वेद खासतौर पर यज्ञ-विधि का वेद है। इसमें अग्निहोत्र, सोमयज्ञ, सृष्टि-यज्ञ, विभिन्न अनुष्ठान, यज्ञ-कर्म आदि के लिए मंत्र और निर्देश मिलते हैं।
शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं: माध्यन्दिन और काण्व। उत्तर भारत के कर्मकांडों में माध्यान्दिन ज्यादा प्रचलित है। माध्यन्दिन शाखा में 40 अध्याय और करीब 2000 मंत्र होते हैं।
दंड कर्म पारायणम् का शाब्दिक अर्थ है अनुशासन या दंड से संबंधित कर्मों का पाठ। सनातन संस्कृति में यह बेहद प्राचीन और विशिष्ट वैदिक व पौराणिक अनुष्ठान है। यह ज्ञान को कर्मकांडीय स्वरूप प्रदान करता है।भगवान विष्णु के उपासकों के अगमों से प्रेरित यह क्रिया शत्रु दमन, जीवन की गंभीर बाधाओं और संकटों के निवारण के लिए की जाती है, जिसमें साधक विशिष्ट मंत्रों द्वारा दैवीय दंड (दण्ड अर्घ्य दान) को नकारात्मक शक्तियों पर लागू करने की प्रार्थना करता है।
दंड कर्म पारायणम् में मंत्रों को याद करके सामान्य क्रम में सीधा सुनाने के बजाय, एक विशिष्ट शैली में उल्टा और सीधा एक साथ पढ़ा जाता है। इसी कारण से दंड कर्म पारायणम् को सर्वोच्च और सबसे कठिन माना जाता है।
दंड कर्म पारायणम् का महत्व वेदों की दुर्लभ और कठिन विधि के अनुसार पाठ करके ज्ञान और मानसिक क्षमता का विकास करना है, जिससे व्यक्ति वेदमूर्ति बन सके। इस कठिन तपस्या का महत्व मानसिक एकाग्रता, स्मरण शक्ति, और वैदिक परंपरा को जीवित रखने में है।
उच्चतम उपलब्धि: जो इसे सफलतापूर्वक पूरा करता है, उसे वेदमूर्ति की उपाधि से सम्मानित किया जाता है, जो वैदिक ज्ञान और साधना की चरम अवस्था का प्रतीक है।
ज्ञान और साधना का विकास: यह वेदों, विशेषकर यजुर्वेद, के ज्ञान को अत्यंत गहनता से आत्मसात करने का एक तरीका है।
मानसिक क्षमता का चरम: यह विधि केवल मंत्रों को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए अत्यधिक स्मरण शक्ति, एकाग्रता और मानसिक स्थिरता की आवश्यकता होती है, क्योंकि इसमें मंत्रों को क्रम से और फिर उल्टा-सीधा मिलाकर पढ़ना होता है।
वैदिक परंपरा का संरक्षण: यह विधि वैदिक परंपरा को जीवित रखने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कठोर तपस्या के समान: इसे एक प्रकार की कठिन तपस्या माना जाता है, जिसमें सामान्य साधक भी इसे कर पाने में असमर्थ होते हैं।
देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा दंड कर्म पारायणम् को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूरा किया है। इसका मतलब ये हुआ कि महेश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद के माध्यान्दिन शाखा के करीब 2000 मंत्रों को विशिष्ट शैली में एक साथ उल्टा और सीधा पढ़ते हुए पूरा किया। उन्हें ऐसा करने में लगातार 50 दिन का समय लगा। इस उपलब्धि को हासिल करने के बाद देवव्रत महेश रेखे को वेदमूर्ति की उपाधि दी गई है। अब वह वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे कहला रहे हैं।
सनातन संस्कृति में वेदमूर्ति उन महान विभूतियों को कहते हैं जिनको वेदों का संपूर्ण ज्ञान होता है। यह बेहद खास उपाधि उन विद्वानों और संन्यासियों को दी जाती है, जिन्होंने वेदों और हिंदू धर्मग्रंथों को लंबे समय तक अध्ययन किया हो या उन्हें कंठस्थ कर लिया है। देवव्रत महेश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा का दंड कर्म पारायणम् कर वेदमूर्ति की उपाधि हासिल की है। उनकी उपलब्धि पर पूरा देश गर्व कर रहा है।
देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (Hindi News) पढ़ें हिंदी में और देखें छोटी बड़ी सभी न्यूज़ Times Now Navbharat Live TV पर। अध्यात्म (Spirituality News) अपडेट और चुनाव (Elections) की ताजा समाचार के लिए जुड़े रहे Times Now Navbharat से।