Why We Celebrate Diwali: क्यों मनाई जाती है दिवाली? रामायण से महाभारत काल तक, इन जगहों पर हैं कारण

Diwali 2021: सनातन धर्म में दीपावली का विशेष महत्व है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम रावण का वध कर 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद जननी जन्मभूमि अयोध्या वापस लौटे थे। वही इस पावन पर्व को लेकर और भी कई कथाएं भी हैं।

Diwali 2021
Diwali 2021 
मुख्य बातें
  • आज यानी 04 नवंबर को देशभर में दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है।
  • क्या आप जानते हैं कि दिवाली क्यों मनाई जाती है?
  • महाभारत के अनुसार इसी कार्तिक मास की अमावस्या को पांडव तेरह वर्ष का वनवास पूर्ण कर वापस लौटे थे।

रोशनी का त्योहार दीपावली भारतवर्ष में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। सनातन धर्म मे दीपावली का विशेष महत्व है। दीपावली को पर्वों की माला भी कहा जाता है। क्योंकि यह पर्व केवल छोटी दीपावली और दीपावली तक सीमित नहीं रहता बल्कि भैया दूज तक चलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जी रावण का वध कर चौदह वर्ष के वनवास के बाद जननी जन्मभूमि अयोध्या वापस लौटे थे।

जिसकी खुशी में पूरी अवध नगरी दीये की चकाचौंध से सजाई जाती है और इसका हर्षोल्लास पूरे देश में देखने को मिलता है। वहीं धार्मिक ग्रंथो की मानें तो इस दिन समुद्र मंथन से धन की देवी मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। आज दीपावली के मौके पर हम आपको बता रहे हैं क्यों मनाई जाती है दीपावली और क्या है इसकी पौराणिक मान्यता।

14 वर्ष वनवास पूर्ण कर अवध लौटे थे भगवान राम

पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद अपनी जन्मभूमि अयोध्या वापस लौटे थे। जिसके उपलक्ष्य में हर साल कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन पूरी अयोध्या नगरी को दीप के प्रकाश से दुल्हन की तरह सजाया जाता है, कलाकृतियों और रंग रोगन से रामजी की नगरी को सजाया जाता है। 

महाभारत काल से जुड़ी है दीपावली मनाने की परंपरा

दीपावली मनाने की परंपरा महाभारत काल से भी जुड़ी है। हिंदू महाग्रंथ महाभारत के अनुसार इसी कार्तिक मास की अमावस्या को पांडव तेरह वर्ष का वनवास पूर्ण कर वापस लौटे थे। कौरवों ने शतरंज के खेल में शकुनी मामा के चाल की मदद से पांडवो का सबकुछ जीत लिया था। इसके साथ ही पांडवो को राज्य छोड़कर वापस जाना पड़ा था। इसी कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को वह वापस लौटे थे। पांडवो के वापस लौटने की खुशी में लोगों ने दीप जलाकर खुशी मनाई थी। इसके बाद प्रत्येक वर्ष दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है।

मां लक्ष्मी का हुआ था जन्म

धार्मिक ग्रंथो की मानें तो समुद्र मंथन के दौरान इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन गणेश और लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा अर्चना करने से सुख-समृद्धि, यश वैभव की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

इस दिन श्रीकृष्ण जी ने नरकासुर का किया था वध

जब नरकासुर नामक दैत्य ने अपने आतंक से तीनों लोको में हाहाकार मचा दिया था और सभी देवी देवता व ऋषि मुनि उसके अत्याचार से परेशान हो गए थे। तब श्रीकृष्ण जी ने पत्नी सत्यभामा को अपना सारथी बनाकर उसका वध किया था, क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु किसी महिला के हाथो ही होगी। उसका वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16000 महिलाओं को मुक्त कराया था तथा समाज में सम्मान दिलाने के लिए उनसे विवाह किया था। इस जीत की खुशी को दो दिन तक मनाया गया था। जिसे नरक चतुर्दशी यानि छोटी दीपावली और दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

राजा विक्रमादित्य का हुआ था राजतिलक

राजा विक्रमादित्य भारत के महान शासकों में से एक थे। अपनी बुद्धि, पराक्रम और जुनून से इन्होंने आर्यावर्त इतिहास में अपना नाम अमर किया था। मुगलों को धूल चटाने वाले राजा विक्रमादित्य अंतिम हिंदू राजा था। इतिहासकारों के मुताबिक इसी कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को उनका राज तिलक हुआ था।

सिखों के लिए दीपावली का पर्व है बेहद खास

सिखों के लिए भी इस पर्व का विशेष महत्व है। सिखों के तीसरे गुरु अमर दास साहब ने इस दिन को विशेष दर्जा दिया था। वहीं इस दिन 1619 ई में मुगल शासक जहांगीर ने सिख धर्म के छठे गुरु हरगोविंद साहब को 52 राजाओं के साथ ग्वालियर किले से आजद किया था। कहा जाता है कि दीपावली के दिन 1577 ई मे पंजाब के अमृसर जिले में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था।

इस दिन महावीर तीर्थकार ने प्राप्त किया था निर्वाण

जैन धर्म के अनुयाइयों के लिए भी यह पर्व बेहद खास है। दीपावली के दिन ही जैन धर्म के संस्थापक महावीर तीर्थकार ने निर्वाण प्राप्त किया था और देश दुनिया में जैन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए निकल पड़े थे। एक तपस्वी बनने के लिए उन्होंने अपनी शाही जिदगी और परिवार को त्याग कर व्रत व तप को अपनाया था।

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