Pitru paksa 2019: गया ही नहीं इन तीन शहरों में भी होता है पिंडदान, जानें क्या है धार्मिक मान्यता

धार्मिक स्‍थल
Updated Sep 12, 2019 | 18:56 IST | टाइम्स नाउ डिजिटल

पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति और उन्हें मोक्ष प्रदान करने के लिए पिंड दान किया जाता है। इसके लिए केवल गया नहीं बल्कि तीन ऐसे शहर हैं, जहां पिंड दान किया जा सकता है। 

Pitru paksha
Pitru paksha   |  तस्वीर साभार: Instagram

Pitru paksa pind daan : पितृ पक्ष 13 सितंबर से शुरू हो रहा है और पितरों की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और ब्रह्मभोज कराया जाता है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है जो अपने मृत परिजन की आत्मा की शांति चाहते हैं। इसके लिए हिंदू शास्त्र में जगह निर्धारित किए गए हैं जहां जा कर पिंड दान करने से आत्मा को मोक्ष मिलता है और शांति की प्राप्ति होती है।

वैसे तो लोग पितरों की शांति के लिए गया जाते हैं लेकिन आपको क्या ये पता है कि गया से पहले एक शहर ऐसा है जहां पिंडदान करने के बाद ही गया में किया गया पिंडदान पूरा माना जाता है? इतना ही नहीं पिंडदान केवल गया में ही नहीं बल्कि तीन प्रमुख धार्मिक नगरी में भी किया जाता है? आइए जानें कि वह कौन से शहर हैं, जहां पितरों की शांति के तर्पण और पिंडदान किया जाता है।

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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काशी में पिंडदान जरूरी 
यह सही है कि गया में पिंडदान करना मृत आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति दिलाना होता हैं। गया में आए बिना पिंडदान पूरा नहीं माना जाता है। यहां पिंडदान करने के बाद यह माना जाता है कि आत्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई, लेकिन एक बात यह भी है कि काशी में पिंडदान के बाद ही गया का पिंडदान पूर्ण माना जाता है।

बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में पिंडदान
बद्रीनाथ के ब्रह्माकपाल में पिंडदान किया जाता है। यहां ब्रह्महत्या का दोष भी पिंडदान के बाद मुक्त हो जाता है। शिवजी ने भी ब्रह्महत्या के बाद यहां प्राश्चित किया था। यहां पिंडदान करने से बुरी से बुरी आत्मा को नरक से मुक्ति मिल जाती है।

Shradh pind daan

वाराणसी, उत्तर प्रदेश
कहीं भी पिंडदान किया जाए लेकिन अगर काशी में पिंडदान न हो तो वह पिंडदान पूर्ण नहीं होता है। काशी मोक्ष का द्वार है इसलिए यहां से पिंडदान के बाद ही गया में पिंडदान करना पूर्ण होता है।

हरिद्वार के नारायणी शिला पर होता है पिंडदान
हरिद्वार यानि हरि के पास जाने वाला द्वार इसे माना गया है। आत्मा की शांति के लिए हरिद्वार के नारायणी शिला पर पिंडदान दिया किया जाता है। यहां पर लोग अपने कई पीढ़ियों के पुरखों को पिंडदान करते हैं।

तो पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध करना और पिंडदान करना बहुत जरूरी होता है। पितरों की शांति से घर में भी सुख और शांति आती है।

 

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