Bamleshwari Mandir: इस मंदिर में मत्था टेकने से प्रेमी जोड़ों की हो जाती है शादी, देवी देती हैं आशीर्वाद 

धार्मिक स्‍थल
Updated Oct 03, 2019 | 09:39 IST | टाइम्स नाउ डिजिटल

Maa Bamleshwari Mandir Dongragarh: मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहां मत्था टेकने से दो प्रेमियों को मिलाने के लिए देवी खुद किसी ना किसी रुप में प्रकट होती हैं।

Bamleshwari Mandir
Bamleshwari Mandir  |  तस्वीर साभार: Instagram

मुख्य बातें

  • बम्लेश्वरी देवी का मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के डोंगरपुर की पहाड़ी पर स्थित है
  • देवी का यह मंदिर राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था
  • इस मंदिर में आज भी देश के कोने कोने से प्रेमी युगल आते हैं और माता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं

कहते हैं कि जोड़ियां ऊपर वाला बनाता है और अगर प्रेम सच्चा हो तो कोई भी दो लोगों को अलग नहीं कर सकता है। देश दुनिया में कई ऐसे मंदिर हैं जिन्हें प्रेम का प्रतीक माना जाता है। लेकिन मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहां मत्था टेकने से दो प्रेमियों को मिलाने के लिए देवी खुद किसी ना किसी रुप में प्रकट होती हैं।

मंदिर की इसी विशेषता के कारण यहां देश के कोने कोने से प्रेमी युगल आते हैं और जीवन भर एक दूसरे के साथ रहने की कामना के साथ मां बम्लेश्वरी देवी की आराधना करते हैं। माना जाता है कि बम्लेश्वरी देवी के दरबार में आने वाले किसी भी जोड़े को मां निराश नहीं करती हैं और हर मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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कहां स्थित है यह मंदिर
बम्लेश्वरी देवी का मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के डोंगरपुर की पहाड़ी पर स्थित है। बम्लेश्वरी देवी को देवी बगुलामुखी के नाम से जाना जाता है। डोंगरपुर की पहाड़ी पर देवी का यह मंदिर राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था।

पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने की थी उपासना
प्राचीन समय में छत्तीसगढ़ के डोंगरपुर को कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। आज से बाईस सौ वर्ष पूर्व इस नगरी में वीरसेन नाम का एक राजा था। नगर की प्रजा राजा का बहुत सम्मान करती था। राजा की कोई संतान नहीं थी इसलिए राजा वीरसेन दुखी रहते थे। पंडितों ने उन्हें भगवान शंकर और मां दुर्गा की उपासना करने एवं मां बम्लेश्वरी देवी के मंदिर की स्थापना करने की सलाह दी। इसके बाद राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। राजा का पहला पुत्र कामसेन अपने पिता की तरह ही प्रजा का प्रिय था लेकिन दूसरा पुत्र मदनादित्य उनके एकदम विपरीत था। 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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माधवनल को कामकन्दला से हो गया था प्रेम
एक बार राजा कामसेन ने अपने दरबार में संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें संगीतज्ञ माधवनल और प्रसिद्ध नर्तकी कामकन्दला भी शामिल हुए। जब नृत्य शुरू हुआ तो लय एवं ताल का सही समीकरण नहीं बैठ पा रहा था। तब माधवनल ने बताया कि किस वजह से लय और ताल नहीं बैठ पा रहा था। उसके इस ज्ञान से प्रभावित होकर राजा कामसेन ने उसे मोतियों की एक माला उपहार स्वरुप भेंट की। लेकिन माधवनल ने वह माता कामकन्दला को दे दिया। इस बात से नाराज होकर राजा ने माधवनल को दरबार से बाहर निकलवा दिया। इसी दौरान कामकन्दला और माधवनल को एक दूसरे से प्रेम हो गया।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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माधवनल को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा
इधर कामकन्दला और माधवनल में प्रेम हो गया और उधर राजा कामसेन का पुत्र भी कामकन्दला को पसंद करने लगा। जब कामकन्दला को यह बात पता चली तो माधवनल की सुरक्षा के लिए उसने मदनादित्य से प्रेम का झूठा नाटक किया। सच्चाई पता चलने पर मदनादित्य ने कामकन्दला को राजद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया और माधवनल को खोजने के लिए अपने सिपाहियों को भेजा।

मां बम्लेश्वरी देवी के आशीर्वाद से एक हो गए दो प्रेमी
सिपाहियों से छिपते हुए अपना प्राण बचाने के लिए माधवनल राजा विक्रमादित्य के पास मदद के लिए पहुंचा। तब राजा ने मदनादित्य से युद्ध करके पराजित कर दिया  और माधवनल एवं कामकन्दला को एक दूसरे से मिलवाया। राजा विक्रमादित्य दोनों की परीक्षा लेकर यह देखना चाहते थे कि माधवनल और कामकन्दला एक दूसरे को कितना प्रेम करते हैं। इसलिए उन्होंने कामकन्दला के पास सूचना भेजी की एक युद्ध में माधवनल की मृत्यु हो गयी। यह सुनते ही कामकन्दला ने तालाब में कूदकर अपनी जान दे दी। उसके मौत की खबर से दुखी होकर माधवनल ने भी अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने बम्लेश्वरी देवी की आराधना की और दोनों के लिए जीवनदान मांगा। इसके साथ ही राजा ने देवी से डोंगरपुर की पहाड़ी पर स्थापित होने के लिए प्रार्थना की जिससे प्रेमी युगल को आशीर्वाद मिल सके। तब माता पहाड़ी पर प्रकट हुईं। 

इस मंदिर में आज भी देश के कोने कोने से प्रेमी युगल आते हैं और माता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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