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एक चुटकी सिंदूर की कीमत….,कब से शुरू हुई मांग में सिंदूर लगाने की परंपरा; कहां से और कैसे आया सिंदूर

Sindoor Meaning and History: पूजा की सामग्री से लेकर महिलाओं के सौभाग्य तक सिंदूर का अर्थ समय और परिस्थिति में बदलता रहा है। समय बदलते-बदलते सिंदूर कैसे धार्मिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गया, इसकी कहानी बेहद रोचक है।

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क्या है सिंदूर का इतिहास
Authored by: Mohit Tiwari
Updated Aug 31, 2026, 12:40 IST
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Sindoor Meaning and History: 'एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानोगे रमेश बाबू... ईश्वर का आशीर्वाद होता है एक चुटकी सिंदूर' साल 2007 में आई बॉलीवुड फिल्म 'ओम शांति ओम' का ये डॉयलाग तो आपको याद ही होगा। फिल्मों से लेकर असल जिंदगी में सिंदूर को बहुत अहम माना गया है। पूजा हो या सुहाग की निशानी सिंदूर का अर्थ और प्रयोग भले ही बदले, लेकिन इसकी प्रासंगिता आज मॉर्डन दौर में भी कम नहीं हुई।

अगर शादीशुदा हिंदू महिलाओं के श्रृंगार की बात हो तो सिंदूर का नाम सबसे पहले आने वाली चीजों में शामिल है। शादी के दौरान दूल्हे का दुल्हन की मांग में सिंदूर भरना कई हिंदू समुदायों में विवाह की प्रमुख रस्मों में गिना जाता है। इसके बाद भी महिलाएं अपनी मांग में सिंदूर लगाती हैं। धार्मिक परंपरा में इसे सौभाग्य, दांपत्य और शुभता से जोड़ा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिंदूर की यह परंपरा आखिर कितनी पुरानी है? क्या इसका उल्लेख वेदों और ग्रंथों में भी मिलता है? देवी उपासना में सिंदूर का क्या महत्व है और मांग में सिंदूर लगाने की परंपरा का धार्मिक अर्थ क्या है? सिंदूर के इतिहास को समझने के लिए इन सवालों से आपका रू-ब-रू होना आवश्यक है।

कहां से आया सिंदूर

सिंदूर भारतीय उपमहाद्वीप की उन परंपराओं में शामिल है, जिनका अर्थ समय के साथ धार्मिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर विकसित हुआ। आज इसे खासतौर पर विवाहित महिलाओं की मांग से जोड़ा जाता है, लेकिन पुराने धार्मिक साहित्य को देखें तो इसकी कहानी सिर्फ विवाह तक सीमित नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैदिक साहित्य में दुल्हन की मांग में सिंदूर भरने की आज प्रचलित रस्म का स्पष्ट वर्णन ही नहीं मिलता है। वैदिक विवाह से जुड़े मंत्रों और अनुष्ठानों में अग्नि, वर-वधू के संकल्प और विवाह संबंधी दूसरी विधियों का वर्णन मिलता है, लेकिन आधुनिक रूप में सिंदूरदान को वैदिक विवाह की अनिवार्य रस्म के तौर देखना सही नहीं होगा। सिंदूर के धार्मिक संदर्भ बाद के संस्कृत साहित्य और देवी परंपराओं में अधिक स्पष्ट होकर सामने आते हैं। खासतौर पर देवी के श्रृंगार और स्वरूप के वर्णन में सिंदूर तथा मांग का उल्लेख मिलता है। यहीं से सिंदूर का संबंध केवल रंग या श्रृंगार से आगे बढ़कर धार्मिक प्रतीक के रूप हो जाता है।

देवी पूजा में सिंदूर

सिंदूर के धार्मिक इतिहास को समझने के लिए आपको ललिता सहस्रनाम और सौंदर्य लहरी जैसे ग्रंथों का रूख करना होगा। ललिता सहस्रनाम से जुड़ी परंपरा में देवी के स्वरूप का वर्णन करते हुए उन्हें ‘सिन्दूरारुण विग्रहाम्’ कहा गया है। इसका सामान्य अर्थ देवी के सिंदूर जैसी लाल आभा वाले स्वरूप से लिया जाता है। वहीं, आदि शंकराचार्य से संबद्ध सौंदर्य लहरी के 44वें श्लोक में देवी की सीमंत रेखा यानी मांग का वर्णन सिंदूर के साथ किया गया है। पूरा श्लोक इस प्रकार है—

'तनोतु क्षेमं नः तव वदन-सौन्दर्य-लहरी

परीवाह-स्रोतः-सरणिरिव सीमन्तसरणिः।

वहन्ती सिन्दूरं प्रबल-कबरी-भार-तिमिर-

द्विषां बृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम्॥'

इस श्लोक में देवी की मांग को एक ऐसी रेखा की तरह बताया गया है, जिसमें सिंदूर उगते हुए सूर्य की किरणों की तरह दिखाई देता है। यानी धार्मिक साहित्य में सिंदूर का संबंध देवी के श्रृंगार और दिव्य सौंदर्य के वर्णन से भी मिलता है। यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि देवी के स्वरूप में सिंदूर का उल्लेख होना और हर विवाहित महिला के लिए सिंदूर लगाने की किसी वैदिक बाध्यता का होना एक ही बात नहीं है।

सिंदूर खेला

सिंदूर खेला

मांग में सिंदूर लगाने की परंपरा कैसे जुड़ी विवाह से

समय के साथ सिंदूर का संबंध महिला के वैवाहिक जीवन से मजबूत होता गया। हिंदू विवाह की विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं में दूल्हे द्वारा दुल्हन की मांग में सिंदूर भरने की रस्म को सिंदूरदान कहा जाता है। इस रस्म का सामान्य सांस्कृतिक अर्थ विवाह की घोषणा और दंपति के नए जीवन की शुरुआत से जुड़ा हुआ है। बाद में मांग में सिंदूर विवाहित महिला के श्रृंगार का स्थायी हिस्सा बन गया। भारत में विवाह की रस्में एक जैसी नहीं हैं। कहीं सिंदूरदान को खास महत्व मिलता है, कहीं मंगलसूत्र, ताली, शंखा-पोला, बिछिया या दूसरी क्षेत्रीय परंपराएं वैवाहिक पहचान का प्रमुख हिस्सा होती हैं।

सौभाग्य से क्यों जोड़ा गया सिंदूर

भारतीय परंपरा में लाल रंग का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व काफी पुराना है। लाल रंग को कई परंपराओं में ऊर्जा, शक्ति, मंगल और उत्सव से जोड़ा जाता है। सिंदूर का लाल रंग इसी व्यापक प्रतीकवाद के भीतर समझा जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए सिंदूर को सौभाग्य यानी पति और दांपत्य जीवन के मंगल से जोड़ने की परंपरा आगे चलकर मजबूत हुई। कई परिवारों में सिंदूर पति के प्रति निष्ठा और वैवाहिक जीवन की शुभकामना का प्रतीक भी माना जाता है। धार्मिक आस्था में यह बात अलग-अलग रूपों में मिलती है, लेकिन इसे वैज्ञानिक तथ्य की तरह पेश नहीं किया जा सकता कि सिंदूर लगाने से पति की आयु बढ़ती है। यह धार्मिक विश्वास और पारंपरिक मान्यता का विषय है।

सीता और हनुमान से जुड़ी सिंदूर की कहानी

सिंदूर को लेकर रामकथा का एक लोकप्रिय प्रसंग भी है। इसके अनुसार माता सीता अपनी मांग में सिंदूर भगवान राम से उनका अटूट प्रेम और गहरा होने के लिए था। हनुमान ने जब इसका कारण जाना तो भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति दिखाने के लिए उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। इसी कथा के बाद से हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

महाभारत में भी है सिंदूर का उल्लेख

सिंदूर का जिक्र महाभारत में भी है। खासकर द्रौपदी से जुड़े प्रसंग में सिंदूर का जिक्र हुआ है। द्रौपदी के सिंदूर मिटाने वाली कथा मिलती है। हालांकि, धार्मिक परंपराओं में किसी कथा का लोकप्रिय होना और उसका किसी मूल ग्रंथ में उसी रूप में मौजूद होना अलग-अलग बातें हैं।

सिंदूर और दुर्गा पूजा

सिंदूर का धार्मिक इस्तेमाल केवल शादीशुदा महिलाओं की मांग तक सीमित नहीं है। पूर्वी भारत, खासकर बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में सिंदूर का अलग सांस्कृतिक महत्व दिखाई देता है। दुर्गा पूजा के समापन पर मनाए जाने वाले सिंदूर खेला में विवाहित महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। यहां सिंदूर दांपत्य जीवन के साथ-साथ देवी की पूजा, शुभता और सामूहिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा बन जाता है। इस तरह सिंदूर के दो प्रमुख धार्मिक संदर्भ सामने आते हैं, जिनमें एक देवी के श्रृंगार से जुड़ा हुआ और दूसरा विवाहित स्त्री के सौभाग्य से है।

सिंदूर और कुमकुम में अंतर

सिंदूर और कुमकुम में अंतर

सिंदूर और कुमकुम में है अंतर

सिंदूर और कुमकुम को आम बोलचाल में कई बार एक ही समझ लिया जाता है, लेकिन धार्मिक इस्तेमाल में दोनों की भूमिका अलग हो सकती है। कुमकुम का इस्तेमाल माथे पर तिलक या पूजा में किया जाता है, जबकि सिंदूर का संबंध खास तौर पर मांग और वैवाहिक परंपरा से अधिक जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, भारत के अलग-अलग हिस्सों में इन दोनों नामों और इनके इस्तेमाल के तरीकों में बदलाव भी मिलता है।

पुराने समय में किससे बनता था सिंदूर

सिंदूर की संरचना हमेशा एक जैसी नहीं रही। पारंपरिक तौर पर लाल रंग तैयार करने के लिए अलग-अलग प्राकृतिक या खनिज सामग्री के इस्तेमाल की जानकारी मिलती है। हल्दी आधारित मिश्रणों का भी उल्लेख मिलता है। इसके बाद के दौर में खनिज रंगों और फिर आधुनिक रासायनिक रंगों का इस्तेमाल बढ़ा। इसी वजह से आज बाजार में मिलने वाले सभी सिंदूर एक जैसे नहीं होते हैं। धार्मिक उपयोग के लिए सिंदूर खरीदते समय इसकी सामग्री और निर्माता की जानकारी देखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ उत्पादों में भारी धातुओं को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं सामने आ चुकी हैं।

क्या सिंदूर में सीसा या पारा होता है

यह सवाल आधुनिक समय में खास तौर पर महत्वपूर्ण है। हर सिंदूर में सीसा या पारा मौजूद होता है, ऐसा कहना गलत होगा, लेकिन कुछ पारंपरिक और कॉस्मेटिक उत्पादों में भारी धातुओं की मौजूदगी के मामले सामने आए हैं। विशेष रूप से लेड यानी सीसा को लेकर चिंता जताई गई है। अमेरिकी FDA ने भी कुछ पारंपरिक उत्पादों में भारी धातुओं के संभावित जोखिमों को लेकर उपभोक्ताओं को सावधानी बरतने की सलाह दी है। इसका मतलब यह नहीं है कि सिंदूर की धार्मिक परंपरा ही असुरक्षित है। बात इस्तेमाल किए जा रहे उत्पाद की गुणवत्ता की है। पूजा या श्रृंगार में इस्तेमाल होने वाला सिंदूर भरोसेमंद निर्माता से लेना और उसकी लेबलिंग देखना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।

क्या हर हिंदू महिला के लिए सिंदूर लगाना जरूरी है

सिंदूर को हिंदू परंपरा में विवाहित महिला के प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है, लेकिन इसके इस्तेमाल के नियम हर समुदाय में समान नहीं हैं। कहीं महिलाएं इसे रोज लगाती हैं, कहीं केवल पूजा या खास अवसरों पर और कई महिलाएं निजी पसंद के अनुसार इसे नहीं लगातीं।

इस वजह से सिंदूर को हिंदू समाज की एक महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना अधिक सटीक है, न कि हर महिला पर लागू होने वाले एक समान नियम के रूप में।

इतिहास से धर्म तक कैसे बदला सिंदूर का अर्थ

सिंदूर का इतिहास यह दिखाता है कि धार्मिक प्रतीकों का अर्थ समय के साथ बदलता और व्यापक होता रहता है। प्राचीन भारतीय परंपराओं में लाल रंग का धार्मिक महत्व था। बाद के संस्कृत साहित्य और देवी परंपराओं में सिंदूर का उल्लेख देवी के स्वरूप और श्रृंगार से जुड़ता है। इसके बाद विवाह संस्कारों और लोक परंपराओं में सिंदूर का संबंध विवाहित महिला के सौभाग्य और दांपत्य से मजबूत होता गया। आज मांग में सिंदूर एक साथ कई अर्थ जैसे विवाह, सौभाग्य, धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान रखता है। यही वजह है कि सिंदूर को सिर्फ श्रृंगार की चीज मानना इसके पूरे धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी पब्लिक डोमेन और शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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