10 years of Deepotsav in Ayodhya: शाम ढल रही है। सरयू का पानी धीरे-धीरे गहरे रंग में उतर रहा है। घाटों पर चहल-पहल बढ़ने लगी है। कहीं मिट्टी के दीयों की कतारें सजाई जा रही हैं, कहीं उनमें तेल और बाती रखी जा रही है। कोई आखिरी बार दीयों को सीध में लगा रहा है तो कोई अपने हाथों से उनकी लौ संभाल रहा है। मंदिरों से आती घंटियों की आवाज, शंखनाद और लोगों की बातचीत के बीच अचानक एक-एक कर दीये जलने लगते हैं। कुछ ही देर में सरयू के घाट रोशनी से भर उठते हैं। पानी में पड़ती सुनहरी परछाइयां ऐसा दृश्य रचती हैं, जिसे कुछ पल ठहरकर देखने का मन करता है।
यह अयोध्या के दीपोत्सव की तस्वीर है। वो शहर, जहां दीप जलाना कोई नई परंपरा नहीं है। राम के वनवास से लौटने की कथा और कार्तिक की शामों में सरयू के किनारे जलते दीयों का रिश्ता सदियों पुराना है। लेकिन पिछले एक दशक में इस परंपरा ने एक नया रूप लिया है। घरों और मंदिरों में मनाई जाने वाली दीपावली की स्मृति अब पूरे शहर के साझा उत्सव में बदलती दिखाई देती है।
2017 में कुछ लाख दीयों से शुरू हुई यह यात्रा 2026 में अपने दसवें पड़ाव पर पहुंच रही है। इस दौरान दीयों की संख्या करीब पंद्रह गुना बढ़ी है। लेकिन इस सफर की असली कहानी केवल आंकड़ों की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें एक धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया।
2017 में पहली बार जब राम की पैड़ी पर सजे लाखों दीये
18 अक्टूबर 2017 की शाम अयोध्या के लिए खास थी। उस शाम राम की पैड़ी पर करीब 1.71 लाख मिट्टी के दीये जलाए गए। यह पहली बार था जब दीपावली से जुड़ी राम के अयोध्या लौटने की स्मृति को इतने बड़े सार्वजनिक आयोजन का रूप दिया गया था।
सोचिए, एक तरफ सरयू की बहती धारा, दूसरी तरफ घाटों पर सजे दीये और बीच में रामायण के प्रसंगों को जीवंत करती झांकियां। राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या आगमन की स्मृति को नृत्य, संगीत और शोभायात्राओं के जरिए सामने रखा गया। उस शाम अयोध्या सिर्फ दीपावली नहीं मना रही थी, बल्कि अपनी एक पुरानी सांस्कृतिक स्मृति को नए अंदाज में जी रही थी।
इस आयोजन की खूबसूरती यही थी कि लाखों को दीयों को एक साथ जलते देखने का जहां दर्शकों में उत्साह था, वहीं इसे सफल बनाने में योगदान देने वालों की भी कमी नहीं थी। कोई दीये सजा रहा था, कोई बाती ठीक कर रहा था तो कोई घाट की सीढ़ियों पर उन्हें करीने से रख रहा था। धीरे-धीरे यह उत्सव लोगों के लिए सिर्फ एक आयोजन देखने का मौका नहीं, उसमें शामिल होने का अनुभव बनने लगा।
एक-एक साल के साथ बढ़ती गई रोशनी, बदलता गया उत्सव
पहले दीपोत्सव में 1.71 लाख दीये जले थे। अगले साल यह संख्या बढ़कर 3.01 लाख हो गई। 2019 में 4.04 लाख और 2020 में 6.06 लाख दीये जलाए गए। फिर 2021 में 9.41 लाख दीयों ने घाटों को रोशन किया।
इसके बाद दीपोत्सव का पैमाना लगातार बड़ा होता गया। 2022 में 15.76 लाख और 2023 में 22.23 लाख दीये जलाए गए। 2024 में 25,12,585 दीयों के साथ नया विश्व रिकॉर्ड बना। 2025 में यह संख्या 26,17,215 तक पहुंच गई। अब 2026 में करीब 30 से 33 लाख दीये जलाने की तैयारी है। गौर से देखेंगे तो जानेंगे कि 2026 का आंकड़ा, दीपोत्सव के पहले वर्ष मुकाबले करीब 15 गुना ज्यादा है।
| साल | जलाए गए दीयों की संख्या |
| 2017 | 1.71 लाख |
| 2018 | 3.01 लाख |
| 2019 | 4.04 लाख |
| 2020 | 6.06 लाख |
| 2021 | 9.41 लाख |
| 2022 | 15.76 लाख |
| 2023 | 22.23 लाख |
| 2024 | 25,12,585 |
| 2025 | 26,17,215 |
| 2026 | 30–33 लाख (प्रस्तावित लक्ष्य) |
दीपोत्सव में सिर्फ दीये नहीं जलते, अयोध्या की लोक संस्कृति भी दिखती है
किसी शहर की पहचान सिर्फ उसके बड़े मंदिरों या ऐतिहासिक इमारतों से नहीं बनती। वहां के लोगों का रहन-सहन, उनके त्योहार, उनके हुनर और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं भी उसे पहचान देती हैं।
अयोध्या के दीपोत्सव में यह बात साफ दिखाई देती है। मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों का हुनर हो या घाटों पर दीये सजाने वाले विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की भागीदारी, इस आयोजन में कई लोगों की दुनिया एक साथ जुड़ती है।
कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी जब दीये का आकार लेती है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं रह जाती। उसमें किसी घर की दीपावली, किसी मंदिर की पूजा और किसी घाट की रोशनी छिपी होती है। दीपोत्सव इसी पारंपरिक शिल्प को बड़े सार्वजनिक मंच पर जगह देता है।
इसके साथ रामायण की झांकियां, लोकनृत्य, संगीत और अलग-अलग राज्यों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी उत्सव को विस्तार देती हैं। कहीं कलाकार अपने नृत्य से रामकथा सुना रहे होते हैं, कहीं पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन सुनाई देती है। इस तरह अयोध्या की शाम सिर्फ रोशनी का दृश्य नहीं रहती, वह भारतीय लोक संस्कृति की एक जीवंत तस्वीर बन जाती है।
राम मंदिर के बाद अयोध्या के दीपोत्सव का बदला संदर्भ
22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या की ओर देश-दुनिया का ध्यान और बढ़ा। शहर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या, धार्मिक पर्यटन और अयोध्या को देखने का नजरिया भी नए संदर्भ में सामने आया।
इसी पृष्ठभूमि में दीपोत्सव को देखना दिलचस्प है। राम के अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ा यह उत्सव अब उस शहर की वर्तमान पहचान के साथ भी जुड़ गया है, जहां राम मंदिर आज एक प्रमुख धार्मिक केंद्र है।
लेकिन अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है। उसकी गलियों, घाटों, मंदिरों की घंटियों, साधु-संतों की परंपरा, लोकगीतों और सरयू की आरती में भी उसका अपना संसार बसता है। दीपोत्सव इन सभी रंगों को एक साथ सामने लाने का अवसर बनता है।
शायद इसी वजह से इस आयोजन को केवल एक रिकॉर्ड या एक बड़ी भीड़ के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी असली अहमियत इस बात में है कि यह शहर की पुरानी स्मृतियों को आज के लोगों के अनुभव से जोड़ता है।
दीपोत्सव 2026
अयोध्या दीपोत्सव 2026: दसवें साल में क्या होगा खास
साल 2026 में अयोध्या दसवें दीपोत्सव की तैयारी कर रही है। मुख्य आयोजन 7 नवंबर 2026 को प्रस्तावित है। राम की पैड़ी और सरयू घाट इस बार भी उत्सव के केंद्र में रहेंगे। करीब 30 से 33 लाख मिट्टी के दीये जलाने का लक्ष्य रखा गया है।
इस बार पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ आधुनिक तकनीक का रंग भी देखने को मिल सकता है। आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में 2,100 ड्रोन का शो, सरयू आरती, रामायण पर आधारित झांकियां, लेजर शो और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल हैं।
कल्पना कीजिए, एक ओर घाटों पर कतार से जलते मिट्टी के दीये हों और दूसरी ओर आसमान में ड्रोन की रोशनी से बनती आकृतियां। नीचे सरयू की लहरों में थिरकती लौ और ऊपर रंग-बिरंगी रोशनी। यह परंपरा और आधुनिकता का ऐसा मेल होगा, जिसमें अयोध्या अपने पुराने सांस्कृतिक संसार को नए समय के साथ जोड़ती दिखाई देगी।
