Pushkar Snan : कार्तिक एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक पुष्कर में स्नान का है विशेष लाभ, जानें इसकी पौराण‍िक कथा

पवित्र स्थलों पर स्नान की परंपरा भारत में सदियों से है। पुष्कर में ऐसा माना जाता है कि कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक स्वर्ग के सभी देवी-देवता निवास करते हैं और इस भव्य दृश्य का आनंद उठाते हैं।

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Pushkar mela Snan Mahatav  |  तस्वीर साभार: Getty

मुख्य बातें

  • तीर्थ स्थलों जैसा महत्व रखती है पुष्कर झील
  • पूरी दुनिया में ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर है पुष्कर में
  • एकादशी से पूर्णिमा तक पुष्कर में सभी देवी देवता करते हैं वास

भारत में वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि हर खास दिन पर लोग किसी न किसी पवित्र स्थान पर स्नान करते ही हैं। यहां तक कि दुनिया का सबसे बड़ा मेला कुंभ भी स्नान पर ही आधारित है। जहां मकर संक्रांति के दिन गंगा जी में स्नान करने दुनिया भर से करोड़ों भक्त पहुंचते हैं। हालांकि, आज हम गंगा जी की नहीं बल्कि राजस्थान में स्थित पुष्कर की बात कर रहे हैं। जहां कार्तिक एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक स्नान करने का विशेष महत्व है।

पुष्कर मंदिर का इतिहास और स्नान का महत्व

राजस्थान में एक छोटा सा कस्बा है पुष्कर यहां दुनिया का इकलौता ब्रह्मा जी का मंदिर पुष्कर स्थापित है। इस मंदिर की गिनती भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में होती है। अरावली की पहाड़ियों से घिरा पुष्कर बेहद खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है। पुराणों में इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी कई कथाएं मौजूद हैं, लेकिन पद्म पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने धरती पर यज्ञ करना चाहा लेकिन उस वक्त पूरी धरती वज्रनाभ नामक राक्षस के आतंक से ग्रसित थी। 

तब ब्रह्मा जी ने अपने प्रिय पुष्प कमल के एक वार से ही इस असुर का वध कर दिया था। जब ब्रह्मा जी द्वारा चलाया गया कमल का पुष्प उस राक्षस का वध कर धरती पर तीन जगह गिरा तो इन तीनों ही जगहों से पृथ्वी का सीना चीर कर जल की धारा बहने लगी और वहीं तीन झील बन गई। जिसमें पहले झील का नाम जेष्ठ पुष्कर, दूसरे झील का नाम मध्य पुष्कर और तीसरे झील का नाम कनिष्ठ पुष्कर रखा गया। इन्हीं में से जेष्ठ पुष्कर में ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था जिसे एक तीर्थ स्थल होने का गौरव प्राप्त हुआ। 

ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने इस सरोवर में कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक यज्ञ किया था इसीलिए यहां हर साल 5 दिनों तक एक धार्मिक मेला का आयोजन होता है जिसमें स्वर्ग से सभी देवी-देवता उतर कर शामिल होते हैं। माना जाता है कि इन 5 दिनों यानी कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक इस झील में स्नान करने वाले भक्तों को विशेष फल मिलता है उन्हें साल भर का पुण्य एक साथ ही इस झील में डुबकी लगाने मात्र से ही मिल जाता है।

झील में गिरी हैं अमृत की बूंदें

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन हो रहा था और उसमें से अमृत का घड़ा निकला तब उसे छीन कर एक राक्षस भागने लगा भागते वक्त उस घड़े से कुछ बूंदे इस सरोवर में गिर गई तभी से इस सरोवर के पानी को अमृत के समान माना जाता है। भक्तों का ऐसा भी मानना है कि इस सरोवर में एक डुबकी लगाने मात्र से ही आपके शरीर की गंभीर से गंभीर बीमारियां भी दूर हो जाती हैं।

सिर्फ पुष्कर में ही क्यों होती है ब्रह्मा जी की पूजा

इस सृष्टि के निर्माता ब्रह्म देव की पूजा इस पृथ्वी पर केवल एक ही जगह हो यह अपने आप में ही एक अद्भुत सवाल है। दरअसल, एक बार ब्रह्मा जी पृथ्वी पर यज्ञ करना चाहते थे और उन्होंने अपनी पत्नी सरस्वती जी को अपने साथ यज्ञ में बैठने के लिए कहा, सरस्वती जी ने ब्रह्मा जी से कुछ देर इंतजार करने को कहा। ब्रह्मा जी सरस्वती जी का इंतजार कर रहे थे लेकिन जब कुछ वक्त तक सरस्वती जी पृथ्वी पर नहीं पहुंची तब ब्रह्मा जी ने वहीं एक ग्वालन से यज्ञ के लिए शादी कर ली। 

जब सरस्वती जी यज्ञ में बैठने पहुंची और अपनी जगह किसी और को देखा तो वह क्रोधित हो गईं और ब्रह्मा जी को यह श्राप दिया कि आज के बाद इस पृथ्वी पर तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। हालांकि, जब सभी देवी देवताओं ने उनसे विनती की और उनका मन शांत हुआ तब उन्होंने कहा कि हे ब्रह्मदेव आपकी पूजा इस समग्र संसार में केवल एक ही जगह होगी और वह है पुष्कर।

पुष्कर जाए ब‍िना पूरी नहीं होती चारों धाम की यात्रा

शास्त्रों के अनुसार, पुष्कर का महत्व हिंदू धर्म में उतना ही है जितना कि बनारस और प्रयागराज का है। ऐसा माना जाता है कि अगर आपने चारों धाम बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका के दर्शन कर लिए हैं लेकिन आपने पुष्कर का दर्शन नहीं किया है तो आपकी यात्रा सफल नहीं मानी जाएगी। भक्तों के स्नान के लिए इस झील में 52 घाटों का निर्माण हुआ है।

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