Mahabharat Ke Shrap: महाभारत काल में दिए गए ये श्राप, जिनका आज भी है लोगों के जीवन पर असर

Mahabharat Ke Shraap: महाभारत के युद्ध में श्राप की भूमिका काफी अहम है। इस काल के कुछ श्राप आज तक चले आ रहे हैं। जानिए इन श्राप के बारे में...

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मुख्य बातें

  • महाभारत के युद्ध में श्राप की भूमिका काफी अहम है।
  • महाभारत काल के कुछ श्राप आज तक चले आ रहे हैं। 
  • महाभारत काल में युद्धिष्ठिर द्वारा स्त्री जाति को दिया गया श्राप सर्वविदित है।

मुंबई. महाभारत दुनिया का सबसे बड़ा काव्य है। इसके अलावा इसका इतिहास में भी काफी महत्व है। महाभारत के युद्ध में श्राप की भूमिका काफी अहम है। इस काल के कुछ श्राप आज तक चले आ रहे हैं। 

महाभारत काल में युद्धिष्ठिर द्वारा स्त्री जाति को दिया गया श्राप सर्वविदित है। महाभारत में कर्ण वध के बाद कुंति अपने सबसे बड़े बेटे के शव के पास विलाप कर रही थी। ये देखकर युद्धिष्ठिर ने इसका कारण पूछा। 

कुंति ने तब अपने जीवन का सबसे बड़ा राज बताया कि कर्ण उनका ज्येष्ठ पुत्र है। ये सुनकर युद्धिष्ठिर ने कहा कि कुंति के भेद छिपाने के कारण महाभारत का युद्ध हुआ। इसके बाद युद्धिष्ठिर ने नारी जाति को श्राप दिया कि वह कोई भी भेद नहीं छिपा पाएंगी। 

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अश्वत्थामा को भगवान श्री कृष्ण का श्राप 
महाभारत के युद्ध के आखिरी दिन गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने रात में सोते हुए द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया था। इसके बाद पांडव अश्वत्थामा को सबक सिखाने  महर्षि व्यास के आश्रम गए।अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चला दिया, इसके जवाब में अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। 

दोनों के ब्रह्मस्त्र को ऋषि व्यास ने रोका। अश्वथामा ने इसे अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में मोड़ दिया। इससे नाराज श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा की मणि निकाल ली और श्राप दिया कि वह सृष्टि के अंत तक अपने घावों के साथ भटकता रहेगा।

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मांडव ऋषि का श्राप 
महाभारत के मुताबिक मांडव ऋषि को एक राजा ने सूली में टांगने की सजा दी। हालांकि, काफी देर तक सूली में टांगे जाने के बाद भी वह जीवित रहे। बाद में मांडव ऋषि ने यमराज से इसका कारण पूछा। यमराज ने बताया कि 12 साल की उम्र में मांडव ऋषि ने एक तितली को सुई चुभाई थी। 

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ऋषि को इसकी सजा उन्हें मिली। इस पर क्रोधित मांडव ऋषि ने कहा कि 12 साल के बच्चे को धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। मांडव ऋषि ने यमराज को श्राप दिया कि वह दासी पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यमराज ने इसके बाद विदुर के रूप में जन्म लिया। 

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