Ashtami Puja 2020 : आठवें नवरात्र पर करें Maa Mahagauri की पूजा, जानें महत्व, विधि, कथा, मंत्र व आरती

Navratri Ashtami Mahagauri Puja : अष्टमी पर महागौरी की पूजा का विधान होता है। देवी की पूजा से मनुष्य के जीवन के सभी कष्ट दूर होते। तो आए जानें देवी की पूजा की विधि, सिद्ध मंत्र, आरती और कथा के बारे में।

Navratri Ashtami Mahagauri Puja, अष्टमी पर करें महागौरी की पूजा
Navratri Ashtami Mahagauri Puja, अष्टमी पर करें महागौरी की पूजा 

मुख्य बातें

  • भगवान शंकर को पाने के लिए उन्होंने घोर तप किया था
  • देवी का शरीर तप से अत्यंत काला हो गया था
  • देवी की पूजा से समस्त सुखों की प्राप्ति होती है

अष्टमी तिथि के दिन महागौरी की पूजा के बाद कई जगह कन्या पूजन भी होता है। नवरात्रि में अष्टमी पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन मां दुर्गा के महागौरी रूप का पूजन किया जाता है। सुंदर, अति गौर वर्ण होने के कारण  ही देवी को महागौरी के नाम से भी पुकारा जाता है। मां को महागौरी को श्वेताम्बरधरा और वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। महागौरी की आराधना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और समस्त इच्छाएं पूरी होती है। 

देवी पापों का नाश करने वाली और सुख-सौभाग्य देने वाली मानी गईं हैं। सुहागिनें देवी की पूजा अपने सुहाग की रक्षा और कल्याण के लिए भी करती हैं। देवी ने घनघोर तप कर शिवजी को पाया था और सुहागिनें भी शिवजी जैसे पति की कामना कर उनका व्रत और पूजन करती हैं। तो आइए महाष्टमी पर देवी की पूजा का संपूर्ण विधान जानें।

Maa Mahagauri Ashtami Pujan Muhurat

इस वर्ष अष्टमी तिथि का प्रारंभ 23 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 58 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन 24 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 57 मिनट तक है। ऐसे में इस वर्ष महा अष्टमी का व्रत 23 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस दिन महागौरी की पूजा की जाती है।
इस पूजा का मुहूर्त इस प्रकार है - 
- सुबह 11:49 से लेकर दोपहर 12:32 तक 
- शाम 06:58 से 08:35 तक
- 24 अक्‍टूबर तड़के 04:56 से 05:44 तक

मां महागौरी का स्वरूप (Maa Mahagauri Ka Swaroop)

शंख, चंद्र और कुंद के फूल की उपमा मां महागौरी से की गई है। मां के वस्त्र और सभी आभूषण सभी श्वेत रंग के हैं। इसलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। देवी की सवारी सिंह और बैल दोनों ही हैं। देवी की चार भुजाएं हैं। उनका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में और ठीक नीचे वाले हाथ में उन्होंने त्रिशूल धारण किया है। ऊपर वाले बांए हाथ में डमरू और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा में है। देवी का संपूर्ण स्वरूप शांत मुद्रा में है।

मां महागौरी की पूजा का महत्व (Maa Mahagauri Ke Pujan Ka Mahatva)

मां महागौरी की पूजा अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति कराती है। देवी की पूजा करने से मनुष्य को समस्त सांसारिक और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है। जीवन के कष्ट करने और अंभव कार्य को संभव बनाने के लिए देवी की पूजा बहुत पुण्यदायी मानी गई है।

मां महागौरी की पूजा विधि (Maa Mahagauri Ki Puja Vidhi)

स्नान के बाद पीढ़े या चौकी पर देवी की प्रतिमा को स्थापित करें और उन्हें लाल चुनरी ओढ़ाएं। इसके बाद सुहाग और श्रृंगार की सारी सामग्री देवी को अर्पित करें। फिर मां के समक्ष फल, फूल ,नैवेध आदि का अर्पण करें। सके बाद मां की धूप व दीप से आरती उतारें और सिद्ध मंत्र जाप के साथ उनकी कथा का वाचन करें।

देवी को फूल और भोग आर्पित करें (Offer yellow flowers and Bhog to Goddess)

महागौरी की पूजा पीले कपड़े पहनकर करें।  इसके बाद सफेद या पीले फूल चढ़ाएं। साथ ही उनके भोग के लिए हलवा, चने और पुड़ी का प्रसाद चढ़ाना चाहिए। इसके बाद 9 साल से छोटी नौ कन्याओं का पूजन करके उन्हें भोजन कराएं और इसके बाद कन्याओं को उपहार दें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

मां महागौरी की कथा (Maa Mahagauri Ki Katha)

मां पार्वती ने भगवान शंकर को अपने पति के रूप में पाने के लिए इतनी घनघोर तपस्या की, कि उनका शरीर शरीर काला पड़ गया था। देवी के कठोर तप से भगवान शिव का सिहांसन हिलने लगा। तब शिवजी ने देवी को पत्नी के स्वीकार करने का वचन दिया। इसके बाद शिवजी ने उनके पूरे शरीर को गंगा जल से धोया। गंगा जल से शरीर धुलने के बाद देवी का शरीर उज्जवल हो गया। उनका शरीर कांतिवान और गौरमय हो गया।

मां महागौरी की एक और कथा पुराणों में मिलती है, जिसके अनुसार एक जंगल में एक शेर काफी समय से भूखा था और वह भोजन की तलाश करता हुआ मां महागौरी के पास पहुंच गया जहां वह तपस्या कर रही थी। वह शेर अत्यंत ही भूखा था और मां को देखकर उसकी भूख और भी ज्यादा बढ़ गई थी। लेकिन वह वहीं बैठकर मां की तपस्या का खत्म होने का इंतजार कर रहा था। जब मां न तपस्या के बाद अपनी आंखे खोली तो उन्होंने देखा की उनके सामने एक सिंह अत्यंत ही दयनीय स्थिति में पड़ा है। उस शेर को देखकर मां को उस पर दया आ गई और मां ने उसे अपनी सवारी के रूप में स्वीकार कर लिया, क्योंकि मां के साथ- साथ उस सिंह ने भी तपस्या की थी। इसलिए मां महागौरी के वाहन के रूप में बैल के साथ- साथ सिंह को भी गिना जाता है।

मां महागौरी के मंत्र (Maa Mahagauri Ke Mantra)

1.श्वेते वृषे समारुढ़ा, श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरीं शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया।।

2.या देवी सर्वभूतेषु कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

3. "सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।"

मां महागौरी की आरती (Maa Mahagauri Ki Aarti)

जय महागौरी जगत की माया। जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे। जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता। कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती सत हवन कुंड में था जलाया। उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया। शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता। माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

देवी महागौरी की पूजा करने के बाद इस दिन यदि आप कन्यापूजन कर रहे हैं तो आपको कम से कम आठ कन्याओं की पूजा करनी चाहिए। साथ में एक लांगूर जरूर हो।

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